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लिपि:
॥ श्री ॥

आमलकी एकादशी

व्रत कथा · श्री विष्णु

पाठ

व्रत नियम

कौन रखे: सभी स्त्री-पुरुष — विशेषकर वे जो कार्य-सिद्धि, आरोग्य व पापों से मुक्ति की कामना रखते हैं।

कब: फाल्गुन शुक्ल एकादशी को; अगले दिन द्वादशी को पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।

आहार नियम: अन्न, चावल व दाल का त्याग — फलाहार अथवा निराहार (सामर्थ्यानुसार); प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन वर्जित; दशमी की संध्या से ही सात्त्विक आहार व ब्रह्मचर्य का पालन

पूजन सामग्री

विष्णु प्रतिमा/चित्र · आँवले का वृक्ष अथवा आँवले के फल व टहनी · जल-कलश व आम्रपल्लव · तुलसीदल · पीत वस्त्र, चंदन, अक्षत · धूप, दीप, कर्पूर · पंचामृत व ऋतुफल · दान हेतु आँवला व अन्न

पूजन विधि

  1. दशमी की संध्या से सात्त्विक आहार लें और एकादशी प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. आँवले के वृक्ष के नीचे (अथवा घर में आँवले की टहनी व फल रखकर) भूमि शुद्ध कर वेदी बनाएँ।
  3. वेदी पर जल से भरा कलश स्थापित कर उसमें आम्रपल्लव व नारियल रखें, और भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान करें।
  4. भगवान का पंचामृत से अभिषेक कर पीत वस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प व तुलसीदल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित कर आँवले के वृक्ष की परिक्रमा करें और आमलकी एकादशी की व्रत कथा सुनें।
  6. रात्रि भर जागरण कर भजन-कीर्तन व विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें — इस व्रत में जागरण को विशेष फलदायी कहा गया है।
  7. द्वादशी को स्नानोपरांत ब्राह्मण/निर्धन को आँवला, अन्न व वस्त्र का दान कर पारण-मुहूर्त में स्वयं व्रत खोलें।

व्रत कथा

कथा का प्रसंग

सूत जी ने नैमिषारण्य में एकत्रित ऋषियों से कहा — "हे मुनिवरो! अब मैं आपको आमलकी एकादशी का वह माहात्म्य सुनाता हूँ, जो कभी महर्षि वशिष्ठ ने चक्रवर्ती राजा मान्धाता को सुनाया था।"

राजा मान्धाता ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा था — "हे गुरुदेव! मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए जिससे मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो और उसे परम गति प्राप्त हो।" तब वशिष्ठ जी ने कहा — "हे राजन्! फाल्गुन शुक्ल की आमलकी एकादशी सब व्रतों में श्रेष्ठ है। आँवला स्वयं भगवान विष्णु के मुख से प्रकट हुआ है, इसीलिए यह वृक्ष विष्णु-स्वरूप है। इस व्रत का फल सहस्र गोदान के तुल्य है।"

वैदिश नगरी और राजा चैत्ररथ

महर्षि वशिष्ठ ने कथा आरंभ की — प्राचीन काल में "वैदिश" नाम की एक समृद्ध नगरी थी, जहाँ चंद्रवंशी राजा चैत्ररथ राज्य करते थे। वे स्वयं विष्णु-भक्त थे और उनकी प्रजा भी धर्मपरायण थी। उस नगरी में कोई भी व्यक्ति नास्तिक, कृपण अथवा अधर्मी नहीं था।

एक बार फाल्गुन शुक्ल एकादशी आई। राजा ने घोषणा करवाई कि समस्त प्रजा आमलकी एकादशी का व्रत करे। नियत दिन राजा, रानियाँ, मंत्री व समस्त नगरवासी आँवले के वृक्ष के नीचे एकत्र हुए। वहाँ कलश स्थापित कर भगवान धात्री (विष्णु) का विधिवत पूजन हुआ, दीप जले, शंख-घंटे बजे और रातभर कथा, कीर्तन व जागरण चलता रहा।

भूखा बहेलिया और अनजाने में हुआ व्रत

उसी नगरी में एक बहेलिया (व्याध) रहता था, जो पक्षियों व पशुओं का वध करके अपना पेट भरता था। उसका सारा जीवन हिंसा, चोरी व दुराचार में बीता था। उस दिन उसे कहीं भोजन नहीं मिला और वह भूख से व्याकुल होकर भटकता हुआ उसी मंदिर-प्रांगण में जा पहुँचा जहाँ जागरण हो रहा था।

