श्री विष्णु आरती

śrī viṣṇu āratī

Vishnu Aarti (Om Jai Jagdish Hare)

समय
4–5 मिनट
श्लोक/चौपाई
8
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
एकादशी, गुरुवार, सत्यनारायण व्रत; नित्य संध्या
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)संकट-निवारण (Relief from troubles)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण

"ॐ जय जगदीश हरे" भगवान विष्णु की सबसे प्रचलित आरती है, जिसे पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग 1870 ई. में रचा। इसमें आठ पद हैं और हर पद के बाद टेक "ॐ जय जगदीश हरे" गाई जाती है। यह किसी एक देवता तक सीमित नहीं रही — उत्तर भारत में लगभग हर पूजा इसी आरती से पूरी होती है।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: "ॐ जय जगदीश हरे" — पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की रचना (लगभग 1870 ई.)

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री विष्णु आरती
IASTśrī viṣṇu āratī
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोत"ॐ जय जगदीश हरे" — पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी की रचना (लगभग 1870 ई.)
शुभ दिनएकादशी, गुरुवार, सत्यनारायण व्रत; नित्य संध्या
पाठ समय4–5 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सीधी भाषा है — इसमें कोई कथा नहीं, कोई रूप-वर्णन नहीं, केवल भक्त और भगवान का संबंध है।

संकट-हरण (पद 1–2). पहला ही पद कहता है कि जगदीश भक्तों के संकट "क्षण में दूर करे", और दूसरा पद फल गिनाता है — मन का दुख मिटे, घर में सुख-संपत्ति आए, तन का कष्ट मिटे।

शरणागति (पद 3–4). "मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी" — यह आरती का केंद्र है। भगवान को माता-पिता कहकर भक्त पूछता है कि आपके सिवा किसकी शरण जाऊँ। फिर वही भगवान "पूरण परमात्मा", "अन्तर्यामी" और "पारब्रह्म परमेश्वर" भी हैं — अपनापन और विराटता एक साथ।

अपनी कमी का स्वीकार (पद 5–6). "मैं मूरख फलकामी" — मैं मूर्ख हूँ और फल की कामना से पूजता हूँ; और "किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति" — मुझ कुबुद्धि को आप कैसे मिलें। आरती भक्त को विनम्र बनाकर ही आगे बढ़ती है।

याचना (पद 7–8). अंत में माँग धन या पद की नहीं — "विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा; श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा"।

रचयिता. पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837–1881) पंजाब के फिल्लौर के विद्वान थे; यह आरती उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना बनी।

आरती (लिरिक्स)

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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

हे जगत के स्वामी श्रीहरि, आपकी जय हो, जय हो! आप भक्तजनों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

जो आपका ध्यान करता है, वह फल पाता है और उसके मन का दुख नष्ट हो जाता है; उसके घर सुख-संपत्ति आती है और तन का कष्ट मिट जाता है।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥

आप ही मेरे माता-पिता हैं — मैं और किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा करूँ।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं; आप परब्रह्म परमेश्वर हैं, सबके स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, कृपा करो भर्ता॥

आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं; मैं मूर्ख हूँ, फल की कामना रखने वाला — हे स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

आप एक हैं, इन्द्रियों से परे हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं; हे दयामय, मैं कुबुद्धि आपसे किस विधि मिलूँ?

दीनबन्धु दुःखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

आप दीनों के बंधु और दुख हरने वाले हैं, आप ही मेरे ठाकुर हैं; अपना हाथ उठाकर (आशीर्वाद दीजिए) — मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

हे देव, विषयों के विकार मिटाइए और पाप हर लीजिए; मुझमें श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा का भाव बढ़ाइए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे जगत के स्वामी श्रीहरि, आपकी जय हो, जय हो! आप भक्तजनों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।
  2. जो आपका ध्यान करता है, वह फल पाता है और उसके मन का दुख नष्ट हो जाता है; उसके घर सुख-संपत्ति आती है और तन का कष्ट मिट जाता है।
  3. आप ही मेरे माता-पिता हैं — मैं और किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा करूँ।
  4. आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं; आप परब्रह्म परमेश्वर हैं, सबके स्वामी हैं।
  5. आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं; मैं मूर्ख हूँ, फल की कामना रखने वाला — हे स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए।
  6. आप एक हैं, इन्द्रियों से परे हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं; हे दयामय, मैं कुबुद्धि आपसे किस विधि मिलूँ?
  7. आप दीनों के बंधु और दुख हरने वाले हैं, आप ही मेरे ठाकुर हैं; अपना हाथ उठाकर (आशीर्वाद दीजिए) — मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
  8. हे देव, विषयों के विकार मिटाइए और पाप हर लीजिए; मुझमें श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा का भाव बढ़ाइए।

लाभ

  • संकट के समय का पाठ — पहला ही पद कहता है कि जगदीश भक्तों के संकट "क्षण में दूर करे"।
  • दूसरा पद फल गिनाता है — मन का दुख मिटे, घर में सुख-संपत्ति आए, तन का कष्ट मिटे।
  • विनम्रता और शरणागति का भाव — "मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी"।
  • अंतिम पद की माँग आत्म-शुद्धि की है — विषय-विकार मिटें, श्रद्धा-भक्ति बढ़े।

कब करें पाठ

एकादशी व गुरुवार कोसत्यनारायण व्रत-कथा के बादप्रातः व संध्या पूजा के अंत में

पाठ विधि

भगवान विष्णु के समक्ष घी का दीप या कपूर जलाएँ, तुलसीदल और पीले पुष्प अर्पित करें, और थाली को घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आरती गाएँ। गाने का प्रचलित ढंग: हर पद की पहली पंक्ति के बाद उसका उत्तरार्ध "स्वामी …" कहकर दोहराएँ (जैसे "जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का — स्वामी दुःख बिनसे मन का"), और हर पद के बाद टेक "ॐ जय जगदीश हरे" गाएँ। आठों पद पूरे होने पर आरती की लौ पर हाथ घुमाकर माथे से लगाएँ।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — आरती: ॐ जय जगदीश हरे (आधार-पाठ) · srimandir.com — ॐ जय जगदीश हरे आरती · vedadhara.com — जय जगदीश हरे आरती · drikpanchang.com — श्री जगदीशजी की आरती · रचयिता व काल: en.wikipedia.org — Om Jai Jagdish Hare; bharatdiscovery.org — पंडित श्रद्धाराम शर्मा
रचयितापं. श्रद्धाराम फिल्लौरी
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
संबंधित वारगुरुवार
मुख्य मंत्रॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्री विष्णु के पाठ
सभी पाठ देखें

श्री विष्णु आरती — सामान्य प्रश्न

श्री विष्णु भक्ति संग्रह

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