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॥ श्री ॥

श्री विट्ठल चालीसा

चालीसा · श्री कृष्ण

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। विट्ठल-पांडुरंग की, वंदना करूँ महान॥

1

जय जय विट्ठल पांडुरंगा। रुक्मिणी-वल्लभ भक्त-संगा॥

2

कर कटि पर धरे विराजे। विटे पर खड़े छवि साजे॥

3

श्याम-वरण तन शोभा भारी। रूप निरख त्रिभुवन मन-हारी॥

4

पुण्डलिक के भक्तिवश आये। विटे पर खड़े प्रभु शोभाये॥

5

विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा। पंढरपुर में धाम तुम्हारा॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

7

वारकरी जन गुण गाते। "विठ्ठल-विठ्ठल" नित गाते॥

8

चन्द्रभागा तट शोभा पावै। भक्त-गण नित दरस को धावै॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

आषाढ़ी वारी जो जन धारे। नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। नाम-भक्ति-सुख सहज वह पावै॥

13

संत-ज्ञानेश्वर-तुकाराम प्यारे। नामदेव-एकनाथ दुलारे॥

14

अभंग-कीर्तन जो जन गावै। भव-बंधन से वह छुट जावै॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। विट्ठल-कृपा सहज वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

18

रुक्मिणी-संग शोभा पाते। भक्तन के सब दुख मिटाते॥

19

जो यह विट्ठल चालीसा गावै। नाम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा विट्ठल की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। नाम-भक्ति-सुख घर लावैं॥

22

विट्ठल-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

कार्तिकी-एकादशी जो धारे। नाम-भक्ति-सुख प्रभु ता पर वारे॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत विट्ठल देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

27

भक्त-वत्सल तुम कहलाते। नाम-भक्ति से रीझ जाते॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

सरल भक्ति का मार्ग दिखाते। समता-प्रेम जग को भाते॥

30

दुःख-दरिद्र जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

31

विट्ठल-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

32

पंढरी-वारी की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

33

नाम-स्मरण की महिमा गाते। सरल भक्ति जग को सिखलाते॥

34

जो जन विट्ठल गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

विट्ठल-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

नाम-भक्ति-सुख घर में आवै। भक्ति-शान्ति-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। विट्ठल जो जन नित ध्यावै॥

38

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। विट्ठल-नाम जो जन गावै॥

39

सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै। प्रेम-समता सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय विट्ठल पांडुरंगा। भक्त-वत्सल तुम भव-तारण-गंगा॥

विट्ठल चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। नाम-भक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं विट्ठल-पांडुरंग की महान वंदना करता हूँ।
  2. हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप रुक्मिणी-वल्लभ व भक्तों के संगी हैं।
  3. दोनों हाथ कमर पर रखे आप विराजते हैं; ईंट (विटा) पर खड़े आपकी छवि सजती है।
  4. श्याम वर्ण तन की अति शोभा है; आपका रूप निरखकर तीनों लोकों का मन हर जाता है।
  5. भक्त पुण्डलिक की भक्ति के वश आप आए और ईंट पर खड़े होकर सुशोभित हुए।
  6. आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; पंढरपुर में आपका धाम है।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।
  8. वारकरी भक्त आपके गुण गाते हैं और नित्य "विठ्ठल-विठ्ठल" का स्मरण करते हैं।
  9. चन्द्रभागा नदी का तट शोभा पाता है; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो आषाढ़ी वारी (पदयात्रा) करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का सुख पाता है।
  14. संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम आपके प्यारे हैं; नामदेव व एकनाथ आपके दुलारे हैं।
  15. जो जन अभंग व कीर्तन गाता है, वह भव-बंधन से छूट जाता है।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही विट्ठल-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  19. आप रुक्मिणी जी के संग शोभा पाते हैं और भक्तों के सब दुःख मिटाते हैं।
  20. जो यह विट्ठल चालीसा गाता है, वह सहज ही नाम-भक्ति का रस पाता है।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर विट्ठल की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में नाम-भक्ति का सुख लाते हैं।
  23. जिन पर विट्ठल की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. जो कार्तिकी एकादशी का व्रत धारण करता है, प्रभु उस पर नाम-भक्ति का सुख न्योछावर करते हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर विट्ठल देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और नाम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. आप सरल भक्ति का मार्ग दिखाते हैं; समता व प्रेम जगत को भाते हैं।
  31. जो जन दुःख-दरिद्रता से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  32. जो जन विट्ठल-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  33. पंढरी-वारी (पदयात्रा) की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  34. आप नाम-स्मरण की महिमा गाते हैं और जगत को सरल भक्ति सिखलाते हैं।
  35. जो जन विट्ठल के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन विट्ठल-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में नाम-भक्ति का सुख आता है और भक्ति, शांति व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन विट्ठल का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन विट्ठल-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व समता बढ़ती है।
  41. हे विट्ठल पांडुरंग, आपकी जय हो; आप भक्त-वत्सल व भव-तारण रूपी गंगा हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल विट्ठल चालीसा पढ़ता है, उसे नाम-भक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • भक्ति, नाम-स्मरण व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • भय व संकट दूर होकर सुख-शांति आती है।
  • श्रीकृष्ण/विष्णु की कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  • मन में समता, प्रेम व संतोष का संचार होता है।

कब करें पाठ

आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी (वारी) पर · नित्य संध्या में · गुरुवार व एकादशी को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक विट्ठल चालीसा · वारकरी सम्प्रदाय परंपरा

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