समय
3–4 मिनट
श्लोक
8
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)वात्सल्य (Parental Love)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
बाल मुकुन्दाष्टकम् आठ श्लोकों का स्तोत्र है जिसमें बाल-कृष्ण के उस रूप का ध्यान है जो वटपत्र पर लेटे हुए अपने पैर का अंगूठा मुख में लिए हैं। इसकी रचना का श्रेय लीलाशुक (बिल्वमंगल) तथा ऋषि मार्कण्डेय — दोनों को दिया जाता है, और यह प्रश्न आज भी अनिर्णीत है।
FAQ
बाल मुकुन्दाष्टकम् — सामान्य प्रश्न
इसका निश्चित उत्तर देना कठिन है, और हम अनुमान नहीं लगाएँगे। प्रचलित परंपराओं में इसे कहीं लीलाशुक (बिल्वमंगल ठाकुर) तो कहीं ऋषि मार्कण्डेय की रचना बताया जाता है। जिन दो प्रामाणिक पाठ-स्रोतों से यहाँ का पाठ सत्यापित हुआ है, उन दोनों में रचयिता का नाम दिया ही नहीं गया। इसलिए यहाँ मतभेद दर्ज किया गया है, कोई एक नाम छापा नहीं गया।
आठ — और यह उन थोड़े-से अष्टकों में है जिनमें वास्तव में आठ ही श्लोक हैं। अधिकांश अष्टकों में आठ स्तुति-श्लोकों के बाद एक फलश्रुति जुड़ी होती है (जैसे अच्युताष्टकम् में), किंतु यहाँ ऐसा नहीं है।
इसका अर्थ है "उन बाल मुकुंद का मैं मन से स्मरण करता हूँ"। यह स्तोत्र स्तुति नहीं, ध्यान है — इसमें कोई याचना या नमस्कार नहीं है। हर श्लोक एक चित्र देता है और फिर यही पंक्ति लौटकर साधक को उसी चित्र पर टिका देती है।
यह प्रलय-काल का चित्र है, जब समस्त लोक समेट लिए जाते हैं और भगवान शिशु-रूप में वट के पत्ते पर शयन करते हैं — अपना चरण अपने ही मुख में लिए हुए। दूसरा श्लोक इसे स्पष्ट करता है: "संहृत्य लोकान् वटपत्रमध्ये"। यही इस स्तोत्र का सबसे गहरा विरोधाभास है — जो अनंत है, वही एक पत्ते पर समा जाता है।
पाँचवें श्लोक में माखन-चोरी और सोने का बहाना, छठे में यमुना में कालिय नाग के फणों पर नर्तन, तथा सातवें में ऊखल से बँधकर दो अर्जुन वृक्षों को गिराने की लीला आती है। आठवाँ श्लोक माता का मुख निहारते हुए स्तनपान करते शिशु पर आकर ठहरता है।
दो छोटे भेद मिले। आठवें श्लोक में एक स्रोत "मुखमादेण" छापता है जो कोई शब्द ही नहीं है; दूसरा स्रोत "मुखमादरेण" (आदरपूर्वक) देता है, जो यहाँ लिया गया है। सातवें श्लोक में एक स्रोत का देवनागरी "मङ्गलीलम्" है जबकि उसी स्रोत का अपना अनुवाद "अर्जुन वृक्षों को गिराना" कहता है — जिसके लिए "भङ्गलीलम्" ही उपयुक्त है, वही यहाँ रखा गया है।
प्रातः बाल गोपाल के पूजन में नित्य पाठ किया जा सकता है। जन्माष्टमी तथा बुधवार को इसका विशेष महत्व माना जाता है। संतान-कामना अथवा शिशु-सेवा के संकल्प में भी इसका पाठ प्रचलित है।
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