श्री कृष्ण आरती

śrī kṛṣṇa āratī

Krishna Aarti (Aarti Kunj Bihari Ki)

समय
4–5 मिनट
श्लोक/चौपाई
5
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
जन्माष्टमी; नित्य संध्या; एकादशी
उद्देश्य:प्रेम-भक्ति (Loving devotion)मन की शांति (Peace)आनंद (Joy)
✓ संपूर्ण

"आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की" भगवान कृष्ण की सबसे प्रचलित आरतियों में से है। इसमें एक टेक और चार पद हैं — पहला कृष्ण का रूप, दूसरा रास का उत्सव, तीसरा उनके चरणों से निकली गंगा, और चौथा यमुना-तट की चाँदनी रात। हर पद "…की" पर समाप्त होता है और टेक से जुड़ जाता है।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: "आरती कुंजबिहारी की" — ब्रज की परंपरागत आरती

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री कृष्ण आरती
IASTśrī kṛṣṇa āratī
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोत"आरती कुंजबिहारी की" — ब्रज की परंपरागत आरती
शुभ दिनजन्माष्टमी; नित्य संध्या; एकादशी
पाठ समय4–5 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह आरती एक चित्र की तरह चलती है — हर पद वृंदावन का एक दृश्य है, और हर दृश्य के अंत में भक्त उसी "कुंजबिहारी" की आरती पर लौट आता है।

रूप (पद 1). गले में वैजयंती माला, होठों पर मुरली, कानों में झिलमिलाते कुंडल, आकाश जैसा साँवला अंग और पास में चमकती राधिका — "भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चन्द्र सी झलक"। पद का अंत राधा पर होता है: "ललित छवि श्यामा प्यारी की"।

रास (पद 2). सोने का मोरमुकुट, दर्शन को तरसते देवता, आकाश से फूलों की वर्षा, और मुरचंग-मृदंग के साथ ग्वालिनों का संग — "अतुल रति गोप कुमारी की", गोपियों का अतुलनीय प्रेम।

गंगा (पद 3). यह पद कृष्ण के चरणों की महिमा गाता है — "जहां ते प्रकट भई गंगा": वही गंगा, जो कलियुग के कलुष हरती है और शिव की जटाओं में बसती है, इन्हीं चरणों से निकली। विष्णु के चरण से गंगा के प्रकट होने की कथा यहाँ कृष्ण के चरणों पर आ जाती है — "चरन छवि श्रीबनवारी की"।

यमुना-तट (पद 4). चमकती रेत, वृंदावन की बाँसुरी, चारों ओर गोपियाँ, ग्वाले और गायें, मंद मुस्कान और चाँदनी — और इस दृश्य में भव-बंधन कट जाते हैं। आरती का अंतिम भाव भक्त की पुकार है: "टेर सुन दीन भिखारी की"।

आरती (लिरिक्स)

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आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

(टेक) कुंजों में विहार करने वाले, गिरि (गोवर्धन) धारण करने वाले, मुर दैत्य के शत्रु श्री कृष्ण की आरती।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चन्द्र सी झलक; ललित छवि श्यामा प्यारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

गले में वैजयंती माला है, और वह बाल-रूप मधुर मुरली बजाता है; कानों में कुंडल झिलमिलाते हैं — नंद के आनंद, नंदलाल। आकाश-सा साँवला अंग है, और हे सखी, पास में राधिका चमक रही हैं; वनमाला धारी लताओं के बीच खड़े हैं — भौंरों-सी काली अलकें, कस्तूरी का तिलक, चंद्रमा-सी झलक; श्यामा (राधा) को प्रिय यह ललित छवि है।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं। गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग; अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

सोने का मोरमुकुट शोभा पा रहा है, देवता दर्शन को तरसते हैं; आकाश से फूलों के ढेर बरस रहे हैं; मुरचंग और मधुर मृदंग बज रहे हैं, ग्वालिनों का संग है — यह गोप-कुमारियों के अतुलनीय प्रेम (की लीला) है।

