समय
4–5 मिनट
श्लोक/चौपाई
8
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
एकादशी, गुरुवार, सत्यनारायण व्रत; नित्य संध्या
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)संकट-निवारण (Relief from troubles)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण
"ॐ जय जगदीश हरे" भगवान विष्णु की सबसे प्रचलित आरती है, जिसे पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग 1870 ई. में रचा। इसमें आठ पद हैं और हर पद के बाद टेक "ॐ जय जगदीश हरे" गाई जाती है। यह किसी एक देवता तक सीमित नहीं रही — उत्तर भारत में लगभग हर पूजा इसी आरती से पूरी होती है।
FAQ
श्री विष्णु आरती — सामान्य प्रश्न
पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने, लगभग 1870 ई. में। वे पंजाब के फिल्लौर के विद्वान थे (1837–1881), और यह आरती उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना बनी।
आठ — "ॐ जय जगदीश हरे" से "विषय-विकार मिटाओ" तक। चारों प्रकाशित प्रतियों में ये आठों पद हैं। हर पद के बाद टेक "ॐ जय जगदीश हरे" गाई जाती है।
भगवान विष्णु (जगदीश — जगत के ईश) की। पर यह इतनी प्रचलित है कि उत्तर भारत में लगभग हर पूजा और व्रत-कथा — विशेषकर सत्यनारायण कथा — के अंत में यही आरती गाई जाती है।
द्रिक पंचांग जैसे कुछ प्रकाशक अंत में एक फलश्रुति-पद देते हैं — "श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे; कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे"। बाक़ी तीन प्रकाशित प्रतियों में यह पद नहीं है, इसलिए यहाँ मूल आठ पद ही दिए गए हैं। "कहत शिवानन्द स्वामी" की यही पंक्ति शिव जी और अम्बे जी की आरती की फलश्रुति में भी आती है।
भक्त स्वयं को मूर्ख और "फलकामी" — यानी फल की कामना से पूजा करने वाला — कहता है, और फिर भी भगवान से कृपा माँगता है। यह आरती का सबसे विनम्र स्वर है। द्रिक पंचांग यहाँ "मैं मूरख खल कामी" (मूर्ख, दुष्ट और कामी) छापता है; बाक़ी तीन प्रतियाँ "फलकामी"।
चार प्रकाशित प्रतियों से — भक्तिभारत (आधार), श्रीमंदिर, वेदधारा और द्रिक पंचांग। आठों पद चारों में हैं; जहाँ द्रिक अकेला अलग पढ़ता है, वहाँ बाक़ी तीन का पाठ रखा गया है।
पर्व
