1पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्।
निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
मंद, सुगंधित व शीतल पवन बहती है, स्वर्णिम मंदिर सुशोभित है; निकट ही निर्मल गंगा (अलकनंदा) बहती है — ऐसे विश्व का भरण करने वाले श्री बद्रीनाथ की (जय)।
2शेष सुमिरन करत निशदिन, धरत ध्यान महेश्वरम्।
वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
शेषनाग दिन-रात आपका स्मरण करते हैं, महेश्वर (शिव) आपका ध्यान धरते हैं; वेद व ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
3नर-नारायण तप करते, अलकनंदा पावनम्।
हिमगिरि में धाम सोहे, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
यहाँ नर व नारायण ने तप किया, अलकनंदा अति पावन है; हिमालय में आपका धाम सुशोभित है — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
4भक्तन के दुख हरते, देते मोक्ष-पद सुखकरम्।
जो जन तेरे दर आए, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
आप भक्तों के दुःख हरते हैं और सुखद मोक्ष-पद देते हैं; जो भी आपके द्वार आता है (वह तर जाता है) — हे विश्वम्भर श्री बद्रीनाथ।
5बद्रीनाथ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे।
भक्ति-मुक्ति वह पावे, हरि-कृपा पावे॥
जो भक्त श्रद्धा से बद्रीनाथ की यह आरती गाता है, वह भक्ति व मुक्ति तथा हरि (विष्णु) की कृपा प्राप्त करता है।