श्री विट्ठल चालीसा

śrī viṭṭhala cālīsā

Vitthal Chalisa (Panduranga)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
एकादशी; आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: पारंपरिक विट्ठल चालीसा (पंढरपुर)

संपूर्ण चालीसा

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गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। विट्ठल-पांडुरंग की, वंदना करूँ महान॥

गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं विट्ठल-पांडुरंग की महान वंदना करता हूँ।

जय जय विट्ठल पांडुरंगा। रुक्मिणी-वल्लभ भक्त-संगा॥

हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप रुक्मिणी-वल्लभ व भक्तों के संगी हैं।

कर कटि पर धरे विराजे। विटे पर खड़े छवि साजे॥

दोनों हाथ कमर पर रखे आप विराजते हैं; ईंट (विटा) पर खड़े आपकी छवि सजती है।

श्याम-वरण तन शोभा भारी। रूप निरख त्रिभुवन मन-हारी॥

श्याम वर्ण तन की अति शोभा है; आपका रूप निरखकर तीनों लोकों का मन हर जाता है।

पुण्डलिक के भक्तिवश आये। विटे पर खड़े प्रभु शोभाये॥

भक्त पुण्डलिक की भक्ति के वश आप आए और ईंट पर खड़े होकर सुशोभित हुए।

विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा। पंढरपुर में धाम तुम्हारा॥

आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; पंढरपुर में आपका धाम है।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।

वारकरी जन गुण गाते। "विठ्ठल-विठ्ठल" नित गाते॥

वारकरी भक्त आपके गुण गाते हैं और नित्य "विठ्ठल-विठ्ठल" का स्मरण करते हैं।

चन्द्रभागा तट शोभा पावै। भक्त-गण नित दरस को धावै॥

चन्द्रभागा नदी का तट शोभा पाता है; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

आषाढ़ी वारी जो जन धारे। नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥

जो आषाढ़ी वारी (पदयात्रा) करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। नाम-भक्ति-सुख सहज वह पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का सुख पाता है।

संत-ज्ञानेश्वर-तुकाराम प्यारे। नामदेव-एकनाथ दुलारे॥

संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम आपके प्यारे हैं; नामदेव व एकनाथ आपके दुलारे हैं।

अभंग-कीर्तन जो जन गावै। भव-बंधन से वह छुट जावै॥

जो जन अभंग व कीर्तन गाता है, वह भव-बंधन से छूट जाता है।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। विट्ठल-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही विट्ठल-कृपा प्राप्त करता है।

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।

जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।

रुक्मिणी-संग शोभा पाते। भक्तन के सब दुख मिटाते॥

आप रुक्मिणी जी के संग शोभा पाते हैं और भक्तों के सब दुःख मिटाते हैं।

जो यह विट्ठल चालीसा गावै। नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

जो यह विट्ठल चालीसा गाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा विट्ठल की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर विट्ठल की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। नाम-भक्ति-सुख घर लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में नाम-भक्ति का सुख लाते हैं।

विट्ठल-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर विट्ठल की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

कार्तिकी-एकादशी जो धारे। नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥

जो कार्तिकी एकादशी का व्रत धारण करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत विट्ठल देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर विट्ठल देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

भक्त-वत्सल तुम कहलाते। नाम-भक्ति से रीझ जाते॥

आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और नाम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

सरल भक्ति का मार्ग दिखाते। समता-प्रेम जग को भाते॥

आप सरल भक्ति का मार्ग दिखाते हैं; समता व प्रेम जगत को भाते हैं।

दुःख-दरिद्र जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

जो जन दुःख-दरिद्रता से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।

विट्ठल-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

जो जन विट्ठल-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।

पंढरी-वारी की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

पंढरी-वारी (पदयात्रा) की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।

नाम-स्मरण की महिमा गाते। सरल भक्ति जग को सिखलाते॥

आप नाम-स्मरण की महिमा गाते हैं और जगत को सरल भक्ति सिखलाते हैं।

जो जन विट्ठल गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन विट्ठल के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

