श्री विष्णु चालीसा

śrī viṣṇu cālīsā

Vishnu Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
41
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
गुरुवार, एकादशी व नित्य
उद्देश्य:मन की शांति (Peace)मुक्ति (Liberation)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री विष्णु चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। इसका आरंभ "नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी" से होता है। बीच की चौपाइयाँ मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और राम — प्रमुख अवतारों की कथा क्रम से कहती हैं।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: परंपरागत विष्णु चालीसा; अंतिम चौपाई में "निगम" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री विष्णु चालीसा
IASTśrī viṣṇu cālīsā
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोतपरंपरागत विष्णु चालीसा; अंतिम चौपाई में "निगम" की छाप
शुभ दिनगुरुवार, एकादशी व नित्य
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस चालीसा का बीच का हिस्सा अवतार-कथाओं का क्रम है, और वही इसे पढ़ने लायक बनाता है।

पहले पृथ्वी गौ-रूप में पुकारती है और भगवान राम-रूप धरकर भार उतारते हैं (चौपाई 11–12)। फिर वाराह बनकर हिरण्याक्ष का वध (13), मत्स्य रूप में समुद्र-मंथन और चौदह रत्नों का निकलना (14), मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत-पान (15–16), और कूर्म बनकर मंदराचल को धारण करना (17)।

आगे दो कम कही जाने वाली कथाएँ आती हैं। पहली — भस्मासुर से शिव जी को छुड़ाना, जहाँ भगवान मोहिनी बनकर उसी असुर के हाथ से उसे भस्म करा देते हैं (18, 20)। दूसरी — जलंधर और वृंदा का प्रसंग (21–26), जो चालीसाओं में विरले मिलता है।

फिर भक्तों के नाम आते हैं — ध्रुव, प्रह्लाद, गणिका और अजामिल (27–28)। और अंत में विनय: "जानूँ नहीं योग्य जप पूजन… करहुँ प्रणाम कौन विधि सुमिरण" (32–35) — यानी भक्त कहता है कि उसे विधि नहीं आती, केवल भाव है।

अंतिम चौपाई में रचयिता की छाप है — "निगम सदा ये विनय सुनावै"। तीनों प्रकाशित स्रोत यहीं समाप्त होते हैं; समापन दोहा किसी में नहीं है।

संपूर्ण चालीसा

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विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥

हे विष्णु, चित्त लगाकर इस सेवक की विनती सुनिए। मैं आपकी कुछ कीर्ति का वर्णन करना चाहता हूँ — मुझे वह ज्ञान बताकर दीजिए।

नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

हे भगवान विष्णु, खर नामक असुर के शत्रु, आपको नमस्कार; आप कष्ट नष्ट करने वाले और सर्वत्र विचरने वाले हैं।

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

जगत में आपकी शक्ति प्रबल है; तीनों लोकों में आपका उजाला फैला हुआ है।

सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

आपका रूप सुंदर और सूरत मनोहर है; स्वभाव सरल और मूर्ति मोहिनी है।

तन पर पीताम्बर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥

शरीर पर पीताम्बर अत्यंत सुशोभित है; वैजयंती माला मन मोह लेती है।

शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

हाथों में शंख, चक्र और गदा विराजते हैं; इन्हें देखते ही दैत्यों और असुरों के दल भाग जाते हैं।

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

जहाँ सत्य और धर्म हैं, वहाँ मद और लोभ नहीं गरजते; काम, क्रोध, मद और लोभ शोभा नहीं पाते।

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

आप संतों, भक्तों और सज्जनों का मन प्रसन्न करने वाले हैं; दानवों, असुरों और दुष्टों के दल का नाश करने वाले।

