बाल मुकुन्दाष्टकम्
पाठ
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्। वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
संहृत्य लोकान् वटपत्रमध्ये शयानमाद्यन्तविहीनरूपम्। सर्वेश्वरं सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
इन्दीवरश्यामलकोमलाङ्गं इन्द्रादिदेवार्चितपादपद्मम्। सन्तानकल्पद्रुममाश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
लम्बालकं लम्बितहारयष्टिं शृङ्गारलीलाङ्कितदन्तपङ्क्तिम्। बिम्बाधरं चारुविशालनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
शिक्ये निधायाद्य पयोदधीनि बहिर्गतायां व्रजनायिकायाम्। भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
कालिन्दजान्तस्थितकालियस्य फणाग्ररङ्गे नटनप्रियन्तम्। तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्त्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
उलूखले बद्धमुदारशौर्यं उत्तुङ्गयुग्मार्जुनभङ्गलीलम्। उत्फुल्लपद्मायतचारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षम्। सच्चिन्मयं देवमनन्तरूपं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
अर्थ (हिन्दी)
- जो अपने कर-कमल से चरण-कमल को पकड़कर उसे मुख-कमल में रख रहे हैं, तथा वट के पत्ते के दोने में शयन कर रहे हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जो समस्त लोकों को समेटकर वट-पत्र के मध्य शयन कर रहे हैं, जिनका स्वरूप आदि और अंत से रहित है, जो सबके ईश्वर हैं तथा सबके हित के लिए अवतरित हुए हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जिनका कोमल शरीर नील कमल के समान श्यामल है, जिनके चरण-कमल इंद्र आदि देवताओं द्वारा पूजित हैं, तथा जो शरण में आए हुओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जिनकी अलकें लंबी हैं, वक्ष पर हार की लड़ी लटक रही है, जिनकी दंत-पंक्ति शृंगार-लीला से अंकित है, जिनके अधर बिंबा-फल के समान लाल तथा नेत्र सुंदर व विशाल हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जब व्रज की स्वामिनी (यशोदा) दूध व दही छींके पर रखकर बाहर चली गईं, तब इच्छानुसार उन्हें खाकर जो कपट से सोने का बहाना किए पड़े हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जो यमुना के भीतर स्थित कालिय नाग के फणों के रंगमंच पर नृत्य करने में प्रसन्न हैं, जिनके हाथ में उसकी पूँछ है तथा जिनका मुख शरद ऋतु के चंद्रमा के समान है — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जो ऊखल से बँधे होने पर भी उदार पराक्रम वाले हैं, जिन्होंने दो ऊँचे अर्जुन वृक्षों को गिराने की लीला की, तथा जिनके नेत्र खिले हुए कमल के समान बड़े व सुंदर हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
- जो आदरपूर्वक माता के मुख को निहारते हुए स्तनपान कर रहे हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, तथा जो सत्-चित्-स्वरूप देव व अनंत रूप वाले हैं — उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
लाभ
- बाल-स्वरूप के ध्यान से मन में वात्सल्य-भाव तथा कोमलता जागती है।
- प्रत्येक श्लोक एक चित्र देता है, इसलिए ध्यान में मन सहज ही टिकता है।
- सरल छंद व एक ही लौटती पंक्ति के कारण कंठस्थ करना सुगम — बालकों के लिए विशेष उपयुक्त।
- संतान-सुख की कामना से बाल गोपाल की उपासना में इसका पाठ किया जाता है।
कब करें पाठ
प्रातः बाल गोपाल के पूजन में · जन्माष्टमी पर · बुधवार को · शिशु-सेवा अथवा संतान-कामना के संकल्प में
स्रोत
रचयिता: विवादित — लीलाशुक (बिल्वमंगल) अथवा ऋषि मार्कण्डेय. greenmesg.org — Bala Mukundashtakam (देवनागरी, IAST व अंग्रेज़ी अर्थ सहित) · dharmsutra.org — बाल मुकुन्दाष्टकम् (देवनागरी) · पाठ-भेद: श्लोक 8 में आदरेण/आदेण — dharmsutra का "मादरेण" लिया गया, क्योंकि greenmesg का "मादेण" कोई शब्द नहीं है। · पाठ-भेद: श्लोक 7 में भङ्गलीलम्/मङ्गलीलम् — भङ्ग लिया गया, क्योंकि greenmesg का अपना अनुवाद ही "अर्जुन वृक्षों को गिराना" कहता है। · रचयिता: दोनों पाठ-स्रोतों में कोई attribution नहीं; अन्यत्र लीलाशुक (बिल्वमंगल) तथा ऋषि मार्कण्डेय — दोनों नाम मिलते हैं। मतभेद दर्ज है, निर्णय नहीं सुनाया गया।
