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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री अन्नपूर्णा माता आरती
आरती · माँ दुर्गा
पाठ
बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥
1
जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम। अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारे, लेते होत सब काम॥
2
प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम। सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥
3
चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधरश्याम। चन्द्र चूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥
4
देवी देव दयनीय दशा में, दया दया तव नाम। त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरण रूप तव धाम॥
5
श्रीं, ह्रीं, श्रद्धा, श्रीं ऐं विद्या, श्रीं क्लीं कमल काम। कान्तिभ्रांतिमयी कांति शांतिमयी वर देतु निष्काम॥
अर्थ (हिन्दी)
- (टेक) हे मैया, आपको बार-बार प्रणाम, बार-बार प्रणाम।
- हे अम्बिके, जो आपका ध्यान नहीं करता, उसे विश्राम कहाँ? हे अन्नपूर्णा देवी, आपका नाम लेते ही सब काम हो जाते हैं।
- प्रलय, युगों के अंतर, जन्मों के अंतर और कालों के अंतर तक आपका नाम बना रहता है; आप देवताओं की भी रचना करती हैं — (आपके आगे) कहाँ कृष्ण, कहाँ राम!
- चतुर चतुर्मुख (ब्रह्मा) आपके चरण चूमते हैं, सुंदर चक्रधारी श्याम (विष्णु) और चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले (शिव) आपके सेवक हैं — वे आपकी मनोहर शोभा निहारते हैं।
- दयनीय दशा में देवी-देवता भी "दया-दया" कहकर आपका नाम पुकारते हैं; हे शरणागतों पर स्नेह रखने वाली, हमारी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए — आपका धाम ही शरण है।
- श्रीं-ह्रीं (बीज) में आप श्रद्धा हैं, श्रीं-ऐं में विद्या, श्रीं-क्लीं में कमला और काम; आप कांति और माया से भरी, कांति और शांति से भरी हैं, और निष्काम भाव से वर देती हैं।
लाभ
- अन्न और घर की समृद्धि की कामना — अन्नपूर्णा अन्न की अधिष्ठात्री देवी हैं।
- मन के विश्राम का भाव — "जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम"।
- संकट में शरण — "त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरण रूप तव धाम"।
कब करें पाठ
अन्नपूर्णा जयंती पर · शुक्रवार को · रसोई में नए अन्न के पूजन पर
स्रोत
रचयिता: अज्ञात (किसी प्रति में नाम नहीं). drikpanchang.com — श्री अन्नपूर्णा माता जी की आरती (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — अन्नपूर्णा आरती · bhaktvatsal.com — आरती अन्नपूर्णा माता जी की