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

आप सुख उपजाते और सब कष्ट तोड़ देते हैं; दोष मिटाकर जन को सज्जन बना देते हैं।

पाप काट भव सिन्धु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

पाप काटकर भव-सागर से पार उतारने वाले; कष्ट नष्ट कर भक्तों का उद्धार करने वाले।

करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥

हे प्रभु, आप अनेक रूप धारण करते हैं — और वह केवल भक्ति के कारण।

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥

पृथ्वी ने गौ बनकर आपको पुकारा, तब आपने राम का रूप धारण किया।

भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥

आपने पृथ्वी का भार उतारा, असुर-दल को मारा और रावण आदि का संहार किया।

आप वाराह रूप बनाया। हिरण्याक्ष को मार गिराया॥

आपने वाराह रूप धारण किया और हिरण्याक्ष को मार गिराया।

धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥

मत्स्य शरीर धारण कर समुद्र को मथवाया और चौदह रत्न निकलवाए।

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥

अमृत के लिए असुरों ने झगड़ा मचाया, तब आपने मोहिनी रूप दिखाया।

देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छबि से बहलाया॥

देवताओं को अमृत पान कराया और असुरों को अपनी छवि से बहला दिया।

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया। मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥

कूर्म रूप धारण कर समुद्र मथा और मंदराचल पर्वत को तुरंत उठा लिया।

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥

आपने शंकर जी को फंदे से छुड़ाया और भस्मासुर को अपना (मोहिनी) रूप दिखाया।

वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥

जब असुर ने वेदों को डुबा दिया, तब आपने प्रबंध करके उन्हें ढुँढवाया।

मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥

मोहिनी बनकर उस दुष्ट को नचाया और उसी के हाथ से उसे भस्म करा दिया।

असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥

जलंधर असुर अत्यंत बलशाली था; उसने शंकर जी से युद्ध किया।

हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥

शिव जी ने सब प्रकार से प्रयत्न किया; उस दुष्ट ने जाकर सती से छल किया।

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥

शिवरानी (पार्वती) ने आपका स्मरण किया और सारी विपत्ति की कहानी बताई।

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

तब आपने ज्ञानी मुनीश्वर का रूप लिया और वृंदा की सुध-बुध भुला दी।

देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

दानव की शैतानी देखकर वृंदा आकर आपसे लिपट गई।

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥

स्पर्श से धर्म की क्षति मानी गई; और शिव जी ने उस असुर की शैतानी का अंत कर दिया।

तुमने धुरू प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

आपने ध्रुव और प्रह्लाद का उद्धार किया; हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों को मारा।

गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

गणिका और अजामिल को तारा; बहुत से भक्तों को भव-सागर से पार उतारा।

हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

हमारे सारे संताप हर लीजिए; हे सृष्टि रचने वाले हरि, कृपा कीजिए।

देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

मैं आपके दर्शन कर पाऊँ; हे दीनबंधु, हे भक्तों का हित करने वाले।

चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥

आपका सेवक दर्शन चाहता है; हे मधुसूदन, अपनी दया कीजिए।

जानूँ नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

मुझे न योग्य जप आता है, न पूजन; न यज्ञ, न स्तुति, न अनुमोदन।

शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

शील, दया, संतोष जैसे सुलक्षण भी मुझमें नहीं; व्रत का विलक्षण बोध भी नहीं जानता।

करहुँ आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

फिर किस विधि से आपका पूजन करूँ? अपनी कुमति देखकर भीषण दुःख होता है।

करहुँ प्रणाम कौन विधि सुमिरण। कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥

किस विधि प्रणाम करूँ, किस विधि स्मरण? किस प्रकार अपने को समर्पित करूँ?

