श्री कृष्ण चालीसा

śrī kṛṣṇa cālīsā

Krishna Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
जन्माष्टमी, बुधवार व एकादशी
उद्देश्य:प्रेम (Love)भक्ति (Devotion)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री कृष्ण चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है और एक दोहे पर पूर्ण होती है। इसका आरंभ "बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम" से होता है। चौपाइयाँ पूतना-वध से लेकर गीता-उपदेश और द्रौपदी की लाज तक कृष्ण-लीला का पूरा क्रम कहती हैं।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: परंपरागत कृष्ण चालीसा; अंतिम चौपाइयों में "सुन्दरदास" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री कृष्ण चालीसा
IASTśrī kṛṣṇa cālīsā
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतपरंपरागत कृष्ण चालीसा; अंतिम चौपाइयों में "सुन्दरदास" की छाप
शुभ दिनजन्माष्टमी, बुधवार व एकादशी
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा कृष्ण-लीला को क्रम से कहती है, और यही इसकी विशेषता है। पहले रूप-वर्णन — बाँसुरी, नील-मेघ जैसा शरीर, मोर मुकुट, वैजयंती माला (चौपाई 7–11)। फिर बाल-लीला — पूतना, अघासुर, मधुवन की अग्नि, इंद्र का कोप और गोवर्धन-धारण (12–15)। फिर कालिय-दमन, रास, कंस-वध और माता-पिता की मुक्ति (18–21)।

आगे महाभारत आता है — "भारत के पारथ रथ हांके, लिए चक्र कर नहिं बल ताके" (29): अर्जुन का रथ हाँका, चक्र उठाया पर बल का प्रयोग नहीं किया। फिर गीता (30), मीरा का विष-पान (31–32), शिशुपाल की सौ गालियाँ (34) और द्रौपदी की पुकार पर चीर-वृद्धि (35–36)।

चौपाई 38 में रचयिता अपनी छाप देता है — "सुन्दरदास आस उर धारी, दयादृष्टि कीजै बनवारी"। इसी से जान पड़ता है कि रचयिता का नाम सुन्दरदास था, पर कौन-से सुन्दरदास, यह किसी स्रोत में नहीं मिलता; इसलिए यहाँ कोई परिचय नहीं गढ़ा गया।

अंतिम चौपाई पाठक को सीधे जयकारे पर छोड़ती है — "खोलो पट अब दर्शन दीजै, बोलो कृष्ण कन्हैया की जै"।

संपूर्ण चालीसा

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बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥

हाथ में मधुर बाँसुरी सुशोभित है और शरीर नील मेघ जैसा श्याम है; अरुण अधर मानो बिम्बाफल हों और नेत्र कमल के समान मनोहर।

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

पूर्ण चंद्रमा-सा और कमल-सा मुख है, पीताम्बर का शुभ शृंगार है। हे मनमोहन, कामदेव-सी छवि वाले कृष्णचन्द्र महाराज, आपकी जय हो।

जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

हे यदुवंश के नंदन, हे जगत के वंदनीय, हे वसुदेव और देवकी के पुत्र — आपकी जय हो।

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

हे यशोदा के पुत्र और नंद के दुलारे, आपकी जय हो; आप भक्तों की आँखों के तारे हैं।

जय नट-नागर नाग नथैया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥

हे नटनागर, हे कालिय नाग को नाथने वाले; हे कृष्ण कन्हैया, गायें चराने वाले — जय हो।

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥

हे प्रभु, जिन्होंने नख पर गोवर्धन पर्वत धारण किया — पधारिए और दीनों का कष्ट दूर कीजिए।

वंशी मधुर अधर धरी तेरी। होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥

आपके अधरों पर धरी मधुर बाँसुरी — उसी के प्रभाव से मेरा मनोरथ पूर्ण हो।

आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥

हे हरि, फिर आइए और माखन चखिए; आज भारत की लाज रखिए।

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

गोल कपोल और अरुण ठुड्डी; कोमल मुस्कान मोहिनी-सी डाल देती है।

रंजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयंती माला॥

कमल जैसे बड़े और रंजित नेत्र; सिर पर मोर मुकुट और गले में वैजयंती माला।

कुण्डल श्रवण पीतपट आछे। कटि किंकणी काछन काछे॥

कानों में कुंडल और सुंदर पीत वस्त्र; कमर में करधनी सजी है।

नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

नील कमल-सा सुंदर शरीर सुशोभित है; यह छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनि — सबका मन मोहित हो जाता है।

