मास वैशाख कृतिका युत,
हरण मही को भार।
शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन,
लियो नरसिंह अवतार॥
वैशाख मास में कृत्तिका नक्षत्र के योग में, पृथ्वी का भार हरने के लिए — शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, सोमवार के दिन, आपने नरसिंह अवतार लिया।
धन्य तुम्हारो सिंह तनु,
धन्य तुम्हारो नाम।
तुमरे सुमरन से प्रभु,
पूरन हो सब काम॥
आपका सिंह-शरीर धन्य है, आपका नाम धन्य है; हे प्रभु, आपके स्मरण मात्र से सब काम पूरे हो जाते हैं।
1नरसिंह देव मैं सुमरों तोहि।
धन बल विद्या दान दे मोहि॥
हे नरसिंह देव, मैं आपका स्मरण करता हूँ; मुझे धन, बल और विद्या का दान दीजिए।
2जय जय नरसिंह कृपाला।
करो सदा भक्तन प्रतिपाला॥
हे कृपालु नरसिंह, आपकी जय हो, जय हो; सदा भक्तों का पालन कीजिए।
3विष्णु के अवतार दयाला।
महाकाल कालन को काला॥
आप विष्णु के दयालु अवतार हैं; महाकाल के भी काल हैं — काल को काल देने वाले।
4नाम अनेक तुम्हारो बखानो।
अल्प बुद्धि मैं ना कछु जानों॥
आपके अनेक नाम हैं, उनमें से कितने बखानूँ; मैं अल्पबुद्धि हूँ, कुछ नहीं जानता।
5हिरणाकुश नृप अति अभिमानी।
तेहि के भार मही अकुलानी॥
राजा हिरण्यकशिपु अत्यंत अभिमानी था; उसके भार से पृथ्वी व्याकुल हो उठी।
6हिरणाकुश कयाधू के जाये।
नाम भक्त प्रहलाद कहाये॥
हिरण्यकशिपु और कयाधु के जो पुत्र हुए, वे भक्त प्रह्लाद कहलाए।
7भक्त बना बिष्णु को दासा।
पिता कियो मारन परसाया॥
वे विष्णु के दास बन गए; इस पर पिता ने उन्हें मारने का प्रयास किया।
8अस्त्र-शस्त्र मारे भुज दण्डा।
अग्निदाह कियो प्रचण्डा॥
अस्त्र-शस्त्र चलाए, भुजदंडों से मारा, और प्रचंड अग्नि में जलाया।
9भक्त हेतु तुम लियो अवतारा।
दुष्ट-दलन हरण महिभारा॥
भक्त के लिए आपने अवतार लिया — दुष्टों का दलन करने और पृथ्वी का भार हरने।
10तुम भक्तन के भक्त तुम्हारे।
प्रह्लाद के प्राण पियारे॥
आप भक्तों के हैं और भक्त आपके; प्रह्लाद तो आपको प्राणों से प्यारे थे।
11प्रगट भये फाड़कर तुम खम्भा।
देख दुष्ट-दल भये अचम्भा॥
आप खम्भा फाड़कर प्रकट हुए; दुष्टों का दल यह देखकर अचम्भे में पड़ गया।
12खड्ग जिह्व तनु सुन्दर साजा।
ऊर्ध्व केश महादष्ट्र विराजा॥
आपकी जिह्वा खड्ग जैसी थी और शरीर सुंदर सजा हुआ; केश ऊपर उठे हुए और दाढ़ें विशाल।
13तप्त स्वर्ण सम बदन तुम्हारा।
को वरने तुम्हरों विस्तारा॥
आपका शरीर तपे हुए स्वर्ण जैसा था; आपके विस्तार का वर्णन कौन कर सकता है?
