श्री तुलसी चालीसा

śrī tulasī cālīsā

Tulsi Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नित्य; कार्तिक मास व तुलसी विवाह
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: पारंपरिक तुलसी चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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श्री हरि-प्रिया तुलसी माता, पतित-पावनी नाम। वंदना करूँ हृदय धरि, पूरण हो सब काम॥

हरि-प्रिया तुलसी माता पतित-पावनी कहलाती हैं; हृदय में धारण कर मैं वंदना करता हूँ जिससे सब काम पूर्ण हों।

जय जय तुलसी माता प्यारी। हरि-प्रिया तुम जग-हितकारी॥

हे प्यारी तुलसी माता, आपकी जय हो; आप हरि-प्रिया व जगत का हित करने वाली हैं।

पतित-पावनी जग-तारिणी। रोग-शोक-संताप हारिणी॥

आप पतितों को पावन करने व जगत को तारने वाली हैं; रोग, शोक व संताप हरने वाली हैं।

हरि के शीश विराजति माता। विष्णु-वल्लभा जग-विख्याता॥

आप हरि (विष्णु) के शीश पर विराजती हैं; विष्णु-वल्लभा व जगत-विख्यात हैं।

दल तुम्हरा अति पावन माना। पूजत नर-नारी सब जाना॥

आपका दल (पत्ता) अति पवित्र माना जाता है; सब नर-नारी आपको पूजते हैं।

विष्णु-भोग तुलसी बिन अधूरा। तुम बिन कोई कर्म न पूरा॥

तुलसी के बिना विष्णु का भोग अधूरा रहता है; आपके बिना कोई (पूजा) कर्म पूर्ण नहीं होता।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। रोग-शोक ता के मिट जावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसके रोग-शोक मिट जाते हैं।

घर-आँगन में तुलसी सोहै। नकारात्मकता दूर हो जोहै॥

घर-आँगन में तुलसी सुशोभित होती है; उससे नकारात्मकता दूर हो जाती है।

जल अर्पण जो नित प्रति करते। पुण्य-फल वे सब घर भरते॥

जो नित्य (तुलसी को) जल अर्पण करते हैं, वे पुण्य-फल से घर भरते हैं।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

तुलसी विवाह जो जन करते। पुण्य-कन्यादान-फल भरते॥

जो तुलसी विवाह करते हैं, वे कन्यादान के समान पुण्य-फल प्राप्त करते हैं।

कार्तिक मास तुम्हें अति प्यारा। दीप जला जन तुम्हें मनावारा॥

आपको कार्तिक मास अति प्रिय है; दीप जलाकर भक्त आपको मनाते हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। आरोग्य-सुख सहज वह पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही आरोग्य व सुख पाता है।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।

तुलसी-दल जो हरि को चढ़ावै। वैकुण्ठ-पद वह सहज वह पावै॥

जो तुलसी-दल हरि को चढ़ाता है, वह सहज ही वैकुण्ठ-पद पाता है।

आरोग्य-धन तुम जग में लाती। औषधि-गुण तुम सबको भाती॥

आप जगत में आरोग्य रूपी धन लाती हैं; आपके औषधि-गुण सबको भाते हैं।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। तुलसी-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही तुलसी-कृपा प्राप्त करता है।

मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥

आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।

सालिग्राम संग जब विराजो। हरि-तुलसी की जोड़ी साजो॥

जब आप सालिग्राम (विष्णु) के संग विराजती हैं, तब हरि-तुलसी की जोड़ी सजती है।

जो यह तुलसी चालीसा गावै। रोग-शोक सब दूर नसावै॥

जो यह तुलसी चालीसा गाता है, उसके रोग व शोक सब दूर नष्ट हो जाते हैं।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा तुलसी की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर तुलसी माता की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। आरोग्य-सुख घर में लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में आरोग्य व सुख लाते हैं।

तुलसी-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर तुलसी माता की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

देवउठनी पर विवाह रचावैं। हरि-तुलसी जग मंगल लावैं॥

देवउठनी एकादशी पर (तुलसी-शालिग्राम) विवाह रचाया जाता है; हरि-तुलसी जगत में मंगल लाते हैं।

जो श्रद्धा से जल अर्पण करते। पुण्य-सुख वे सब घर भरते॥

जो श्रद्धा से (तुलसी को) जल अर्पण करते हैं, वे पुण्य व सुख से घर भरते हैं।

घर में जहँ तुलसी विराजे। नित्य मंगल वहाँ साजे॥

घर में जहाँ तुलसी विराजती है, वहाँ नित्य मंगल सजता है।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत तुलसी देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर तुलसी माता तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

तुलसी-माला जो जन धारै। हरि-कृपा वह सहज वह पारै॥

जो जन तुलसी की माला धारण करता है, वह सहज ही हरि-कृपा को पा लेता है।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

एकादशी-रवि-ग्रहण न तोड़ें। इस मर्यादा को नित जोड़ें॥

एकादशी, रविवार व ग्रहण में तुलसी-पत्र न तोड़ें — इस मर्यादा का नित्य पालन करें।

तुलसी-पूजन जो जन करते। आरोग्य-सुख वे सब भरते॥

जो जन तुलसी-पूजन करते हैं, वे आरोग्य व सुख से भर जाते हैं।

विष्णु-प्रिया तुम मोक्ष-दायिनी। भव-तारिणि तुम सुख-प्रदायिनी॥

आप विष्णु-प्रिया व मोक्ष देने वाली हैं; भव-सागर से तारने व सुख देने वाली हैं।

अन्तकाल जो तुलसी पावै। वैकुण्ठ-धाम सहज वह जावै॥

अंतकाल में जो (मुख में) तुलसी पाता है, वह सहज ही वैकुण्ठ-धाम को जाता है।

जो जन तुलसी गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन तुलसी के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