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

मस्तक पर तिलक और घुँघराली लटें; हे बाँसुरी वाले कृष्ण, पधारिए।

करि पय पान, पुतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥

दूध पिलाने आई पूतना को भी दुग्धपान करके तार दिया; अघासुर, बकासुर और कागासुर का वध किया।

मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला। भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥

जब मधुवन में अग्नि की ज्वाला जलने लगी, तो नंदलाल के देखते ही वह शीतल हो गई।

सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥

जब इंद्र क्रोध में ब्रज पर चढ़ आए और मूसलधार वर्षा की।

लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नखधारि बचायो॥

ब्रज बहते-बहते बचा; आपने गोवर्धन को नख पर धारण कर उसे बचा लिया।

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥

माता यशोदा के मन में भ्रम बढ़ा, तब आपने अपने मुख में चौदह भुवन दिखा दिए।

दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

दुष्ट कंस ने बहुत उपद्रव मचाया और करोड़ों कमल-पुष्प मँगवाए।

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥

तब आपने कालिय नाग को नाथ लिया और अपने चरण-चिह्न देकर उसे निर्भय कर दिया।

करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

गोपियों के संग रास रचाकर आपने सबकी अभिलाषा पूर्ण की।

केतिक महा असुर संहारयो। कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥

कितने ही महा असुरों का संहार किया; कंस को केश पकड़कर मार डाला।

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहं राज दिलाई॥

माता-पिता को बंदीगृह से छुड़ाया और उग्रसेन को राज्य दिलाया।

महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥

मृत्युलोक से देवकी के छहों मृत पुत्रों को लौटा लाए और माता का शोक मिटाया।

भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥

भौमासुर और मुर दैत्य का संहार किया, और सोलह हज़ार कन्याओं को मुक्त करा लाए।

दै भिन्हीं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥

तिनके का सहारा देकर भी रक्षा की; जरासंध जैसे राक्षस का अंत कराया।

असुर बकासुर आदिक मारयो। भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥

बकासुर आदि असुरों को मारा और भक्तों के कष्ट दूर किए।

दीन सुदामा के दुःख टारयो। तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥

दीन सुदामा का दुःख दूर किया — उनके लाए चावल की तीन मुट्ठी मुख में डाल लीं।

प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

विदुर के घर प्रेम से साग माँगकर खाया और दुर्योधन के मेवे त्याग दिए।

लखि प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

प्रेम की महिमा देखिए — ऐसे हैं श्याम, दीनों का हित करने वाले।

भारत के पारथ रथ हांके। लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥

महाभारत में पार्थ (अर्जुन) का रथ हाँका; हाथ में चक्र लिया, पर अपने बल का प्रयोग नहीं किया।

निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये॥

अपनी गीता का ज्ञान सुनाया और भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।

मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥

मीरा ऐसी मतवाली थीं कि ताली बजाते हुए विष भी पी गईं।

राना भेजा सांप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥

राणा ने पिटारी में साँप भेजा, पर बनवारी उसमें शालिग्राम बनकर प्रकट हो गए।

निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥

आपने ब्रह्मा जी को अपनी माया दिखाई और उनके हृदय का सारा संशय मिटा दिया।

तब शत निन्दा करी तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

शिशुपाल ने सौ बार निंदा की, और उसी क्षण वह जीवन-मुक्त हो गया।

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥

जब द्रौपदी ने पुकारा — "हे दीनानाथ, अब लाज जा रही है"।

तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

तुरंत नंदलाल स्वयं वस्त्र बन गए; चीर बढ़ता गया और शत्रुओं का मुँह काला हो गया।

अस नाथ के नाथ कन्हैया। डूबत भंवर बचावत नैया॥

ऐसे हैं नाथों के नाथ कन्हैया — भँवर में डूबती नाव को भी बचा लेते हैं।

सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥

सुन्दरदास हृदय में यही आस धारण किए है — हे बनवारी, दया-दृष्टि कीजिए। (यही रचयिता की छाप है।)

नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

हे नाथ, मेरी सारी कुमति दूर कीजिए और मेरे अपराध शीघ्र क्षमा कीजिए।

खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥

अब पट खोलिए और दर्शन दीजिए — बोलो कृष्ण कन्हैया की जय।

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

फलश्रुति: जो कृष्ण का यह चालीसा हृदय में धारण कर पाठ करता है, वह अष्ट सिद्धि, नवनिधि तथा चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्त करता है।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

बंशीबाँसुरी
नील जलदनीला बादल
बिम्बफलकुंदरू का लाल फल — लाल अधरों की उपमा
नट-नागरनटों में चतुर — कृष्ण
धेनु चरैयागायें चराने वाले
राजिवकमल
किंकणीकरधनी, कमर का आभूषण
पय पानदूध पीना
सुरपतिदेवताओं के स्वामी — इंद्र
षट दश सहससोलह हज़ार
पारथपृथा (कुंती) के पुत्र — अर्जुन
तंदुलचावल
पदारथ चारिचार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

अर्थ (हिन्दी)

  1. हाथ में मधुर बाँसुरी सुशोभित है और शरीर नील मेघ जैसा श्याम है; अरुण अधर मानो बिम्बाफल हों और नेत्र कमल के समान मनोहर।
  2. पूर्ण चंद्रमा-सा और कमल-सा मुख है, पीताम्बर का शुभ शृंगार है। हे मनमोहन, कामदेव-सी छवि वाले कृष्णचन्द्र महाराज, आपकी जय हो।
  3. हे यदुवंश के नंदन, हे जगत के वंदनीय, हे वसुदेव और देवकी के पुत्र — आपकी जय हो।
  4. हे यशोदा के पुत्र और नंद के दुलारे, आपकी जय हो; आप भक्तों की आँखों के तारे हैं।
  5. हे नटनागर, हे कालिय नाग को नाथने वाले; हे कृष्ण कन्हैया, गायें चराने वाले — जय हो।
  6. हे प्रभु, जिन्होंने नख पर गोवर्धन पर्वत धारण किया — पधारिए और दीनों का कष्ट दूर कीजिए।
  7. आपके अधरों पर धरी मधुर बाँसुरी — उसी के प्रभाव से मेरा मनोरथ पूर्ण हो।
  8. हे हरि, फिर आइए और माखन चखिए; आज भारत की लाज रखिए।
  9. गोल कपोल और अरुण ठुड्डी; कोमल मुस्कान मोहिनी-सी डाल देती है।
  10. कमल जैसे बड़े और रंजित नेत्र; सिर पर मोर मुकुट और गले में वैजयंती माला।
  11. कानों में कुंडल और सुंदर पीत वस्त्र; कमर में करधनी सजी है।
  12. नील कमल-सा सुंदर शरीर सुशोभित है; यह छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनि — सबका मन मोहित हो जाता है।
  13. मस्तक पर तिलक और घुँघराली लटें; हे बाँसुरी वाले कृष्ण, पधारिए।
  14. दूध पिलाने आई पूतना को भी दुग्धपान करके तार दिया; अघासुर, बकासुर और कागासुर का वध किया।
  15. जब मधुवन में अग्नि की ज्वाला जलने लगी, तो नंदलाल के देखते ही वह शीतल हो गई।
  16. जब इंद्र क्रोध में ब्रज पर चढ़ आए और मूसलधार वर्षा की।
  17. ब्रज बहते-बहते बचा; आपने गोवर्धन को नख पर धारण कर उसे बचा लिया।
  18. माता यशोदा के मन में भ्रम बढ़ा, तब आपने अपने मुख में चौदह भुवन दिखा दिए।
  19. दुष्ट कंस ने बहुत उपद्रव मचाया और करोड़ों कमल-पुष्प मँगवाए।
  20. तब आपने कालिय नाग को नाथ लिया और अपने चरण-चिह्न देकर उसे निर्भय कर दिया।
  21. गोपियों के संग रास रचाकर आपने सबकी अभिलाषा पूर्ण की।
  22. कितने ही महा असुरों का संहार किया; कंस को केश पकड़कर मार डाला।
  23. माता-पिता को बंदीगृह से छुड़ाया और उग्रसेन को राज्य दिलाया।
  24. मृत्युलोक से देवकी के छहों मृत पुत्रों को लौटा लाए और माता का शोक मिटाया।
  25. भौमासुर और मुर दैत्य का संहार किया, और सोलह हज़ार कन्याओं को मुक्त करा लाए।
  26. तिनके का सहारा देकर भी रक्षा की; जरासंध जैसे राक्षस का अंत कराया।
  27. बकासुर आदि असुरों को मारा और भक्तों के कष्ट दूर किए।
  28. दीन सुदामा का दुःख दूर किया — उनके लाए चावल की तीन मुट्ठी मुख में डाल लीं।
  29. विदुर के घर प्रेम से साग माँगकर खाया और दुर्योधन के मेवे त्याग दिए।
  30. प्रेम की महिमा देखिए — ऐसे हैं श्याम, दीनों का हित करने वाले।
  31. महाभारत में पार्थ (अर्जुन) का रथ हाँका; हाथ में चक्र लिया, पर अपने बल का प्रयोग नहीं किया।
  32. अपनी गीता का ज्ञान सुनाया और भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।
  33. मीरा ऐसी मतवाली थीं कि ताली बजाते हुए विष भी पी गईं।
  34. राणा ने पिटारी में साँप भेजा, पर बनवारी उसमें शालिग्राम बनकर प्रकट हो गए।
  35. आपने ब्रह्मा जी को अपनी माया दिखाई और उनके हृदय का सारा संशय मिटा दिया।
  36. शिशुपाल ने सौ बार निंदा की, और उसी क्षण वह जीवन-मुक्त हो गया।
  37. जब द्रौपदी ने पुकारा — "हे दीनानाथ, अब लाज जा रही है"।
  38. तुरंत नंदलाल स्वयं वस्त्र बन गए; चीर बढ़ता गया और शत्रुओं का मुँह काला हो गया।
  39. ऐसे हैं नाथों के नाथ कन्हैया — भँवर में डूबती नाव को भी बचा लेते हैं।
  40. सुन्दरदास हृदय में यही आस धारण किए है — हे बनवारी, दया-दृष्टि कीजिए। (यही रचयिता की छाप है।)
  41. हे नाथ, मेरी सारी कुमति दूर कीजिए और मेरे अपराध शीघ्र क्षमा कीजिए।
  42. अब पट खोलिए और दर्शन दीजिए — बोलो कृष्ण कन्हैया की जय।
  43. फलश्रुति: जो कृष्ण का यह चालीसा हृदय में धारण कर पाठ करता है, वह अष्ट सिद्धि, नवनिधि तथा चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्त करता है।

