हरिवरासनम् — श्री अयप्पा शयन-गीत

harivarāsanam — śrī ayyappā śayana-gīta

Ayyappa Aarti — Harivarasanam (Hariharatmaja Ashtakam)

समय
5 मिनट
श्लोक/चौपाई
9
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
मण्डल काल; मकर संक्रांति (मकरविलक्कु); संध्या पूजा का समापन
उद्देश्य:शरणागति (Surrender)शांति (Peace)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण

हरिवरासनम् भगवान अयप्पा का संस्कृत शयन-गीत है, जो सबरीमला में रात को मंदिर के कपाट बंद होने से पहले गाया जाता है। इसके आठ श्लोक हैं, हर श्लोक "हरिहरात्मजं देवमाश्रये" — हरि-हर के पुत्र देव की शरण लेता हूँ — पर रुकता है, और बीच में टेक आती है: "शरणं अय्यप्पा स्वामि शरणं अय्यप्पा"।

परिचय

स्रोत: "हरिवरासनं विश्वमोहनम्" — श्री हरिहरात्मजाष्टकम्; सबरीमला में रात को मंदिर बंद करने से पहले गाया जाने वाला शयन-गीत

एक नज़र में

मंत्र / पाठहरिवरासनम् — श्री अयप्पा शयन-गीत
IASTharivarāsanam — śrī ayyappā śayana-gīta
मूल स्रोत"हरिवरासनं विश्वमोहनम्" — श्री हरिहरात्मजाष्टकम्; सबरीमला में रात को मंदिर बंद करने से पहले गाया जाने वाला शयन-गीत
शुभ दिनमण्डल काल; मकर संक्रांति (मकरविलक्कु); संध्या पूजा का समापन
पाठ समय5 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

अयप्पा की पूजा में आरती की जगह जो गीत सबसे अधिक गाया जाता है, वह हरिवरासनम् है — यह आरती से अधिक लोरी है, जिससे दिन के अंत में भगवान को सुलाया जाता है।

नाम (श्लोक 1). "हरिवरासनं विश्वमोहनम्" — श्रेष्ठ आसन पर विराजमान, विश्व को मोहित करने वाले; शत्रुओं का नाश करने वाले और नित्य नृत्य करने वाले।

हरि-हर के पुत्र. हर श्लोक का अंत "हरिहरात्मजं देवमाश्रये" है — अयप्पा को हरि (विष्णु) और हर (शिव) का पुत्र माना जाता है।

वाहन (श्लोक 4, 7). "तुरगवाहनं सुन्दराननम्" — घोड़े की सवारी करने वाले, सुंदर मुख वाले; और श्लोक 7 में हाथी, सिंह और घोड़े — तीनों वाहन।

रचयिता. यह 20वीं सदी की रचना है, और इसके रचयिता पर मतभेद है — कुछ इसे कोन्नकथु जानकी अम्मा (1923) की रचना मानते हैं, कुछ कुम्बकुडी कुलथुर श्रीनिवास अय्यर (1947) की।

आरती (लिरिक्स)

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हरिवरासनं विश्वमोहनम्, हरिदधीश्वरं आराध्यपादुकम्। अरिविमर्दनं नित्यनर्तनम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जो श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, विश्व को मोहित करते हैं, जिनकी पादुकाएँ पूजनीय हैं, जो शत्रुओं का नाश करते और नित्य नृत्य करते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

शरणं अय्यप्पा स्वामि, शरणं अय्यप्पा॥

(टेक) हे स्वामी अय्यप्पा, आप ही शरण हैं।

शरणकीर्तनं भक्तमानसम्, भरणलोलुपं नर्तनालसम्। अरुणभासुरं भूतनायकम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जिनका कीर्तन शरण देता है, जो भक्तों के मन में बसते हैं, जगत का पालन करने को उत्सुक और नृत्य में मग्न हैं, जो उगते सूर्य जैसे चमकते और सब प्राणियों के स्वामी हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

प्रणयसत्यकं प्राणनायकम्, प्रणतकल्पकं सुप्रभाञ्चितम्। प्रणवमन्दिरं कीर्तनप्रियम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जो प्रेम और सत्य के रूप हैं, प्राणों के स्वामी हैं, शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष हैं और सुंदर तेज से शोभित हैं, जो ॐकार के मंदिर हैं और कीर्तन से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

तुरगवाहनं सुन्दराननम्, वरगदायुधं वेदवर्णितम्। गुरुकृपाकरं कीर्तनप्रियम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जो घोड़े पर सवारी करते हैं, जिनका मुख सुंदर है, श्रेष्ठ गदा जिनका आयुध है, जिनका वर्णन वेद करते हैं, जो गुरु की तरह कृपा करते और कीर्तन से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

त्रिभुवनार्चितं देवतात्मकम्, त्रिनयनप्रभुं दिव्यदेशिकम्। त्रिदशपूजितं चिन्तितप्रदम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जिनकी तीनों लोक पूजा करते हैं, जो देवताओं के आत्मा हैं, त्रिनेत्र (शिव) के प्रभु-रूप, दिव्य गुरु हैं, देवता जिनकी पूजा करते हैं और जो मन की इच्छा पूरी करते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

