श्री खाटू श्याम आरती

śrī khāṭū śyāma āratī

Khatu Shyam Aarti (Om Jai Shri Shyam Hare)

समय
3–4 मिनट
श्लोक/चौपाई
8
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
प्रतिदिन; प्रत्येक एकादशी; फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी (लक्खी मेला)
उद्देश्य:शरणागत रक्षा (Refuge)मनोकामना पूर्ति (Fulfilment of Wishes)संकट मोचन (Relief from Crisis)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)

श्री खाटू श्याम आरती "ॐ जय श्री श्याम हरे" आठ पदों की आरती है, जो खाटू धाम में प्रतिदिन गाई जाती है। इसमें रत्नजड़ित सिंहासन, केसरिया बागा तथा मोदक-खीर-चूरमा के भोग का वर्णन है। मंदिर में यह दिन में पाँच बार होती है।

परिचय

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

स्रोत: खाटू धाम की प्रचलित आरती; मंदिर में प्रतिदिन पाँच बार गाई जाती है

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री खाटू श्याम आरती
IASTśrī khāṭū śyāma āratī
देवताश्री खाटू श्याम
मूल स्रोतखाटू धाम की प्रचलित आरती; मंदिर में प्रतिदिन पाँच बार गाई जाती है
शुभ दिनप्रतिदिन; प्रत्येक एकादशी; फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी (लक्खी मेला)
पाठ समय3–4 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री खाटू श्याम आरती — "ॐ जय श्री श्याम हरे" — खाटू परंपरा की सबसे प्रचलित आरती है। खाटू धाम (सीकर, राजस्थान) में यह प्रतिदिन पाँच बार होती है: मंगला, श्रृंगार, राज-भोग, संध्या तथा शयन आरती।

आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह दृश्य खींचती है, उपदेश नहीं देती। दूसरे पद में रत्नजड़ित सिंहासन, सिर पर डुलता चँवर, शरीर पर केसरिया बागा और कानों में कुण्डल आते हैं। तीसरे में पुष्पों की माला, मुकुट, धूप और दीपक की ज्योति। चौथे में भोग — मोदक, खीर तथा चूरमा से भरे सुवर्ण-थाल; खाटू में चूरमा सबसे प्रचलित भोग है और उसका आधार यही पंक्ति है।

पाँचवाँ पद सबसे जीवंत है — *"झाँझ कटोरा और घड़ियावल, शंख मृदंग घुरे"*। यह आरती के समय का वास्तविक शब्द-चित्र है: सारे वाद्य एक साथ बज उठते हैं और भक्त जय-जयकार करते हैं। जिसने खाटू में आरती देखी है, उसे यह पंक्ति पहचानी लगेगी।

सातवाँ पद फलश्रुति है और वहाँ एक नाम आता है जो ध्यान देने योग्य है — "श्री श्याम बिहारी"। यह खाटू श्याम का एक प्रचलित सम्बोधन है।

एक बात पाठ-भेद की भी दर्ज करने योग्य है। इस आरती की एक संक्षिप्त पाँच-पद वाली वाचना भी ख़ूब प्रचलित है, जिसमें दो अंतर हैं — "सिर पर चंवर ढुरे" के स्थान पर "सिर पर सुन्दर पाग" आता है, और एक अतिरिक्त पद होता है: "हारे का सहारा, श्याम तुम्हारा नाम। लखदातार दयालु, पूरण करो काम।" वह पद पूर्ण वाचना में नहीं है, पर खाटू परंपरा में अत्यंत प्रचलित है — "हारे का सहारा" तो उनकी पहचान ही बन चुका है। इसलिए उसे यहाँ छोड़ा नहीं, दर्ज किया गया है।

अंत में एक स्पष्टीकरण, क्योंकि यह भ्रम बहुत होता है: खाटू श्याम स्वयं श्रीकृष्ण नहीं हैं। वे महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र। श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना नाम "श्याम" दिया था, अपनी पहचान नहीं। इसीलिए उनका पर्व जन्माष्टमी नहीं, एकादशी है — और सबसे बड़ा अवसर फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी का लक्खी मेला।

आरती (लिरिक्स)

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ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे॥

