श्री तुलसी चालीसा

śrī tulasī cālīsā

Tulsi Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
46
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नित्य; कार्तिक मास, तुलसी विवाह व एकादशी
उद्देश्य:आरोग्य (Health)मन की शांति (Peace)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री तुलसी चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है और चार समापन दोहों पर समाप्त होती है। चौपाइयाँ "धन्य धन्य श्री तुलसी माता, महिमा अगम सदा श्रुति गाता" से शुरू होती हैं। इसका अधिकांश भाग स्तुति नहीं, तुलसी के तीन जन्मों की कथा है — लक्ष्मी का श्राप, राधा का श्राप, और वृंदा-जलंधर का प्रसंग।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: परंपरागत तुलसी चालीसा; छाप "सुन्दर" — दुर्वासा-प्रयाग क्षेत्र

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री तुलसी चालीसा
IASTśrī tulasī cālīsā
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोतपरंपरागत तुलसी चालीसा; छाप "सुन्दर" — दुर्वासा-प्रयाग क्षेत्र
शुभ दिननित्य; कार्तिक मास, तुलसी विवाह व एकादशी
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक पौधे की स्तुति नहीं, तीन जन्मों की कथा है — और वही इसे असामान्य बनाता है।

पहला जन्म — लक्ष्मी का श्राप (चौपाई 2–9). तुलसी ने हरि के लिए भारी तप किया और वर माँगा कि वही उनके पति बनें। यह सुनकर लक्ष्मी ने श्राप दिया — "होहू विटप तुम जड़ तनु धारी" (6)। तुलसी ने भी पलटकर श्राप दिया (7)। तब हरि ने आश्वासन दिया कि समय पाकर उनके पत्ते स्वयं हरि पर चढ़ेंगे (9)।

दूसरा जन्म — राधा का श्राप (चौपाई 10–14). गोकुल में सुदामा नामक गोप की पत्नी के रूप में जन्म; रास-लीला में राधा उनका प्रेम सह न सकीं और श्राप दे दिया। वही गोप आगे दानवराज शंखचूड़ हुआ।

तीसरा जन्म — वृंदा और जलंधर (चौपाई 15–30). यही सबसे लंबा और सबसे कठिन प्रसंग है। असुर जलंधर शिव से भी जीत गया, क्योंकि वृंदा का पातिव्रत्य उसकी रक्षा कर रहा था (18–19)। तब हरि ने जलंधर का भेष धरकर वह पातिव्रत्य भंग किया (20–21)। वृंदा ने कपट जानकर जो कहा, वह चालीसा छिपाती नहीं — "जलन्धर जस हत्यो अभीता, सोई रावन तस हरिही सीता" (24) और "होवे तनु पाषाण तुम्हारा" (26)। इसी से हरि शालिग्राम हुए और वृंदा तुलसी (29–30)।

महिमा (चौपाई 31–40). यहाँ वे बातें हैं जो नित्य पूजा में काम आती हैं — तुलसी-दल चढ़ाने से परम पद (31), तुलसी के बिना हरि का शरीर जलना (32), तुलसी-दल शीश पर धरना हज़ार घड़े अमृत के बराबर (33), और "तुलसी राधा में नाही अन्तर" (35)। और वह पंक्ति जो हर वैष्णव रसोई में सच है — "व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा, बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा" (36)।

संपूर्ण चालीसा

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जय जय तुलसी भगवती, सत्यवती सुखदानी। नमो नमो हरि प्रेयसी, श्री वृन्दा गुन खानी॥

हे तुलसी भगवती, आपकी जय हो, जय हो; आप सत्यवती और सुख देने वाली हैं। हे हरि की प्रिया, हे गुणों की खान श्री वृंदा, आपको बार-बार नमस्कार।

श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब। जनहित हे वृन्दावनी, अब न करहु विलम्ब॥

आप श्रीहरि के शीश पर विराजती हैं; हे अम्बा, अमर होने का वर दीजिए। हे वृंदावनी, जनों के हित में अब विलम्ब न कीजिए।

धन्य धन्य श्री तुलसी माता। महिमा अगम सदा श्रुति गाता॥

धन्य हैं, धन्य हैं श्री तुलसी माता; आपकी महिमा अगम है और श्रुतियाँ सदा उसे गाती हैं।

हरि के प्राणहु से तुम प्यारी। हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी॥