भवभयापहं भावुकावकम्, भुवनमोहनं भूतिभूषणम्। धवलवाहनं दिव्यवारणम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जो संसार का भय हरते हैं, भक्तों की रक्षा करते हैं, जगत को मोहित करते हैं, भस्म जिनका आभूषण है, और जिनका वाहन श्वेत दिव्य हाथी है — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

कलमृदुस्मितं सुन्दराननम्, कलभकोमलं गात्रमोहनम्। कलभकेसरीवाजिवाहनम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जिनकी मुस्कान मधुर और कोमल है, मुख सुंदर है, शरीर हाथी के बच्चे जैसा कोमल और मनमोहक है, और जिनके वाहन हाथी, सिंह और घोड़ा हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

श्रितजनप्रियं चिन्तितप्रदम्, श्रुतिविभूषणं साधुजीवनम्। श्रुतिमनोहरं गीतलालसम्, हरिहरात्मजं देवमाश्रये॥

जो शरणागतों को प्रिय हैं, मन की इच्छा पूरी करते हैं, वेदों के आभूषण हैं, साधुओं के जीवन हैं, सुनने में मनोहर हैं और गीत से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. जो श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, विश्व को मोहित करते हैं, जिनकी पादुकाएँ पूजनीय हैं, जो शत्रुओं का नाश करते और नित्य नृत्य करते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  2. (टेक) हे स्वामी अय्यप्पा, आप ही शरण हैं।
  3. जिनका कीर्तन शरण देता है, जो भक्तों के मन में बसते हैं, जगत का पालन करने को उत्सुक और नृत्य में मग्न हैं, जो उगते सूर्य जैसे चमकते और सब प्राणियों के स्वामी हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  4. जो प्रेम और सत्य के रूप हैं, प्राणों के स्वामी हैं, शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष हैं और सुंदर तेज से शोभित हैं, जो ॐकार के मंदिर हैं और कीर्तन से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  5. जो घोड़े पर सवारी करते हैं, जिनका मुख सुंदर है, श्रेष्ठ गदा जिनका आयुध है, जिनका वर्णन वेद करते हैं, जो गुरु की तरह कृपा करते और कीर्तन से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  6. जिनकी तीनों लोक पूजा करते हैं, जो देवताओं के आत्मा हैं, त्रिनेत्र (शिव) के प्रभु-रूप, दिव्य गुरु हैं, देवता जिनकी पूजा करते हैं और जो मन की इच्छा पूरी करते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  7. जो संसार का भय हरते हैं, भक्तों की रक्षा करते हैं, जगत को मोहित करते हैं, भस्म जिनका आभूषण है, और जिनका वाहन श्वेत दिव्य हाथी है — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  8. जिनकी मुस्कान मधुर और कोमल है, मुख सुंदर है, शरीर हाथी के बच्चे जैसा कोमल और मनमोहक है, और जिनके वाहन हाथी, सिंह और घोड़ा हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।
  9. जो शरणागतों को प्रिय हैं, मन की इच्छा पूरी करते हैं, वेदों के आभूषण हैं, साधुओं के जीवन हैं, सुनने में मनोहर हैं और गीत से प्रसन्न होते हैं — उन हरि-हर के पुत्र देव की मैं शरण लेता हूँ।

लाभ

  • शरणागति का भाव — हर श्लोक "हरिहरात्मजं देवमाश्रये" पर रुकता है।
  • संसार के भय से छुटकारे का भाव — "भवभयापहं भावुकावकम्" (श्लोक 6)।
  • दिन की पूजा का शांत समापन — यह शयन-गीत है।

कब करें पाठ

मण्डल काल (व्रत के 41 दिन) मेंमकर संक्रांति (मकरविलक्कु) परसंध्या या रात्रि पूजा के अंत में

पाठ विधि

दिन की पूजा के अंत में दीपक जलाकर शांत स्वर में गाएँ। हर श्लोक के बाद टेक "शरणं अय्यप्पा स्वामि शरणं अय्यप्पा" दोहराई जाती है। सबरीमला में यह गीत रात को कपाट बंद होने से पहले गाया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराdharmsutra.org — हरिवरासनम् (आधार-पाठ) · vignanam.org — हरिवरासनम् (हरिहरात्मज अष्टकम्) · hinduismfaq.com — हरिवरासनं (हिन्दी अर्थ सहित) · bhaktibharat.com — हरिवरासनं · arunmishra-rashmirekh.blogspot.com — हरिवरासनं: भगवान अयप्पा का शयन गीत (रचयिता व परंपरा)
रचयितामतभेद — कोन्नकथु जानकी अम्मा (1923) या कुम्बकुडी कुलथुर श्रीनिवास अय्यर (1947)
अंतिम अद्यतनअक्टूबर 2026

हरिवरासनम् — श्री अयप्पा शयन-गीत — सामान्य प्रश्न

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