14रूप चतुर्भुज बदन विशाला।
नख जिह्वा है अति विकराला॥
चतुर्भुज रूप और विशाल मुख; नख और जिह्वा अत्यंत विकराल।
15स्वर्ण मुकुट बदन अति भारी।
कानन कुण्डल की छवि न्यारी॥
सिर पर स्वर्ण मुकुट और भारी देह; कानों के कुण्डलों की छवि निराली।
16भक्त प्रहलाद को तुमने उबारा।
हिरणा कुश खल क्षण मह मारा॥
आपने भक्त प्रह्लाद को उबार लिया और दुष्ट हिरण्यकशिपु को क्षण भर में मार डाला।
17ब्रह्मा, बिष्णु तुम्हे नित ध्यावे।
इन्द्र महेश सदा मन लावे॥
ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं; इन्द्र और महेश सदा आप में मन लगाते हैं।
18वेद पुराण तुम्हरो यश गावे।
शेष शारदा पारन पावे॥
वेद और पुराण आपका यश गाते हैं; शेष और शारदा भी उसका पार नहीं पाते।
19जो नर धरो तुम्हरो ध्याना।
ताको होय सदा कल्याना॥
जो मनुष्य आपका ध्यान धरता है, उसका सदा कल्याण होता है।
20त्राहि-त्राहि प्रभु दुःख निवारो।
भव बन्धन प्रभु आप ही टारो॥
त्राहि-त्राहि, हे प्रभु, दुख दूर कीजिए; भव-बंधन आप ही टाल सकते हैं।
21नित्य जपे जो नाम तिहारा।
दुःख व्याधि हो निस्तारा॥
जो नित्य आपका नाम जपता है, उसके दुख और व्याधि का निस्तार हो जाता है।
22सन्तान-हीन जो जाप कराये।
मन इच्छित सो नर सुत पावे॥
जो संतानहीन होकर जाप कराता है, वह मनचाहा पुत्र पा लेता है।
23बन्ध्या नारी सुसन्तान को पावे।
नर दरिद्र धनी होई जावे॥
बाँझ स्त्री को सुसंतान मिल जाती है, और निर्धन मनुष्य धनी हो जाता है।
24जो नरसिंह का जाप करावे।
ताहि विपत्ति सपनें नही आवे॥
जो नरसिंह का जाप कराता है, उसे विपत्ति सपने में भी नहीं आती।
25जो कामना करे मन माही।
सब निश्चय सो सिद्ध हुयी जाही॥
मन में जो भी कामना करे, वह निश्चय ही सिद्ध हो जाती है।
26जीवन मैं जो कछु सङ्कट होयी।
निश्चय नरसिंह सुमरे सोयी॥
जीवन में जो भी संकट हो, उसमें निश्चय ही नरसिंह का स्मरण करना चाहिए।
27रोग ग्रसित जो ध्यावे कोई।
ताकि काया कञ्चन होई॥
जो रोग से ग्रस्त होकर ध्यान करता है, उसकी काया कंचन जैसी हो जाती है।
28डाकिनी-शाकिनी प्रेत बेताला।
ग्रह-व्याधि अरु यम विकराला॥
डाकिनी, शाकिनी, प्रेत, बेताल; ग्रह-व्याधि और विकराल यम —
29प्रेत पिशाच सबे भय खाये।
यम के दूत निकट नहीं आवे॥
प्रेत और पिशाच सब भय खाते हैं; यम के दूत निकट नहीं आते।
30सुमर नाम व्याधि सब भागे।
रोग-शोक कबहूँ नही लागे॥
नाम स्मरण करते ही सब व्याधियाँ भाग जाती हैं; रोग और शोक कभी नहीं लगते।
31जाको नजर दोष हो भाई।
सो नरसिंह चालीसा गाई॥
हे भाई, जिसे नज़र-दोष हो, वह यह नरसिंह चालीसा गाए।
32हटे नजर होवे कल्याना।
बचन सत्य साखी भगवाना॥
नज़र हट जाती है और कल्याण होता है; यह वचन सत्य है, भगवान इसके साक्षी हैं।
33जो नर ध्यान तुम्हारो लावे।
सो नर मन वाञ्छित फल पावे॥
जो मनुष्य आपका ध्यान लगाता है, वह मनवांछित फल पाता है।
34बनवाये जो मन्दिर ज्ञानी।
हो जावे वह नर जग मानी॥
जो ज्ञानी आपका मंदिर बनवाता है, वह जगत में मान्य हो जाता है।
35नित-प्रति पाठ करे इक बारा।
सो नर रहे तुम्हारा प्यारा॥
जो नित्य एक बार पाठ करता है, वह आपका प्यारा बना रहता है।
36नरसिंह चालीसा जो जन गावे।
दुःख दरिद्र ताके निकट न आवे॥
जो जन नरसिंह चालीसा गाता है, दुख और दरिद्रता उसके निकट नहीं आते।
37चालीसा जो नर पढ़े-पढ़ावे।
सो नर जग में सब कुछ पावे॥
जो चालीसा पढ़ता या पढ़ाता है, वह जगत में सब कुछ पा लेता है।
38यह श्री नरसिंह चालीसा।
पढ़े रङ्क होवे अवनीसा॥
यह श्री नरसिंह चालीसा पढ़ने से रंक भी पृथ्वी का स्वामी हो जाता है।
39जो ध्यावे सो नर सुख पावे।
तोही विमुख बहु दुःख उठावे॥
जो ध्यान करता है वह सुख पाता है; और जो विमुख रहता है वह बहुत दुख उठाता है।
40शिव स्वरूप है शरण तुम्हारी।
हरो नाथ सब विपत्ति हमारी॥
आप शिव-स्वरूप हैं; मैं आपकी शरण में हूँ — हे नाथ, हमारी सब विपत्ति हर लीजिए।
चारों युग गायें तेरी,
महिमा अपरम्पार।
निज भक्तनु के प्राण हित,
लियो जगत अवतार॥
चारों युग आपकी अपरम्पार महिमा गाते हैं; अपने भक्तों के प्राणों के लिए ही आपने जगत में अवतार लिया।
नरसिंह चालीसा जो पढ़े,
प्रेम मगन शत बार।
उस घर आनन्द रहे,
वैभव बढ़े अपार॥
जो प्रेम में मग्न होकर नरसिंह चालीसा सौ बार पढ़ता है, उसके घर आनंद रहता है और वैभव अपार बढ़ता है।