आप हरि को प्राणों से भी प्यारी हैं; हरि के ही लिए आपने भारी तप किया।

जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो। तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो॥

जब वे प्रसन्न होकर दर्शन देने आए, तब आपने हाथ जोड़कर उनसे विनय की —

हे भगवन्त कन्त मम होहू। दीन जानी जनि छाडाहू छोहु॥

हे भगवंत, आप मेरे कंत (पति) हो जाइए; मुझे दीन जानकर अपनी कृपा से वंचित न कीजिए।

सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी। दीन्हो श्राप कध पर आनी॥

तुलसी की यह वाणी सुनकर लक्ष्मी ने तत्काल श्राप दे डाला —

उस अयोग्य वर मांगन हारी। होहू विटप तुम जड़ तनु धारी॥

"तूने अयोग्य वर माँगा है; इसलिए तू जड़ शरीर धारण कर वृक्ष बन जा।"

सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा। करहु वास तुहू नीचन धामा॥

यह सुनकर तुलसी ने भी वहीं श्राप दिया — "तुम भी नीचों के धाम में वास करो।"

दियो वचन हरि तब तत्काला। सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला॥

तब हरि ने तत्काल वचन दिया — "हे सुमुखी, सुनो; व्याकुल मत होओ।"

समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा। पुजिहौ आस वचन सत मोरा॥

"समय पाकर तुम्हारे पत्ते मुझ पर चढ़ेंगे; तुम्हारी आस पूरी होगी — मेरा वचन सत्य है।"

तब गोकुल मह गोप सुदामा। तासु भई तुलसी तू बामा॥

तब गोकुल में सुदामा नाम का एक गोप था; तुम उसकी पत्नी हुईं।

कृष्ण रास लीला के माही। राधे शक्यो प्रेम लखी नाही॥

कृष्ण की रास-लीला के बीच राधा तुम्हारा प्रेम सह न सकीं।

दियो श्राप तुलसिह तत्काला। नर लोकही तुम जन्महु बाला॥

उन्होंने तत्काल तुलसी को श्राप दिया — "तुम नर-लोक में जन्म लो, हे बाला।"

यो गोप वह दानव राजा। शङ्ख चुड नामक शिर ताजा॥

वह गोप ही दानवराज हुआ — शंखचूड़ नाम से विख्यात।

तुलसी भई तासु की नारी। परम सती गुण रूप अगारी॥

तुलसी उसकी पत्नी हुईं — परम सती, गुण और रूप की आगार।

अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ। कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ॥

इस प्रकार जब दो कल्प बीत गए, तब तीसरे कल्प में जन्म हुआ।

वृन्दा नाम भयो तुलसी को। असुर जलन्धर नाम पति को॥

तब तुलसी का नाम वृंदा हुआ और पति का नाम असुर जलंधर।

करि अति द्वन्द अतुल बलधामा। लीन्हा शंकर से संग्राम॥

अतुल बलशाली उस असुर ने अत्यंत द्वंद्व किया और शंकर से संग्राम ठान लिया।

जब निज सैन्य सहित शिव हारे। मरही न तब हर हरिही पुकारे॥

जब शिव अपनी सेना सहित हार गए और वह मरता ही न था, तब हर ने हरि को पुकारा।

पतिव्रता वृन्दा थी नारी। कोऊ न सके पतिहि संहारी॥

वृंदा पतिव्रता नारी थीं; इसीलिए कोई उनके पति का संहार नहीं कर सकता था।

तब जलन्धर ही भेष बनाई। वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई॥

तब हरि जलंधर का ही भेष बनाकर वृंदा के पास जा पहुँचे।

शिव हित लही करि कपट प्रसंगा। कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा॥

शिव के हित के लिए कपट का प्रसंग रचकर उन्होंने आपके सतीत्व-धर्म को भंग कर दिया।

भयो जलन्धर कर संहारा। सुनी उर शोक उपारा॥

इससे जलंधर का संहार हो गया; यह सुनकर हृदय में शोक उमड़ पड़ा।

तिही क्षण दियो कपट हरि टारी। लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी॥

उसी क्षण हरि ने कपट का रूप हटा दिया; वृंदा ने यह देखा और दुख में वाणी कही —

जलन्धर जस हत्यो अभीता। सोई रावन तस हरिही सीता॥

"जैसे तुमने निर्भय होकर जलंधर का वध किया, वैसे ही रावण तुम्हारी सीता को हरेगा।"

