विष्णु सुनिए विनय,
सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ,
दीजै ज्ञान बताय॥
हे विष्णु, चित्त लगाकर इस सेवक की विनती सुनिए। मैं आपकी कुछ कीर्ति का वर्णन करना चाहता हूँ — मुझे वह ज्ञान बताकर दीजिए।
1नमो विष्णु भगवान खरारी।
कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
हे भगवान विष्णु, खर नामक असुर के शत्रु, आपको नमस्कार; आप कष्ट नष्ट करने वाले और सर्वत्र विचरने वाले हैं।
2प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।
त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
जगत में आपकी शक्ति प्रबल है; तीनों लोकों में आपका उजाला फैला हुआ है।
3सुन्दर रूप मनोहर सूरत।
सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
आपका रूप सुंदर और सूरत मनोहर है; स्वभाव सरल और मूर्ति मोहिनी है।
4तन पर पीताम्बर अति सोहत।
बैजन्ती माला मन मोहत॥
शरीर पर पीताम्बर अत्यंत सुशोभित है; वैजयंती माला मन मोह लेती है।
5शंख चक्र कर गदा बिराजे।
देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
हाथों में शंख, चक्र और गदा विराजते हैं; इन्हें देखते ही दैत्यों और असुरों के दल भाग जाते हैं।
6सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।
काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
जहाँ सत्य और धर्म हैं, वहाँ मद और लोभ नहीं गरजते; काम, क्रोध, मद और लोभ शोभा नहीं पाते।
7सन्तभक्त सज्जन मनरंजन।
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
आप संतों, भक्तों और सज्जनों का मन प्रसन्न करने वाले हैं; दानवों, असुरों और दुष्टों के दल का नाश करने वाले।
8सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।
दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
आप सुख उपजाते और सब कष्ट तोड़ देते हैं; दोष मिटाकर जन को सज्जन बना देते हैं।
9पाप काट भव सिन्धु उतारण।
कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
पाप काटकर भव-सागर से पार उतारने वाले; कष्ट नष्ट कर भक्तों का उद्धार करने वाले।
10करत अनेक रूप प्रभु धारण।
केवल आप भक्ति के कारण॥
हे प्रभु, आप अनेक रूप धारण करते हैं — और वह केवल भक्ति के कारण।
11धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।
तब तुम रूप राम का धारा॥
पृथ्वी ने गौ बनकर आपको पुकारा, तब आपने राम का रूप धारण किया।
12भार उतार असुर दल मारा।
रावण आदिक को संहारा॥
आपने पृथ्वी का भार उतारा, असुर-दल को मारा और रावण आदि का संहार किया।
13आप वाराह रूप बनाया।
हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
आपने वाराह रूप धारण किया और हिरण्याक्ष को मार गिराया।
14धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया।
चौदह रतनन को निकलाया॥
मत्स्य शरीर धारण कर समुद्र को मथवाया और चौदह रत्न निकलवाए।
15अमिलख असुरन द्वन्द मचाया।
रूप मोहनी आप दिखाया॥
अमृत के लिए असुरों ने झगड़ा मचाया, तब आपने मोहिनी रूप दिखाया।
16देवन को अमृत पान कराया।
असुरन को छबि से बहलाया॥
देवताओं को अमृत पान कराया और असुरों को अपनी छवि से बहला दिया।
17कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया।
मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
कूर्म रूप धारण कर समुद्र मथा और मंदराचल पर्वत को तुरंत उठा लिया।
18शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।
भस्मासुर को रूप दिखाया॥
आपने शंकर जी को फंदे से छुड़ाया और भस्मासुर को अपना (मोहिनी) रूप दिखाया।
19वेदन को जब असुर डुबाया।
कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
जब असुर ने वेदों को डुबा दिया, तब आपने प्रबंध करके उन्हें ढुँढवाया।
20मोहित बनकर खलहि नचाया।
उसही कर से भस्म कराया॥
मोहिनी बनकर उस दुष्ट को नचाया और उसी के हाथ से उसे भस्म करा दिया।
21असुर जलंधर अति बलदाई।
शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
जलंधर असुर अत्यंत बलशाली था; उसने शंकर जी से युद्ध किया।
22हार पार शिव सकल बनाई।
कीन सती से छल खल जाई॥
शिव जी ने सब प्रकार से प्रयत्न किया; उस दुष्ट ने जाकर सती से छल किया।
23सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।
बतलाई सब विपत कहानी॥
शिवरानी (पार्वती) ने आपका स्मरण किया और सारी विपत्ति की कहानी बताई।
24तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।
वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
तब आपने ज्ञानी मुनीश्वर का रूप लिया और वृंदा की सुध-बुध भुला दी।
25देखत तीन दनुज शैतानी।
वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
दानव की शैतानी देखकर वृंदा आकर आपसे लिपट गई।
26हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।
हना असुर उर शिव शैतानी॥
स्पर्श से धर्म की क्षति मानी गई; और शिव जी ने उस असुर की शैतानी का अंत कर दिया।
27तुमने धुरू प्रहलाद उबारे।
हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
आपने ध्रुव और प्रह्लाद का उद्धार किया; हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों को मारा।
28गणिका और अजामिल तारे।
बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
गणिका और अजामिल को तारा; बहुत से भक्तों को भव-सागर से पार उतारा।
29हरहु सकल संताप हमारे।
कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
हमारे सारे संताप हर लीजिए; हे सृष्टि रचने वाले हरि, कृपा कीजिए।
30देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे।
दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
मैं आपके दर्शन कर पाऊँ; हे दीनबंधु, हे भक्तों का हित करने वाले।
31चहत आपका सेवक दर्शन।
करहु दया अपनी मधुसूदन॥
आपका सेवक दर्शन चाहता है; हे मधुसूदन, अपनी दया कीजिए।
32जानूँ नहीं योग्य जप पूजन।
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
मुझे न योग्य जप आता है, न पूजन; न यज्ञ, न स्तुति, न अनुमोदन।
33शीलदया सन्तोष सुलक्षण।
विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
शील, दया, संतोष जैसे सुलक्षण भी मुझमें नहीं; व्रत का विलक्षण बोध भी नहीं जानता।
34करहुँ आपका किस विधि पूजन।
कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
फिर किस विधि से आपका पूजन करूँ? अपनी कुमति देखकर भीषण दुःख होता है।
35करहुँ प्रणाम कौन विधि सुमिरण।
कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
किस विधि प्रणाम करूँ, किस विधि स्मरण? किस प्रकार अपने को समर्पित करूँ?
36सुर मुनि करत सदा सिवकाई।
हर्षित रहत परम गति पाई॥
देवता और मुनि सदा आपकी सेवा करते हैं; वे हर्षित रहते हैं और परम गति पाते हैं।
37दीन दुखिन पर सदा सहाई।
निज जन जान लेव अपनाई॥
आप दीन-दुखियों के सदा सहायक हैं; मुझे अपना जन जानकर अपना लीजिए।
38पाप दोष संताप नशाओ।
भव बन्धन से मुक्त कराओ॥
मेरे पाप, दोष और संताप नष्ट कीजिए; भव-बंधन से मुक्त कराइए।
39सुत सम्पति दे सुख उपजाओ।
निज चरनन का दास बनाओ॥
संतान और सम्पत्ति देकर सुख उपजाइए; और अपने चरणों का दास बना लीजिए।
40निगम सदा ये विनय सुनावै।
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
निगम सदा यही विनती सुनाता है — जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह जन सुख पाता है। (यही रचयिता की छाप है।)