लाभ

  • पूरी कृष्ण-लीला एक ही पाठ में आ जाती है — बाल-लीला से गीता और द्रौपदी-रक्षा तक।
  • जन्माष्टमी की पूजा का प्रमुख पाठ; बुधवार व एकादशी को भी पढ़ा जाता है।
  • भाषा सरल है और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।
  • परंपरा में प्रेम, भक्ति व मन की शांति के भाव से पढ़ी जाती है।

कब करें पाठ

जन्माष्टमी पर — विशेषकर मध्यरात्रि मेंबुधवार कोएकादशी व नित्य संध्या मेंब्रज-यात्रा में — मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन

पाठ विधि

श्री कृष्ण के चित्र या विग्रह के समक्ष दीप जलाएँ, तुलसी-दल, पीले पुष्प और माखन-मिश्री अर्पित करें। पहले दोनों दोहे पढ़ें, फिर चालीस चौपाइयाँ, और अंत में समापन दोहा। जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि का पाठ विशेष कहा जाता है। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — चालीसा: श्री कृष्ण (आधार-पाठ) · aartichalisa.com — Krishna Chalisa (स्वतंत्र पुष्टि; शब्द-मिलान 92.8%, अंतर केवल वर्तनी के) · रचयिता की छाप — चौपाई 38 "सुन्दरदास आस उर धारी"
रचयिताअज्ञात (छाप: सुन्दरदास)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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श्री कृष्ण चालीसा — सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