श्री राधा आरती

śrī rādhā āratī

Shri Radha Aarti (Aarti Shri Vrishabhanusuta Ki)

समय
3 मिनट
श्लोक/चौपाई
5
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
राधाष्टमी, नित्य संध्या व एकादशी
उद्देश्य:प्रेम (Love)भक्ति (Devotion)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण

श्री राधा की सबसे प्रचलित आरती "आरती श्री वृषभानुसुता की" है — वृषभानु की पुत्री राधा की आरती। चार पदों की इस आरती में उन्हें संसार के तीनों तापों को हरने वाली, विवेक-वैराग्य जगाने वाली, कृष्ण के तन-मन को आकर्षित करने वाली और जगत की माता कहा गया है। बरसाना व वृंदावन में यही गाई जाती है।

परिचय

श्री राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं — पुराणों में उन्हें श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री शक्ति और प्रेम-भक्ति का सर्वोच्च रूप कहा गया है।

स्रोत: परंपरागत ब्रज आरती — "आरती श्री वृषभानुसुता की"; रचयिता अज्ञात

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री राधा आरती
IASTśrī rādhā āratī
देवताश्री राधा
मूल स्रोतपरंपरागत ब्रज आरती — "आरती श्री वृषभानुसुता की"; रचयिता अज्ञात
शुभ दिनराधाष्टमी, नित्य संध्या व एकादशी
पाठ समय3 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह आरती राधा जी को वृषभानुसुता कहकर आरंभ होती है — वृषभानु की पुत्री। गर्गसंहिता (1.15.34) भी यही कहती है कि राधा वृषभानु की पुत्री हैं और उनका प्राकट्य कीर्ति के घर हुआ।

आरती का भाव केवल रूप-वर्णन नहीं है। पहला पद उन्हें "त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि" कहता है — जन्म-मरण के चक्र और तीनों तापों को मिटाने वाली; और "विमल विवेक विराग विकासिनि" — निर्मल विवेक तथा वैराग्य को खिलाने वाली। यानी यह प्रेम के साथ-साथ विवेक की भी प्रार्थना है।

अंतिम पद में उन्हें "कृष्णात्मिका" कहा गया है — कृष्ण की आत्मस्वरूपा, उनसे अलग नहीं। यही भाव ब्रह्मवैवर्त पुराण का भी है, जहाँ राधा को कृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री शक्ति कहा गया है। हर पद के बाद "आरती श्री वृषभानुसुता की" टेक दोहराई जाती है।

आरती (लिरिक्स)

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आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की॥

वृषभानु की पुत्री श्री राधा की आरती — जिनकी मनोहर मूर्ति स्वयं मोहन (कृष्ण) की ममता का स्वरूप है। यही पंक्ति हर पद के बाद टेक की तरह दोहराई जाती है।

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि। पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की॥

वे तीनों तापों से भरे इस संसार-चक्र को मिटाने वाली हैं; निर्मल विवेक और वैराग्य को खिलाने वाली; प्रभु के पावन चरणों में प्रीति जगाने वाली; और सुंदरता की भी सबसे सुंदर छवि हैं।

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरति सोहनि। अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिता की॥

जो मुनियों के मन को मोह लेते हैं, उन मोहन (कृष्ण) को भी मोह लेने वाली; मधुर और मनोहर मूर्ति से सुशोभित; निरंतर प्रेम-अमृत का रस बहाने वाली; और सखी ललिता की सदा अत्यंत प्रिय।

संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी। आकर्षिणी कृष्ण तन मन की, अति अमूल्य सम्पति समता की॥

वे सत्पुरुषों और मुनिजनों की निरंतर सेवनीय हैं; अनगिनत दिव्य गुणों की खान; कृष्ण के तन और मन को आकर्षित करने वाली; और समता (समान भाव) की अत्यंत अमूल्य संपत्ति हैं।

कृष्णात्मिका कृष्ण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि। जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि, आदि अनादि शक्ति विभुता की॥

वे कृष्ण की आत्मस्वरूपा और नित्य संगिनी हैं; चिन्मय वृंदावन के वनों में विहार करने वाली; जगत की जननी और जगत के दुःख हरने वाली; तथा आदि-अनादि शक्ति की विभूति हैं।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

