श्री विष्णु चालीसा

śrī viṣṇu cālīsā

Vishnu Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
गुरुवार व एकादशी
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: पारंपरिक विष्णु चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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विष्णु विष्णु जय जगतपति, करुणा-सिंधु उदार। विष्णु-चालीसा गाइए, करो भव-भय पार॥

जय हो जगतपति विष्णु, करुणा के सागर; विष्णु-चालीसा गाकर भव-भय से पार हो जाओ।

जय जय जगत-पालक भगवाना। आदि-अनंत अचल अविज्ञाना॥

हे जगत-पालक भगवान विष्णु की जय; आप आदि, अनंत, अचल और अविज्ञान हैं।

क्षीरसागर में शेष-शयन है। लक्ष्मी-चरण-सेवा में मन है॥

क्षीर-सागर में शेषनाग पर शयन है; लक्ष्मी-चरण-सेवा में मन लगा है।

धर्म हेतु बहु रूप धरे हैं। सृष्टि-पालन हित भूमि उतरे हैं॥

धर्म की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किए; सृष्टि-पालन के लिए धरती पर अवतरण किया।

जो नर ध्यावे चित्त लगाई। ताकी सकल मनोरथ पाई॥

जो मनुष्य चित्त लगाकर ध्यान करे; उसे सब मनोरथ प्राप्त होते हैं।

मत्स्य-कूर्म-वराह अवतारा। नृसिंह-वामन प्रभु उदारा॥

मत्स्य, कूर्म, वराह अवतार; नृसिंह और वामन — उदार प्रभु के रूप।

परशुराम-राम-हलधारी। कृष्ण-कल्कि प्रभु बलिहारी॥

परशुराम, राम, बलराम (हलधारी), कृष्ण और कल्कि — सभी अवतारों पर बलिहारी।

दशावतार ले भव उतारे। धर्म-सेतु को सदा सँभारे॥

दशावतार लेकर भव-सागर पार उतारते हैं; धर्म-सेतु को सदा संभाले रखते हैं।

हिरण्यकशिपु का नाश किया। भक्त प्रह्लाद को अभय दिया॥

हिरण्यकशिपु का नाश किया; भक्त प्रह्लाद को अभय दिया।

बलि-राज को पाताल पठाया। वामन-रूप जग को दिखलाया॥

बलि-राज को पाताल पठाया; वामन-रूप जगत को दिखलाया।

समुद्र-मंथन में कूर्म बने। अमृत देवों को पिलाते रहे॥

समुद्र-मंथन में कूर्म रूप धारण किया; अमृत देवों को पिलाते रहे।

गज-ग्राह युद्ध जब हुआ भारी। गजेंद्र को मोक्ष दिया हितकारी॥

जब गज-ग्राह का भारी युद्ध हुआ; गजेंद्र को मोक्ष का हितकारी वरदान दिया।

ध्रुव-भक्ति देख के प्रसन्न हुए। नारायण-नाम से शांत किए॥

ध्रुव की भक्ति देखकर प्रसन्न हुए; नारायण-नाम से उसे शांत किया।

शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी। पीत-वस्त्र वनमाला हितकारी॥

शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए; पीत-वस्त्र और वनमाला धारण किए।

श्रीवत्स-कौस्तुभ विराजे सीने। गरुड़-वाहन पर शोभा दीने॥

श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि सीने पर विराजते हैं; गरुड़-वाहन पर शोभायमान हैं।