तुलसी-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन तुलसी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

पवित्रता घर में आवै। सुख-शान्ति-आरोग्य बढ़ावै॥

घर में पवित्रता आती है और सुख, शांति व आरोग्य बढ़ता है।

भय-संकट सब दूर हटावै। तुलसी जो जन नित ध्यावै॥

जो जन तुलसी का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।

हरि-कृपा-सुख घर में लावै। भक्ति-शान्ति सब बढ़ावै॥

घर में हरि-कृपा व सुख आता है और भक्ति व शांति बढ़ती है।

जय जय जय तुलसी महारानी। हरि-प्रिया तुम जग-कल्याणी॥

हे तुलसी महारानी, आपकी जय हो; आप हरि-प्रिया व जगत की कल्याणी हैं।

तुलसी चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। आरोग्य-पवित्रता-सुख सब, घर में बसैं सदाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल तुलसी चालीसा पढ़ता है, उसके घर में आरोग्य, पवित्रता व सुख सदा बसता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हरि-प्रिया तुलसी माता पतित-पावनी कहलाती हैं; हृदय में धारण कर मैं वंदना करता हूँ जिससे सब काम पूर्ण हों।
  2. हे प्यारी तुलसी माता, आपकी जय हो; आप हरि-प्रिया व जगत का हित करने वाली हैं।
  3. आप पतितों को पावन करने व जगत को तारने वाली हैं; रोग, शोक व संताप हरने वाली हैं।
  4. आप हरि (विष्णु) के शीश पर विराजती हैं; विष्णु-वल्लभा व जगत-विख्यात हैं।
  5. आपका दल (पत्ता) अति पवित्र माना जाता है; सब नर-नारी आपको पूजते हैं।
  6. तुलसी के बिना विष्णु का भोग अधूरा रहता है; आपके बिना कोई (पूजा) कर्म पूर्ण नहीं होता।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसके रोग-शोक मिट जाते हैं।
  8. घर-आँगन में तुलसी सुशोभित होती है; उससे नकारात्मकता दूर हो जाती है।
  9. जो नित्य (तुलसी को) जल अर्पण करते हैं, वे पुण्य-फल से घर भरते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो तुलसी विवाह करते हैं, वे कन्यादान के समान पुण्य-फल प्राप्त करते हैं।
  12. आपको कार्तिक मास अति प्रिय है; दीप जलाकर भक्त आपको मनाते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही आरोग्य व सुख पाता है।
  14. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  15. जो तुलसी-दल हरि को चढ़ाता है, वह सहज ही वैकुण्ठ-पद पाता है।
  16. आप जगत में आरोग्य रूपी धन लाती हैं; आपके औषधि-गुण सबको भाते हैं।
  17. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही तुलसी-कृपा प्राप्त करता है।
  18. आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
  19. जब आप सालिग्राम (विष्णु) के संग विराजती हैं, तब हरि-तुलसी की जोड़ी सजती है।
  20. जो यह तुलसी चालीसा गाता है, उसके रोग व शोक सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर तुलसी माता की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में आरोग्य व सुख लाते हैं।
  23. जिन पर तुलसी माता की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. देवउठनी एकादशी पर (तुलसी-शालिग्राम) विवाह रचाया जाता है; हरि-तुलसी जगत में मंगल लाते हैं।
  25. जो श्रद्धा से (तुलसी को) जल अर्पण करते हैं, वे पुण्य व सुख से घर भरते हैं।
  26. घर में जहाँ तुलसी विराजती है, वहाँ नित्य मंगल सजता है।
  27. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर तुलसी माता तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  28. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  29. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  30. जो जन तुलसी की माला धारण करता है, वह सहज ही हरि-कृपा को पा लेता है।
  31. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  32. एकादशी, रविवार व ग्रहण में तुलसी-पत्र न तोड़ें — इस मर्यादा का नित्य पालन करें।
  33. जो जन तुलसी-पूजन करते हैं, वे आरोग्य व सुख से भर जाते हैं।
  34. आप विष्णु-प्रिया व मोक्ष देने वाली हैं; भव-सागर से तारने व सुख देने वाली हैं।
  35. अंतकाल में जो (मुख में) तुलसी पाता है, वह सहज ही वैकुण्ठ-धाम को जाता है।
  36. जो जन तुलसी के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  37. जो जन तुलसी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  38. घर में पवित्रता आती है और सुख, शांति व आरोग्य बढ़ता है।
  39. जो जन तुलसी का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  40. घर में हरि-कृपा व सुख आता है और भक्ति व शांति बढ़ती है।
  41. हे तुलसी महारानी, आपकी जय हो; आप हरि-प्रिया व जगत की कल्याणी हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल तुलसी चालीसा पढ़ता है, उसके घर में आरोग्य, पवित्रता व सुख सदा बसता है।

लाभ

  • घर में पवित्रता, सुख-शांति व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
  • आरोग्य व रोग-नाश में सहायता मिलती है।
  • विष्णु-कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  • घर में मंगल व सौभाग्य बना रहता है।

कब करें पाठ

नित्य संध्या को (तुलसी के समक्ष दीप जलाकर)कार्तिक मास मेंतुलसी विवाह (देवउठनी एकादशी) पर

पाठ विधि

संध्या को तुलसी के पौधे के समक्ष घी का दीपक जलाएँ, जल अर्पित करें और चालीसा का पाठ करें। कार्तिक मास व तुलसी विवाह पर इसका विशेष महत्व है। ध्यान रहे — एकादशी व रविवार को तुलसी-पत्र नहीं तोड़े जाते।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक तुलसी चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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