वृषभानुसुतावृषभानु की पुत्री — श्री राधा
मंजुलमनोहर, सुंदर
त्रिविध तापतीन प्रकार के कष्ट — आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक
संसृतिजन्म-मरण का चक्र, संसार
विरागवैराग्य, आसक्ति का छूटना
अमियअमृत
दोहनिदुहने वाली — यहाँ रस बहाने वाली
ललिताराधा की अष्टसखियों में प्रमुख सखी
आकरखान, भंडार
कृष्णात्मिकाकृष्ण की आत्मस्वरूपा
चिन्मयचेतन-स्वरूप, ज्ञानमय
जगज्जननिजगत की माता

अर्थ (हिन्दी)

  1. वृषभानु की पुत्री श्री राधा की आरती — जिनकी मनोहर मूर्ति स्वयं मोहन (कृष्ण) की ममता का स्वरूप है। यही पंक्ति हर पद के बाद टेक की तरह दोहराई जाती है।
  2. वे तीनों तापों से भरे इस संसार-चक्र को मिटाने वाली हैं; निर्मल विवेक और वैराग्य को खिलाने वाली; प्रभु के पावन चरणों में प्रीति जगाने वाली; और सुंदरता की भी सबसे सुंदर छवि हैं।
  3. जो मुनियों के मन को मोह लेते हैं, उन मोहन (कृष्ण) को भी मोह लेने वाली; मधुर और मनोहर मूर्ति से सुशोभित; निरंतर प्रेम-अमृत का रस बहाने वाली; और सखी ललिता की सदा अत्यंत प्रिय।
  4. वे सत्पुरुषों और मुनिजनों की निरंतर सेवनीय हैं; अनगिनत दिव्य गुणों की खान; कृष्ण के तन और मन को आकर्षित करने वाली; और समता (समान भाव) की अत्यंत अमूल्य संपत्ति हैं।
  5. वे कृष्ण की आत्मस्वरूपा और नित्य संगिनी हैं; चिन्मय वृंदावन के वनों में विहार करने वाली; जगत की जननी और जगत के दुःख हरने वाली; तथा आदि-अनादि शक्ति की विभूति हैं।

लाभ

  • राधा जी का सबसे प्रचलित आरती-पाठ — बरसाना व वृंदावन में यही गाई जाती है।
  • आरती स्वयं प्रेम के साथ विवेक व वैराग्य की प्रार्थना करती है (पद 2)।
  • राधाष्टमी की पूजा का सहज अंग; नित्य संध्या-आरती में भी गाई जाती है।
  • छोटी है और भाषा सरल — बच्चे भी सहज कंठस्थ कर लेते हैं।

कब करें पाठ

राधाष्टमी परनित्य संध्या-आरती मेंजन्माष्टमी व एकादशी परराधा-कृष्ण के युगल विग्रह की पूजा के अंत में

पाठ विधि

राधा-कृष्ण के चित्र या विग्रह के समक्ष दीप जलाकर आरती गाएँ। हर पद के बाद "आरती श्री वृषभानुसुता की" टेक दोहराएँ। अंत में प्रणाम कर प्रसाद बाँटें। परंपरा में राधा जी को माखन-मिश्री, पंजीरी या मिष्ठान्न का भोग अर्पित किया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — श्री राधा आरती (आरती श्री वृषभानुसुता की) · bhaktibharat.com — श्री राधा: आरती श्री वृषभानुसुता की (स्वतंत्र पुष्टि, पाठ शब्दशः एक) · वृषभानु-पुत्री व कीर्ति के घर प्राकट्य — गर्गसंहिता 1.15.34
रचयिताअज्ञात (परंपरा से प्रचलित)
अंतिम अद्यतनजून 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री राधा

Shri Radha (Radha Rani)

श्री राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं — पुराणों में उन्हें श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री शक्ति और प्रेम-भक्ति का सर्वोच्च रूप कहा गया है।

देवता वर्गप्रेम · भक्ति · कृपा · माधुर्य
मुख्य मंत्रॐ राधायै स्वाहा
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श्री राधा आरती — सामान्य प्रश्न

श्री राधा भक्ति संग्रह

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