वैकुंठ-धाम में वास तुम्हारा। ब्रह्मा-शिव की आस तुम्हारा॥

वैकुंठ-धाम में आपका वास है; ब्रह्मा और शिव की भी आप ही आस हैं।

लक्ष्मी-पति चतुर्भुज स्वामी। जगत-पति अंतर्यामी॥

लक्ष्मी-पति, चतुर्भुज स्वामी; जगत-पति और अंतर्यामी हैं आप।

नारायण नारायण जपते सब। भव-बाधा हर लेते तब॥

नारायण-नारायण सब जपते हैं; भव-बाधा उसी क्षण दूर हो जाती है।

एकादशी व्रत जो धरे। विष्णु-कृपा से भव तरे॥

जो एकादशी का व्रत करे; विष्णु-कृपा से भव-सागर तर जाए।

गुरुवार व्रत और पूजन करे। सुख-समृद्धि घर आँगन भरे॥

गुरुवार व्रत और पूजन करे; सुख-समृद्धि घर-आँगन में भर जाए।

विष्णु-सहस्रनाम जो पढ़े। पुण्य-कोश उसके नित बढ़े॥

जो विष्णु-सहस्रनाम पढ़े; उसका पुण्य-कोश नित्य बढ़ता है।

भागवत-पुराण की कथा सुने। विष्णु-भक्ति में चित्त मिले॥

भागवत-पुराण की कथा सुने; विष्णु-भक्ति में चित्त लग जाए।

तुलसी-दल प्रिय विष्णु को। चढ़ाओ नित्य अर्पण करो॥

तुलसी-दल विष्णु को प्रिय है; नित्य अर्पण करते रहो।

पीताम्बर पीले पुष्प चढ़ाएँ। विष्णु-कृपा से जीवन सजाएँ॥

पीले वस्त्र और पीले पुष्प चढ़ाएँ; विष्णु-कृपा से जीवन सँवर जाए।

देवकी-पुत्र गोविंद सारे। कंस-दुष्ट को संहार भारे॥

देवकी-पुत्र गोविंद के रूप में; कंस-दुष्ट का भारी संहार किया।

राम-रूप में रावण मारे। भक्त-जन के कष्ट निवारे॥

राम-रूप में रावण का वध किया; भक्तजनों के कष्ट निवारे।

कृष्ण-रूप में गीता सुनाई। अर्जुन के मन-भ्रम को मिटाई॥

कृष्ण-रूप में गीता सुनाई; अर्जुन के मन का भ्रम मिटाया।

विष्णु-भक्त को मिले मुक्ति। भव-बंधन से होती छुट्टी॥

विष्णु-भक्त को मुक्ति मिलती है; भव-बंधन से छुटकारा होता है।

विष्णु-पुराण जो नित सुने। उसके जीवन के पाप चुने॥

जो नित्य विष्णु-पुराण सुने; उसके जीवन के पाप नष्ट हो जाते हैं।

नारद-ऋषि विष्णु-भक्त न्यारे। नारायण-नाम जपते सारे॥

नारद-ऋषि अनुपम विष्णु-भक्त हैं; नारायण-नाम जपते सब तर जाते हैं।

प्रह्लाद-ध्रुव और शबरी-गज। विष्णु-भक्ति से पाई सदगति॥

प्रह्लाद, ध्रुव, शबरी और गज; सब ने विष्णु-भक्ति से सद्गति पाई।

जय विष्णु जय लक्ष्मी-रमण। भक्त-जन के मन-हरण॥

जय विष्णु, जय लक्ष्मी-रमण; भक्तजनों के मन को हरने वाले।

विष्णु-चालीसा नित पढ़े। पाप-ताप सब नाश करे॥

विष्णु-चालीसा नित्य पढ़े; पाप और ताप सब नाश हो जाएँ।

संकट में जो ध्यावे विष्णु। वो पावे अभय-वरदान विष्णु॥

संकट में जो विष्णु का ध्यान करे; वह विष्णु का अभय-वरदान पाता है।

रोग-दोष और भय-संताप। विष्णु-नाम से मिटें पाप॥

रोग, दोष, भय और संताप; विष्णु-नाम से सब पाप मिट जाते हैं।

धन-धान्य और सुख-परिवार। विष्णु-भक्त का होता उद्धार॥

धन-धान्य और सुख-परिवार; विष्णु-भक्त का उद्धार होता है।

विष्णु-लोक में जगह मिले। जन्म-मरण का चक्र टले॥

विष्णु-लोक में स्थान मिले; जन्म-मरण का चक्र टल जाए।

जय नारायण जय अच्युत। जय जय जय जगदीश अतुल॥

जय नारायण, जय अच्युत; जय जय जगदीश — अतुलनीय प्रभु।

विष्णु-कृपा बरसे सबपर। जीवन में हो मंगल-बहार॥

विष्णु-कृपा सबपर बरसे; जीवन में मंगल-बहार आए।

विष्णु-चालीसा का फल यही। सुख-शांति और मुक्ति मिली॥

विष्णु-चालीसा का फल यही है; सुख, शांति और मुक्ति मिलती है।

जय विष्णु जय जगत-पालन। भक्त-जन करते हर पल वंदन॥

जय विष्णु, जय जगत-पालन; भक्तजन हर पल वंदन करते हैं।

विष्णु-चालीसा पाठ से, होवे मंगल-काज। नारायण-नाम जपत रहो, मिले वैकुंठ-राज॥

विष्णु-चालीसा पाठ से मंगल-कार्य सिद्ध होते हैं; नारायण-नाम जपते रहो, वैकुंठ का राज्य मिलता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. जय हो जगतपति विष्णु, करुणा के सागर; विष्णु-चालीसा गाकर भव-भय से पार हो जाओ।
  2. हे जगत-पालक भगवान विष्णु की जय; आप आदि, अनंत, अचल और अविज्ञान हैं।
  3. क्षीर-सागर में शेषनाग पर शयन है; लक्ष्मी-चरण-सेवा में मन लगा है।
  4. धर्म की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किए; सृष्टि-पालन के लिए धरती पर अवतरण किया।