सुर मुनि करत सदा सिवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥

देवता और मुनि सदा आपकी सेवा करते हैं; वे हर्षित रहते हैं और परम गति पाते हैं।

दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥

आप दीन-दुखियों के सदा सहायक हैं; मुझे अपना जन जानकर अपना लीजिए।

पाप दोष संताप नशाओ। भव बन्धन से मुक्त कराओ॥

मेरे पाप, दोष और संताप नष्ट कीजिए; भव-बंधन से मुक्त कराइए।

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥

संतान और सम्पत्ति देकर सुख उपजाइए; और अपने चरणों का दास बना लीजिए।

निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

निगम सदा यही विनती सुनाता है — जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह जन सुख पाता है। (यही रचयिता की छाप है।)

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

खरारीखर नामक असुर के शत्रु — विष्णु/राम
अखिल बिहारीसर्वत्र विचरने वाले
बैजन्ती मालावैजयंती माला — विष्णु का प्रसिद्ध आभूषण
गंजननाश करने वाला
धरणि धेनुगौ का रूप धरी पृथ्वी
चौदह रतनसमुद्र-मंथन से निकले चौदह रत्न
मन्द्राचलमंदराचल पर्वत — मंथन का दंड
भस्मासुरवह असुर जिसे शिव से वर मिला था; मोहिनी रूप से उसका अंत हुआ
जलंधरवह असुर जिसकी पत्नी वृंदा के पातिव्रत से वह अजेय था
धुरूध्रुव
गणिकावह वेश्या जो नाम-स्मरण से तर गई
अजामिलभागवत का वह पापी जो "नारायण" पुकारकर तर गया

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे विष्णु, चित्त लगाकर इस सेवक की विनती सुनिए। मैं आपकी कुछ कीर्ति का वर्णन करना चाहता हूँ — मुझे वह ज्ञान बताकर दीजिए।
  2. हे भगवान विष्णु, खर नामक असुर के शत्रु, आपको नमस्कार; आप कष्ट नष्ट करने वाले और सर्वत्र विचरने वाले हैं।
  3. जगत में आपकी शक्ति प्रबल है; तीनों लोकों में आपका उजाला फैला हुआ है।
  4. आपका रूप सुंदर और सूरत मनोहर है; स्वभाव सरल और मूर्ति मोहिनी है।
  5. शरीर पर पीताम्बर अत्यंत सुशोभित है; वैजयंती माला मन मोह लेती है।
  6. हाथों में शंख, चक्र और गदा विराजते हैं; इन्हें देखते ही दैत्यों और असुरों के दल भाग जाते हैं।
  7. जहाँ सत्य और धर्म हैं, वहाँ मद और लोभ नहीं गरजते; काम, क्रोध, मद और लोभ शोभा नहीं पाते।
  8. आप संतों, भक्तों और सज्जनों का मन प्रसन्न करने वाले हैं; दानवों, असुरों और दुष्टों के दल का नाश करने वाले।
  9. आप सुख उपजाते और सब कष्ट तोड़ देते हैं; दोष मिटाकर जन को सज्जन बना देते हैं।
  10. पाप काटकर भव-सागर से पार उतारने वाले; कष्ट नष्ट कर भक्तों का उद्धार करने वाले।
  11. हे प्रभु, आप अनेक रूप धारण करते हैं — और वह केवल भक्ति के कारण।
  12. पृथ्वी ने गौ बनकर आपको पुकारा, तब आपने राम का रूप धारण किया।
  13. आपने पृथ्वी का भार उतारा, असुर-दल को मारा और रावण आदि का संहार किया।
  14. आपने वाराह रूप धारण किया और हिरण्याक्ष को मार गिराया।
  15. मत्स्य शरीर धारण कर समुद्र को मथवाया और चौदह रत्न निकलवाए।
  16. अमृत के लिए असुरों ने झगड़ा मचाया, तब आपने मोहिनी रूप दिखाया।
  17. देवताओं को अमृत पान कराया और असुरों को अपनी छवि से बहला दिया।
  18. कूर्म रूप धारण कर समुद्र मथा और मंदराचल पर्वत को तुरंत उठा लिया।
  19. आपने शंकर जी को फंदे से छुड़ाया और भस्मासुर को अपना (मोहिनी) रूप दिखाया।
  20. जब असुर ने वेदों को डुबा दिया, तब आपने प्रबंध करके उन्हें ढुँढवाया।
  21. मोहिनी बनकर उस दुष्ट को नचाया और उसी के हाथ से उसे भस्म करा दिया।
  22. जलंधर असुर अत्यंत बलशाली था; उसने शंकर जी से युद्ध किया।
  23. शिव जी ने सब प्रकार से प्रयत्न किया; उस दुष्ट ने जाकर सती से छल किया।
  24. शिवरानी (पार्वती) ने आपका स्मरण किया और सारी विपत्ति की कहानी बताई।
  25. तब आपने ज्ञानी मुनीश्वर का रूप लिया और वृंदा की सुध-बुध भुला दी।
  26. दानव की शैतानी देखकर वृंदा आकर आपसे लिपट गई।
  27. स्पर्श से धर्म की क्षति मानी गई; और शिव जी ने उस असुर की शैतानी का अंत कर दिया।
  28. आपने ध्रुव और प्रह्लाद का उद्धार किया; हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों को मारा।
  29. गणिका और अजामिल को तारा; बहुत से भक्तों को भव-सागर से पार उतारा।
  30. हमारे सारे संताप हर लीजिए; हे सृष्टि रचने वाले हरि, कृपा कीजिए।
  31. मैं आपके दर्शन कर पाऊँ; हे दीनबंधु, हे भक्तों का हित करने वाले।
  32. आपका सेवक दर्शन चाहता है; हे मधुसूदन, अपनी दया कीजिए।
  33. मुझे न योग्य जप आता है, न पूजन; न यज्ञ, न स्तुति, न अनुमोदन।
  34. शील, दया, संतोष जैसे सुलक्षण भी मुझमें नहीं; व्रत का विलक्षण बोध भी नहीं जानता।
  35. फिर किस विधि से आपका पूजन करूँ? अपनी कुमति देखकर भीषण दुःख होता है।
  36. किस विधि प्रणाम करूँ, किस विधि स्मरण? किस प्रकार अपने को समर्पित करूँ?
  37. देवता और मुनि सदा आपकी सेवा करते हैं; वे हर्षित रहते हैं और परम गति पाते हैं।
  38. आप दीन-दुखियों के सदा सहायक हैं; मुझे अपना जन जानकर अपना लीजिए।
  39. मेरे पाप, दोष और संताप नष्ट कीजिए; भव-बंधन से मुक्त कराइए।
  40. संतान और सम्पत्ति देकर सुख उपजाइए; और अपने चरणों का दास बना लीजिए।
  41. निगम सदा यही विनती सुनाता है — जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह जन सुख पाता है। (यही रचयिता की छाप है।)

