समय
4 मिनट
श्लोक/चौपाई
9
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
पूर्णिमा; सत्यनारायण व्रत-कथा के बाद; शुभ अवसर
उद्देश्य:मनोकामना (Wish fulfilment)समृद्धि (Prosperity)शुभ आरम्भ (Auspicious beginnings)
✓ संपूर्ण
"जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा" सत्यनारायण व्रत-कथा के अंत में गाई जाने वाली आरती है। इसके नौ पद पूरी व्रत-कथा को संक्षेप में दोहराते हैं — बूढ़े ब्राह्मण के वेश में दर्शन, लकड़हारे और राजा पर कृपा, श्रद्धा छोड़ने वाले वैश्य का फल, और अंत में प्रसाद: "चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल, मेवा"।
FAQ
श्री सत्यनारायण आरती — सामान्य प्रश्न
नौ — आठ स्तुति-पद और एक फलश्रुति। पाँचों प्रकाशित प्रतियों में आठों स्तुति-पद हैं। हर पद के बाद टेक "जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा" गाई जाती है।
पद 3 से 7 में — बूढ़े ब्राह्मण के वेश में एक ब्राह्मण को दर्शन और उसके घर को सोने का महल बनाना; दुर्बल भील (लकड़हारे) पर कृपा; राजा चन्द्रचूड़ की विपत्ति हरना; मनोरथ पाकर श्रद्धा छोड़ने वाले वैश्य का फल भोगना; और ग्वाल-बालों के संग वन में भक्ति करने वाले राजा को मनचाहा फल।
फलश्रुति के दो प्रचलित रूप हैं। भक्तिभारत, हिंदूनिधि और वेबदुनिया "ऋद्धि-सिद्ध सुख-संपत्ति, सहज रूप पावे" छापते हैं; द्रिक पंचांग और भक्तवत्सल "कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे"। यहाँ तीन प्रतियों वाला रूप रखा गया है। "कहत शिवानन्द स्वामी" वाली पंक्ति शिव जी और अम्बे जी की आरती की फलश्रुति में भी आती है।
लक्ष्मी के रमण, यानी लक्ष्मी के पति — भगवान विष्णु। सत्यनारायण विष्णु का ही स्वरूप हैं, इसलिए आरती उन्हें "लक्ष्मी रमणा" कहकर पुकारती है।
पाँच प्रकाशित प्रतियों से — भक्तिभारत (आधार), हिंदूनिधि, वेबदुनिया, द्रिक पंचांग और भक्तवत्सल। आठों स्तुति-पद पाँचों में हैं; फलश्रुति का रूप तीन प्रतियों वाला रखा गया है।
पर्व
