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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री अयप्पा आरती
आरती
पाठ
1
जय अयप्पा स्वामी, जय हरिहरपुत्रा। सबरीमला विराजे, करूँ मैं तव सेवा॥
2
हरि-हर के तुम नंदन, ब्रह्मचारी रूपा। योग-मुद्रा में बैठे, तेज अनूपा॥
3
अठारह सीढ़ी चढ़कर, भक्त दर्शन पाते। "स्वामिये शरणम्" कहकर, मन को हर्षाते॥
4
भय-संकट सब हरते, मनोरथ पूरण। शरण पड़े की रक्षा, करते दुख-चूरण॥
5
अयप्पा की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-संकट सब मिटते, मनवांछित पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे अयप्पा स्वामी, हे हरिहरपुत्र, आपकी जय हो! सबरीमला में विराजमान आपकी मैं सेवा करता हूँ।
- आप हरि व हर के पुत्र, ब्रह्मचारी स्वरूप हैं; योग-मुद्रा में विराजमान आपका तेज अनुपम है।
- अठारह पवित्र सीढ़ियाँ चढ़कर भक्त दर्शन पाते हैं; "स्वामिये शरणम् अयप्पा" कहकर अपने मन को हर्षित करते हैं।
- आप भय-संकट हर लेते हैं और मनोरथ पूर्ण करते हैं; शरण में आए जनों की रक्षा कर उनके दुःख चूर कर देते हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से अयप्पा की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह मनोवांछित फल पाता है।
लाभ
- भय, संकट व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
- मन में संयम, भक्ति व आत्मबल बढ़ता है।
- मनोकामना पूर्ण होकर सुख-शांति प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
मण्डल काल (व्रत के 41 दिन) में · मकर संक्रांति (मकरविलक्कु) पर · शनिवार व नित्य संध्या में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
