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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री बद्रीनाथ आरती
आरती · श्री विष्णु
पाठ
1
पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्। निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
2
शेष सुमिरन करत निशदिन, धरत ध्यान महेश्वरम्। वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
3
नर-नारायण तप करते, अलकनंदा पावनम्। हिमगिरि में धाम सोहे, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
4
भक्तन के दुख हरते, देते मोक्ष-पद सुखकरम्। जो जन तेरे दर आए, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
5
बद्रीनाथ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भक्ति-मुक्ति वह पावे, हरि-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- मंद, सुगंधित व शीतल पवन बहती है, स्वर्णिम मंदिर सुशोभित है; निकट ही निर्मल गंगा (अलकनंदा) बहती है — ऐसे विश्व का भरण करने वाले श्री बद्रीनाथ की (जय)।
- शेषनाग दिन-रात आपका स्मरण करते हैं, महेश्वर (शिव) आपका ध्यान धरते हैं; वेद व ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
- यहाँ नर व नारायण ने तप किया, अलकनंदा अति पावन है; हिमालय में आपका धाम सुशोभित है — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
- आप भक्तों के दुःख हरते हैं और सुखद मोक्ष-पद देते हैं; जो भी आपके द्वार आता है (वह तर जाता है) — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
- जो भक्त श्रद्धा से बद्रीनाथ की यह आरती गाता है, वह भक्ति व मुक्ति तथा हरि (विष्णु) की कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- भक्ति, सुख-शांति व आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है।
- पापों का नाश होकर मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है।
- मन को निर्मलता व विष्णु-कृपा प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
एकादशी व नित्य संध्या में · चारधाम यात्रा/दर्शन के समय · गुरुवार को
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