  5. जो मनुष्य चित्त लगाकर ध्यान करे; उसे सब मनोरथ प्राप्त होते हैं।
  6. मत्स्य, कूर्म, वराह अवतार; नृसिंह और वामन — उदार प्रभु के रूप।
  7. परशुराम, राम, बलराम (हलधारी), कृष्ण और कल्कि — सभी अवतारों पर बलिहारी।
  8. दशावतार लेकर भव-सागर पार उतारते हैं; धर्म-सेतु को सदा संभाले रखते हैं।
  9. हिरण्यकशिपु का नाश किया; भक्त प्रह्लाद को अभय दिया।
  10. बलि-राज को पाताल पठाया; वामन-रूप जगत को दिखलाया।
  11. समुद्र-मंथन में कूर्म रूप धारण किया; अमृत देवों को पिलाते रहे।
  12. जब गज-ग्राह का भारी युद्ध हुआ; गजेंद्र को मोक्ष का हितकारी वरदान दिया।
  13. ध्रुव की भक्ति देखकर प्रसन्न हुए; नारायण-नाम से उसे शांत किया।
  14. शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए; पीत-वस्त्र और वनमाला धारण किए।
  15. श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि सीने पर विराजते हैं; गरुड़-वाहन पर शोभायमान हैं।
  16. वैकुंठ-धाम में आपका वास है; ब्रह्मा और शिव की भी आप ही आस हैं।
  17. लक्ष्मी-पति, चतुर्भुज स्वामी; जगत-पति और अंतर्यामी हैं आप।
  18. नारायण-नारायण सब जपते हैं; भव-बाधा उसी क्षण दूर हो जाती है।
  19. जो एकादशी का व्रत करे; विष्णु-कृपा से भव-सागर तर जाए।
  20. गुरुवार व्रत और पूजन करे; सुख-समृद्धि घर-आँगन में भर जाए।
  21. जो विष्णु-सहस्रनाम पढ़े; उसका पुण्य-कोश नित्य बढ़ता है।
  22. भागवत-पुराण की कथा सुने; विष्णु-भक्ति में चित्त लग जाए।
  23. तुलसी-दल विष्णु को प्रिय है; नित्य अर्पण करते रहो।
  24. पीले वस्त्र और पीले पुष्प चढ़ाएँ; विष्णु-कृपा से जीवन सँवर जाए।
  25. देवकी-पुत्र गोविंद के रूप में; कंस-दुष्ट का भारी संहार किया।
  26. राम-रूप में रावण का वध किया; भक्तजनों के कष्ट निवारे।
  27. कृष्ण-रूप में गीता सुनाई; अर्जुन के मन का भ्रम मिटाया।
  28. विष्णु-भक्त को मुक्ति मिलती है; भव-बंधन से छुटकारा होता है।
  29. जो नित्य विष्णु-पुराण सुने; उसके जीवन के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  30. नारद-ऋषि अनुपम विष्णु-भक्त हैं; नारायण-नाम जपते सब तर जाते हैं।
  31. प्रह्लाद, ध्रुव, शबरी और गज; सब ने विष्णु-भक्ति से सद्गति पाई।
  32. जय विष्णु, जय लक्ष्मी-रमण; भक्तजनों के मन को हरने वाले।
  33. विष्णु-चालीसा नित्य पढ़े; पाप और ताप सब नाश हो जाएँ।
  34. संकट में जो विष्णु का ध्यान करे; वह विष्णु का अभय-वरदान पाता है।
  35. रोग, दोष, भय और संताप; विष्णु-नाम से सब पाप मिट जाते हैं।
  36. धन-धान्य और सुख-परिवार; विष्णु-भक्त का उद्धार होता है।
  37. विष्णु-लोक में स्थान मिले; जन्म-मरण का चक्र टल जाए।
  38. जय नारायण, जय अच्युत; जय जय जगदीश — अतुलनीय प्रभु।
  39. विष्णु-कृपा सबपर बरसे; जीवन में मंगल-बहार आए।
  40. विष्णु-चालीसा का फल यही है; सुख, शांति और मुक्ति मिलती है।
  41. जय विष्णु, जय जगत-पालन; भक्तजन हर पल वंदन करते हैं।
  42. विष्णु-चालीसा पाठ से मंगल-कार्य सिद्ध होते हैं; नारायण-नाम जपते रहो, वैकुंठ का राज्य मिलता है।

लाभ

  • जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
  • सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • रोग, भय और संकट दूर होते हैं।
  • एकादशी और गुरुवार पाठ से विशेष फल मिलता है।

कब करें पाठ

एकादशी कोगुरुवार कोनित्य प्रातः-संध्या

पाठ विधि

विष्णु की मूर्ति या चित्र के समक्ष तुलसी-दल, पीले पुष्प और पीत-वस्त्र अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएँ। "ओम नमो नारायणाय" स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। एकादशी को उपवास के साथ पाठ विशेष फलदायी है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक विष्णु चालीसा · विष्णु-पुराण परंपरा · गीता प्रेस, गोरखपुर
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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मुख्य मंत्रॐ नमो भगवते वासुदेवाय
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