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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री अन्नपूर्णा माता आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय अन्नपूर्णा माता, मैया जय अन्नपूर्णा माता। जगत-पालिनी जननी, तू सबकी सुखदाता॥

2

कर में कनक कमण्डलु, कर में अन्न-थाली। भूखे को अन्न देती, तू दीनन-प्रतिपाली॥

3

काशी पुरी विराजत, शिव संग शोभा पाती। भिक्षा शिव को देती, जग की क्षुधा मिटाती॥

4

धन-धान्य भर देती, घर-घर खुशहाली। शरण पड़े की रक्षा, करती हो महतारी॥

5

अन्नपूर्णा माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। अन्न-धन सुख-सम्पति, घर में सदा रहावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे अन्नपूर्णा माता, आपकी जय हो! आप जगत का पालन करने वाली जननी तथा सबको सुख देने वाली हैं।
  2. एक हाथ में स्वर्ण-कमण्डलु व दूसरे हाथ में अन्न की थाली धारण किए; भूखों को अन्न देती हैं और दीनों का पालन करती हैं।
  3. आप काशी पुरी में शिव के संग सुशोभित होती हैं; स्वयं शिव को भिक्षा देती हैं और समस्त जगत की भूख मिटाती हैं।
  4. आप घर-घर को धन-धान्य व खुशहाली से भर देती हैं; हे माता, आप शरण में आए हुए जनों की रक्षा करती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से अन्नपूर्णा माँ की यह आरती गाता है, उसके घर में अन्न, धन व सुख-सम्पत्ति सदा बनी रहती है।

लाभ

  • घर में अन्न, धन व समृद्धि की कमी नहीं रहती।
  • रसोई व भोजन में बरकत बनी रहती है।
  • परिवार में सुख-शांति व संतोष आता है।

कब करें पाठ

अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर · शुक्रवार को · रसोई-पूजन व भोजन-आरंभ में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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