वह एक कोने में बैठ गया — इस आशा से कि शायद यहाँ कुछ खाने को मिल जाए। किंतु रातभर वहाँ बैठे-बैठे उसने अनजाने में ही एकादशी की कथा सुनी, भगवान के नाम-कीर्तन को सुना और भूखा रहकर पूरी रात जागता रहा। इस प्रकार बिना जाने ही उससे आमलकी एकादशी का व्रत — उपवास, कथा-श्रवण और जागरण — तीनों पूर्ण हो गए।

बहेलिए का पुनर्जन्म

कालांतर में बहेलिए की मृत्यु हुई। उसके हिंसक कर्मों के कारण उसे नरक जाना था, किंतु उस एक रात के अनजाने व्रत का पुण्य इतना प्रबल था कि उसे नरक के स्थान पर उत्तम कुल में जन्म मिला। वह राजा विदूरथ के यहाँ पुत्र-रूप में उत्पन्न हुआ और उसका नाम वसुरथ रखा गया।

राजकुमार वसुरथ बड़ा होकर अत्यंत धर्मात्मा, दानशील व पराक्रमी राजा बना। वह दस हज़ार गाँवों पर शासन करता था, प्रजा का पुत्रवत पालन करता था और सूर्य के समान तेजस्वी, चंद्रमा के समान सौम्य तथा पृथ्वी के समान क्षमाशील कहा जाता था।

वन में दिव्य रक्षा

एक बार राजा वसुरथ आखेट के लिए वन में गए और मार्ग भटक गए। थककर वे एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे और गहरी निद्रा में सो गए। उसी समय कुछ पर्वतीय दस्युओं (डाकुओं) ने उन्हें अकेला व निःशस्त्र देखा। वे राजा से पुराना बैर रखते थे — उनका मानना था कि राजा ने उनके स्वजनों का वध किया है।

दस्युओं ने शस्त्र उठाकर सोए हुए राजा पर एक साथ प्रहार किया। किंतु आश्चर्य — उनके सभी अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर को छूते ही टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़े। तभी राजा के शरीर से एक तेजस्विनी दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिनका रूप अत्यंत उग्र था। उन्होंने क्षण भर में समस्त दस्युओं का संहार कर दिया और फिर अंतर्धान हो गईं।

जागने पर राजा ने चारों ओर मरे हुए दस्यु देखे और चकित रह गए — "यह किसने किया? मेरी रक्षा किसने की?" तभी आकाशवाणी हुई — "हे राजन्! इस संसार में भगवान विष्णु के अतिरिक्त कोई रक्षक नहीं। पूर्वजन्म में तुमने अनजाने में आमलकी एकादशी का व्रत किया था; उसी पुण्य ने आज तुम्हारी रक्षा की है।"

व्रत का फल

यह सुनकर राजा वसुरथ का हृदय भक्ति से भर गया। उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और नगर लौटकर आजीवन धर्मपूर्वक शासन किया तथा प्रतिवर्ष आमलकी एकादशी का व्रत करते रहे। अंत समय में वे वैकुंठ धाम को प्राप्त हुए।

महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता से कहा — "हे राजन्! जब अनजाने में किए गए इस व्रत का ऐसा फल है, तो श्रद्धा व विधिपूर्वक किए गए व्रत के फल का तो वर्णन ही क्या! इस व्रत से सहस्र गोदान के तुल्य पुण्य मिलता है, समस्त पाप नष्ट होते हैं, समस्त कार्य सिद्ध होते हैं और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।"

लाभ

  • सहस्र गोदान के तुल्य पुण्य
  • समस्त पापों का नाश व कार्यों में सिद्धि
  • भगवान विष्णु की दिव्य रक्षा व निर्भयता
  • आँवला-पूजन से आरोग्य व दीर्घायु
  • अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति

स्रोत

आमलकी एकादशी माहात्म्य — महर्षि वशिष्ठ द्वारा राजा मान्धाता को वर्णित · सूत जी द्वारा नैमिषारण्य के ऋषियों को कथित (एकादशी माहात्म्य परंपरा) · राजा चैत्ररथ, वैदिश नगरी, व्याध व राजा वसुरथ प्रसंग

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