अस प्रस्तर सम हृदय तुम्हारा। धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा॥

"तुम्हारा हृदय पत्थर के समान है; धर्म खंडित करके तुमने मेरे पति का संहार किया।"

यही कारण लही श्राप हमारा। होवे तनु पाषाण तुम्हारा॥

"इसी कारण मेरा श्राप लो — तुम्हारा शरीर पाषाण हो जाए।"

सूनि हरि तुरताही वचन उचारे। दियो श्राप बिना विचारे॥

यह सुनकर हरि ने तुरंत वचन कहा; उन्होंने भी बिना विचारे श्राप दे दिया —

लख्यो न निज करतूती पति को। छलन चह्यो जब पारवती को॥

उन्होंने अपने पति की करतूत नहीं देखी, जिसने पार्वती को छलना चाहा था।

जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा। जग मह तुलसी विटप अनूपा॥

"हे जड़मति, तुम भी जड़ रूप हो जाओ — जगत में अनुपम तुलसी-वृक्ष बनो।"

धग्व रूप हम शालिग्रामा। नदी गण्डकी बीच ललामा॥

"और मैं ध्वज-रूप में शालिग्राम बनूँगा — गंडकी नदी के बीच का आभूषण।"

जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं। सब सुख भोगी परम पद पईहै॥

जो तुलसी-दल मुझ पर चढ़ाएँगे, वे सब सुख भोगकर परम पद पाएँगे।

बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा। अतिशय उठत शीश उर पीरा॥

तुलसी के बिना हरि का शरीर जलता है; शीश और हृदय में अत्यंत पीड़ा उठती है।

जो तुलसी दल हरि शिर धारत। सो सहस्र घट अमृत डारत॥

जो तुलसी-दल हरि के शीश पर धारण करता है, वह मानो हज़ार घड़े अमृत के उँड़ेल देता है।

तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी। रोग दोष दुःख भंजनी हारी॥

तुलसी हरि के मन को रंजित करने वाली हैं; रोग, दोष और दुख का नाश करने वाली हैं।

प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर। तुलसी राधा में नाही अन्तर॥

प्रेम सहित निरंतर हरि का भजन कीजिए — तुलसी और राधा में कोई अंतर नहीं।

व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा। बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा॥

छप्पन प्रकार के व्यंजन भी क्यों न हों, तुलसी-दल के बिना वे हरि को प्यारे नहीं लगते।

सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही। लहत मुक्ति जन संशय नाही॥

तुलसी के वृक्ष की छाँह में सब तीर्थ हैं; वहाँ जन मुक्ति पाते हैं — इसमें संशय नहीं।

कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत। तुलसिहि निकट सहसगुण पावत॥

कवि सुन्दर एक बार हरि का गुण गाता है, तो तुलसी के निकट वह सहस्रगुना फल पाता है।

बसत निकट दुर्बासा धामा। जो प्रयास ते पूर्व ललामा॥

वह दुर्वासा के धाम के निकट बसता है, जो प्रयाग से पूर्व का आभूषण है।

पाठ करहि जो नित नर नारी। होही सुख भाषहि त्रिपुरारी॥

जो नर-नारी नित्य यह पाठ करते हैं, उन्हें सुख मिलता है — ऐसा त्रिपुरारी (शिव) कहते हैं।

तुलसी चालीसा पढ़ही, तुलसी तरु ग्रह धारी। दीपदान करि पुत्र फल, पावही बन्ध्यहु नारी॥

जो तुलसी चालीसा पढ़ता है और घर में तुलसी का वृक्ष धारण करता है, तथा दीपदान करता है — बाँझ नारी भी पुत्र-फल पा लेती है।

सकल दुःख दरिद्र हरि, हार ह्वै परम प्रसन्न। आशिय धन जन लड़हि, ग्रह बसही पूर्णा अत्र॥

हरि प्रसन्न होकर सब दुख और दरिद्रता हर लेते हैं; आशीष, धन और जन मिलते हैं और घर पूर्णता से भर जाता है।

लाही अभिमत फल जगत, मह लाही पूर्ण सब काम। जेई दल अर्पही तुलसी तंह, सहस बसही हरीराम॥

जगत में मनचाहा फल मिलता है और सब काम पूर्ण होते हैं; जहाँ तुलसी-दल अर्पित होता है, वहाँ हज़ार रूपों में हरिराम बसते हैं।