लाभ

  • मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और राम — प्रमुख अवतारों की कथा एक ही पाठ में।
  • भस्मासुर और जलंधर-वृंदा जैसे कम कहे जाने वाले प्रसंग भी इसमें आते हैं।
  • गुरुवार और एकादशी की पूजा का प्रमुख पाठ।
  • अंतिम आठ चौपाइयाँ विनय की हैं — भक्त कहता है कि उसे विधि नहीं आती, केवल भाव है।

कब करें पाठ

गुरुवार कोएकादशी के व्रत मेंनित्य प्रातः पूजा मेंअनंत चतुर्दशी व देवउठनी एकादशी पर

पाठ विधि

गुरुवार को स्नान कर श्री विष्णु के चित्र या विग्रह के समक्ष घी का दीप जलाएँ; पीले पुष्प, तुलसी-दल और चने की दाल या गुड़ का भोग अर्पित करें। पहले दोहा पढ़ें, फिर चालीस चौपाइयाँ। तुलसी-दल के बिना विष्णु-भोग पूर्ण नहीं माना जाता। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराdharmsaar.com — विष्णु चालीसा (आधार-पाठ) · bhaktvatsal.com — श्री विष्णु चालीसा (शब्द-मिलान 99.2%; चौपाइयाँ अंकित) · bhaktibharat.com — चालीसा: श्री विष्णु (93–94%; अंतर केवल वर्तनी के) · रचयिता की छाप — चौपाई 40 "निगम सदा ये विनय सुनावै"
रचयिताअज्ञात (छाप: निगम)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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