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा। स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच; चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

जिन (चरणों) से गंगा प्रकट हुईं — कलियुग के कलुष हरने वाली श्रीगंगा, जिनके स्मरण से मोह टूट जाता है, जो शिव के शीश पर जटाओं के बीच बसती हैं और पाप का कीचड़ धो देती हैं — ऐसी है श्री बनवारी (कृष्ण) के चरणों की छवि।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू। चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद; टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

(यमुना-)तट की उजली रेत चमक रही है, वृंदावन में बाँसुरी बज रही है; चारों ओर गोपियाँ, ग्वाले और गायें हैं; (कृष्ण) मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं, चंद्रमा की चाँदनी है, और संसार के बंधन कट रहे हैं — हे प्रभु, इस दीन भिखारी की पुकार सुनिए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. (टेक) कुंजों में विहार करने वाले, गिरि (गोवर्धन) धारण करने वाले, मुर दैत्य के शत्रु श्री कृष्ण की आरती।
  2. गले में वैजयंती माला है, और वह बाल-रूप मधुर मुरली बजाता है; कानों में कुंडल झिलमिलाते हैं — नंद के आनंद, नंदलाल। आकाश-सा साँवला अंग है, और हे सखी, पास में राधिका चमक रही हैं; वनमाला धारी लताओं के बीच खड़े हैं — भौंरों-सी काली अलकें, कस्तूरी का तिलक, चंद्रमा-सी झलक; श्यामा (राधा) को प्रिय यह ललित छवि है।
  3. सोने का मोरमुकुट शोभा पा रहा है, देवता दर्शन को तरसते हैं; आकाश से फूलों के ढेर बरस रहे हैं; मुरचंग और मधुर मृदंग बज रहे हैं, ग्वालिनों का संग है — यह गोप-कुमारियों के अतुलनीय प्रेम (की लीला) है।
  4. जिन (चरणों) से गंगा प्रकट हुईं — कलियुग के कलुष हरने वाली श्रीगंगा, जिनके स्मरण से मोह टूट जाता है, जो शिव के शीश पर जटाओं के बीच बसती हैं और पाप का कीचड़ धो देती हैं — ऐसी है श्री बनवारी (कृष्ण) के चरणों की छवि।
  5. (यमुना-)तट की उजली रेत चमक रही है, वृंदावन में बाँसुरी बज रही है; चारों ओर गोपियाँ, ग्वाले और गायें हैं; (कृष्ण) मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं, चंद्रमा की चाँदनी है, और संसार के बंधन कट रहे हैं — हे प्रभु, इस दीन भिखारी की पुकार सुनिए।

लाभ

  • प्रेम-भक्ति का पाठ — आरती पूरी की पूरी वृंदावन की लीला का चित्र है।
  • मन को शांत और प्रसन्न करने वाली — "हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद"।
  • तीसरा पद गंगा के प्रसंग से पाप-नाश का भाव जोड़ता है — "हरै अघ कीच"।
  • अंतिम पंक्ति शरणागति की है — "टेर सुन दीन भिखारी की"।

कब करें पाठ

जन्माष्टमी की मध्यरात्रि मेंप्रतिदिन संध्या आरती मेंएकादशी पर

पाठ विधि

श्री कृष्ण के समक्ष घी का दीप जलाएँ, माखन-मिश्री और तुलसीदल का भोग रखें। पहले टेक "आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की" गाएँ; फिर हर पद के बाद "श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की" और पूरी टेक दोहराएँ। चारों पद पूरे होने पर अंत में एक बार फिर टेक गाएँ।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — आरती कुंज बिहारी की (आधार-पाठ) · bhaktibharat.com — आरती कुंजबिहारी की · bhajandiary.com — आरती कुंजबिहारी की लिरिक्स · bhaktibhawna.com — आरती कुंजबिहारी की लिरिक्स
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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श्री कृष्ण आरती — सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