तुलसी महिमा नाम लख, तुलसी सूत सुखराम। मानस चालीस रच्यो, जग महं तुलसीदास॥

तुलसी की महिमा और नाम को देखकर तुलसी के पुत्र सुखराम ने यह मानस-चालीसा जगत में रची — तुलसीदास।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे तुलसी भगवती, आपकी जय हो, जय हो; आप सत्यवती और सुख देने वाली हैं। हे हरि की प्रिया, हे गुणों की खान श्री वृंदा, आपको बार-बार नमस्कार।
  2. आप श्रीहरि के शीश पर विराजती हैं; हे अम्बा, अमर होने का वर दीजिए। हे वृंदावनी, जनों के हित में अब विलम्ब न कीजिए।
  3. धन्य हैं, धन्य हैं श्री तुलसी माता; आपकी महिमा अगम है और श्रुतियाँ सदा उसे गाती हैं।
  4. आप हरि को प्राणों से भी प्यारी हैं; हरि के ही लिए आपने भारी तप किया।
  5. जब वे प्रसन्न होकर दर्शन देने आए, तब आपने हाथ जोड़कर उनसे विनय की —
  6. हे भगवंत, आप मेरे कंत (पति) हो जाइए; मुझे दीन जानकर अपनी कृपा से वंचित न कीजिए।
  7. तुलसी की यह वाणी सुनकर लक्ष्मी ने तत्काल श्राप दे डाला —
  8. "तूने अयोग्य वर माँगा है; इसलिए तू जड़ शरीर धारण कर वृक्ष बन जा।"
  9. यह सुनकर तुलसी ने भी वहीं श्राप दिया — "तुम भी नीचों के धाम में वास करो।"
  10. तब हरि ने तत्काल वचन दिया — "हे सुमुखी, सुनो; व्याकुल मत होओ।"
  11. "समय पाकर तुम्हारे पत्ते मुझ पर चढ़ेंगे; तुम्हारी आस पूरी होगी — मेरा वचन सत्य है।"
  12. तब गोकुल में सुदामा नाम का एक गोप था; तुम उसकी पत्नी हुईं।
  13. कृष्ण की रास-लीला के बीच राधा तुम्हारा प्रेम सह न सकीं।
  14. उन्होंने तत्काल तुलसी को श्राप दिया — "तुम नर-लोक में जन्म लो, हे बाला।"
  15. वह गोप ही दानवराज हुआ — शंखचूड़ नाम से विख्यात।
  16. तुलसी उसकी पत्नी हुईं — परम सती, गुण और रूप की आगार।
  17. इस प्रकार जब दो कल्प बीत गए, तब तीसरे कल्प में जन्म हुआ।
  18. तब तुलसी का नाम वृंदा हुआ और पति का नाम असुर जलंधर।
  19. अतुल बलशाली उस असुर ने अत्यंत द्वंद्व किया और शंकर से संग्राम ठान लिया।
  20. जब शिव अपनी सेना सहित हार गए और वह मरता ही न था, तब हर ने हरि को पुकारा।
  21. वृंदा पतिव्रता नारी थीं; इसीलिए कोई उनके पति का संहार नहीं कर सकता था।
  22. तब हरि जलंधर का ही भेष बनाकर वृंदा के पास जा पहुँचे।
  23. शिव के हित के लिए कपट का प्रसंग रचकर उन्होंने आपके सतीत्व-धर्म को भंग कर दिया।
  24. इससे जलंधर का संहार हो गया; यह सुनकर हृदय में शोक उमड़ पड़ा।
  25. उसी क्षण हरि ने कपट का रूप हटा दिया; वृंदा ने यह देखा और दुख में वाणी कही —
  26. "जैसे तुमने निर्भय होकर जलंधर का वध किया, वैसे ही रावण तुम्हारी सीता को हरेगा।"
  27. "तुम्हारा हृदय पत्थर के समान है; धर्म खंडित करके तुमने मेरे पति का संहार किया।"
  28. "इसी कारण मेरा श्राप लो — तुम्हारा शरीर पाषाण हो जाए।"
  29. यह सुनकर हरि ने तुरंत वचन कहा; उन्होंने भी बिना विचारे श्राप दे दिया —
  30. उन्होंने अपने पति की करतूत नहीं देखी, जिसने पार्वती को छलना चाहा था।
  31. "हे जड़मति, तुम भी जड़ रूप हो जाओ — जगत में अनुपम तुलसी-वृक्ष बनो।"
  32. "और मैं ध्वज-रूप में शालिग्राम बनूँगा — गंडकी नदी के बीच का आभूषण।"
  33. जो तुलसी-दल मुझ पर चढ़ाएँगे, वे सब सुख भोगकर परम पद पाएँगे।
  34. तुलसी के बिना हरि का शरीर जलता है; शीश और हृदय में अत्यंत पीड़ा उठती है।
  35. जो तुलसी-दल हरि के शीश पर धारण करता है, वह मानो हज़ार घड़े अमृत के उँड़ेल देता है।
  36. तुलसी हरि के मन को रंजित करने वाली हैं; रोग, दोष और दुख का नाश करने वाली हैं।
  37. प्रेम सहित निरंतर हरि का भजन कीजिए — तुलसी और राधा में कोई अंतर नहीं।
  38. छप्पन प्रकार के व्यंजन भी क्यों न हों, तुलसी-दल के बिना वे हरि को प्यारे नहीं लगते।
  39. तुलसी के वृक्ष की छाँह में सब तीर्थ हैं; वहाँ जन मुक्ति पाते हैं — इसमें संशय नहीं।
  40. कवि सुन्दर एक बार हरि का गुण गाता है, तो तुलसी के निकट वह सहस्रगुना फल पाता है।
  41. वह दुर्वासा के धाम के निकट बसता है, जो प्रयाग से पूर्व का आभूषण है।
  42. जो नर-नारी नित्य यह पाठ करते हैं, उन्हें सुख मिलता है — ऐसा त्रिपुरारी (शिव) कहते हैं।
  43. जो तुलसी चालीसा पढ़ता है और घर में तुलसी का वृक्ष धारण करता है, तथा दीपदान करता है — बाँझ नारी भी पुत्र-फल पा लेती है।
  44. हरि प्रसन्न होकर सब दुख और दरिद्रता हर लेते हैं; आशीष, धन और जन मिलते हैं और घर पूर्णता से भर जाता है।
  45. जगत में मनचाहा फल मिलता है और सब काम पूर्ण होते हैं; जहाँ तुलसी-दल अर्पित होता है, वहाँ हज़ार रूपों में हरिराम बसते हैं।
  46. तुलसी की महिमा और नाम को देखकर तुलसी के पुत्र सुखराम ने यह मानस-चालीसा जगत में रची — तुलसीदास।