विट्ठल-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन विट्ठल-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

नाम-भक्ति-सुख घर में आवै। भक्ति-शान्ति-संतोष बढ़ावै॥

घर में नाम-भक्ति का सुख आता है और भक्ति, शांति व संतोष बढ़ता है।

भय-संकट सब दूर हटावै। विट्ठल जो जन नित ध्यावै॥

जो जन विट्ठल का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। विट्ठल-नाम जो जन गावै॥

जो जन विट्ठल-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।

सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै। प्रेम-समता सब बढ़ावै॥

घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व समता बढ़ती है।

जय जय जय विट्ठल पांडुरंगा। भक्त-वत्सल तुम भव-तारण-गंगा॥

हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप भक्त-वत्सल व भव-तारण रूपी गंगा हैं।

विट्ठल चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। नाम-भक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल विट्ठल चालीसा पढ़ता है, उसे नाम-भक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं विट्ठल-पांडुरंग की महान वंदना करता हूँ।
  2. हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप रुक्मिणी-वल्लभ व भक्तों के संगी हैं।
  3. दोनों हाथ कमर पर रखे आप विराजते हैं; ईंट (विटा) पर खड़े आपकी छवि सजती है।
  4. श्याम वर्ण तन की अति शोभा है; आपका रूप निरखकर तीनों लोकों का मन हर जाता है।
  5. भक्त पुण्डलिक की भक्ति के वश आप आए और ईंट पर खड़े होकर सुशोभित हुए।
  6. आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; पंढरपुर में आपका धाम है।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।
  8. वारकरी भक्त आपके गुण गाते हैं और नित्य "विठ्ठल-विठ्ठल" का स्मरण करते हैं।
  9. चन्द्रभागा नदी का तट शोभा पाता है; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो आषाढ़ी वारी (पदयात्रा) करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का सुख पाता है।
  14. संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम आपके प्यारे हैं; नामदेव व एकनाथ आपके दुलारे हैं।
  15. जो जन अभंग व कीर्तन गाता है, वह भव-बंधन से छूट जाता है।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही विट्ठल-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  19. आप रुक्मिणी जी के संग शोभा पाते हैं और भक्तों के सब दुःख मिटाते हैं।
  20. जो यह विट्ठल चालीसा गाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर विट्ठल की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में नाम-भक्ति का सुख लाते हैं।
  23. जिन पर विट्ठल की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. जो कार्तिकी एकादशी का व्रत धारण करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर विट्ठल देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और नाम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. आप सरल भक्ति का मार्ग दिखाते हैं; समता व प्रेम जगत को भाते हैं।
  31. जो जन दुःख-दरिद्रता से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  32. जो जन विट्ठल-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  33. पंढरी-वारी (पदयात्रा) की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  34. आप नाम-स्मरण की महिमा गाते हैं और जगत को सरल भक्ति सिखलाते हैं।
  35. जो जन विट्ठल के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन विट्ठल-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में नाम-भक्ति का सुख आता है और भक्ति, शांति व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन विट्ठल का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन विट्ठल-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व समता बढ़ती है।
  41. हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप भक्त-वत्सल व भव-तारण रूपी गंगा हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल विट्ठल चालीसा पढ़ता है, उसे नाम-भक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • भक्ति, नाम-स्मरण व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • भय व संकट दूर होकर सुख-शांति आती है।
  • श्रीकृष्ण/विष्णु की कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  • मन में समता, प्रेम व संतोष का संचार होता है।

कब करें पाठ

आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी (वारी) परनित्य संध्या मेंगुरुवार व एकादशी को

पाठ विधि

भगवान विट्ठल के समक्ष तुलसी व पुष्प अर्पित करें, "विठ्ठल-विठ्ठल" व अभंग गाते हुए श्रद्धापूर्वक चालीसा का पाठ करें। आषाढ़ी एकादशी (पंढरपुर वारी) पर इसका विशेष महत्व है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक विट्ठल चालीसा · वारकरी सम्प्रदाय परंपरा
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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