लाभ

  • तुलसी के तीन जन्मों की पूरी कथा — लक्ष्मी का श्राप, राधा का श्राप, वृंदा-जलंधर प्रसंग।
  • शालिग्राम और तुलसी का सम्बन्ध कहाँ से आया, यह चालीसा स्वयं बताती है (चौपाई 29–30)।
  • तुलसी विवाह, कार्तिक मास और एकादशी का पाठ।
  • नित्य पूजा की व्यावहारिक बातें — तुलसी-दल का भोग, दीपदान (चौपाई 31–40)।

कब करें पाठ

तुलसी विवाह (कार्तिक शुक्ल एकादशी–द्वादशी) परकार्तिक मास भरएकादशी कोनित्य संध्या में तुलसी के समक्ष दीप जलाकर

पाठ विधि

तुलसी के पौधे के समक्ष संध्या-काल में घी या तिल के तेल का दीप जलाएँ — चालीसा का अंतिम दोहा दीपदान का ही फल कहता है। जल अर्पित कर परिक्रमा करें, फिर दोनों दोहे, चालीस चौपाइयाँ और चारों समापन दोहे पढ़ें। ध्यान रहे कि परंपरा में एकादशी और रविवार को तुलसी-पत्र नहीं तोड़े जाते — उन दिनों केवल दर्शन, दीप और पाठ किया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराpavitragranth.com — श्री तुलसी चालीसा (आधार-पाठ) · blocksinfotech.com — श्री तुलसी चालीसा · chalisasangrah.in — तुलसी चालीसा · divineaarti.com — श्री तुलसी चालीसा · ⚠️ चारों में एक जैसे बिगाड़ हैं; शुद्ध पाठ किसी में नहीं मिला। · ⚠️ aartichalisa.com एक दूसरी तुलसी चालीसा छापता है ("श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय"); वह अलग रचना है।
रचयिताअज्ञात (चौपाई 38 में "कवि सुन्दर"; समापन दोहे का नाम उलझा हुआ)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
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