ॐ जय श्री श्याम हरे — बाबा श्याम की जय हो। आप खाटू धाम में विराजमान हैं और अनुपम रूप धारण किए हुए हैं। यही पंक्ति आरती की टेक है और हर पद के बाद दोहराई जाती है।

रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे। तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े॥

रत्नजड़ित सिंहासन पर आप विराजे हैं और सिर पर चँवर डुलाया जा रहा है। शरीर पर केसरिया बागा है और कानों में कुण्डल शोभित हैं। केसरिया रंग खाटू श्याम की पहचान है — भक्त भी वही धारण करते हैं।

गल पुष्पों की माला, सिर पर मुकुट धरे। खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले॥

गले में पुष्पों की माला है और सिर पर मुकुट धरा है। अग्नि पर धूप खेई जा रही है और दीपक की ज्योति जल रही है।

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे। सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे॥

मोदक, खीर तथा चूरमा से सुवर्ण-थाल भरे हैं; सेवक भोग लगाते हैं और नित्य सेवा करते हैं। खाटू में चूरमा सबसे प्रचलित भोग है — यह पंक्ति उसका आधार भी है।

झांझ कटोरा और घड़ियावल, शंख मृदंग घुरे। भक्त आरती गावे, जय-जयकार करे॥

झाँझ, कटोरा, घड़ियाल, शंख तथा मृदंग — सब बज उठते हैं; भक्त आरती गाते हैं और जय-जयकार करते हैं। यह पद खाटू की आरती का वास्तविक दृश्य खींच देता है।

जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे। सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचरे॥

जो ध्यान करता है वह फल पाता है और सब दुःखों से उबर जाता है; सेवक-जन अपने मुख से निरंतर "श्याम-श्याम" उच्चारते हैं।

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत भक्त-जन, मनवांछित फल पावे॥

फलश्रुति: जो कोई श्री श्याम बिहारी की यह आरती गाता है, भक्त-जन कहते हैं कि वह मनवांछित फल पाता है। ("श्याम बिहारी" खाटू श्याम का एक प्रचलित सम्बोधन है।)

जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे॥ बाबा जय श्री श्याम हरे॥

समापन: जय श्री श्याम हरे — बाबा जय श्री श्याम हरे। आपने अपने भक्तों के काज पूर्ण किए हैं। आरती इसी टेक पर लौटकर समाप्त होती है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. ॐ जय श्री श्याम हरे — बाबा श्याम की जय हो। आप खाटू धाम में विराजमान हैं और अनुपम रूप धारण किए हुए हैं। यही पंक्ति आरती की टेक है और हर पद के बाद दोहराई जाती है।
  2. रत्नजड़ित सिंहासन पर आप विराजे हैं और सिर पर चँवर डुलाया जा रहा है। शरीर पर केसरिया बागा है और कानों में कुण्डल शोभित हैं। केसरिया रंग खाटू श्याम की पहचान है — भक्त भी वही धारण करते हैं।
  3. गले में पुष्पों की माला है और सिर पर मुकुट धरा है। अग्नि पर धूप खेई जा रही है और दीपक की ज्योति जल रही है।
  4. मोदक, खीर तथा चूरमा से सुवर्ण-थाल भरे हैं; सेवक भोग लगाते हैं और नित्य सेवा करते हैं। खाटू में चूरमा सबसे प्रचलित भोग है — यह पंक्ति उसका आधार भी है।
  5. झाँझ, कटोरा, घड़ियाल, शंख तथा मृदंग — सब बज उठते हैं; भक्त आरती गाते हैं और जय-जयकार करते हैं। यह पद खाटू की आरती का वास्तविक दृश्य खींच देता है।
  6. जो ध्यान करता है वह फल पाता है और सब दुःखों से उबर जाता है; सेवक-जन अपने मुख से निरंतर "श्याम-श्याम" उच्चारते हैं।
  7. फलश्रुति: जो कोई श्री श्याम बिहारी की यह आरती गाता है, भक्त-जन कहते हैं कि वह मनवांछित फल पाता है। ("श्याम बिहारी" खाटू श्याम का एक प्रचलित सम्बोधन है।)
  8. समापन: जय श्री श्याम हरे — बाबा जय श्री श्याम हरे। आपने अपने भक्तों के काज पूर्ण किए हैं। आरती इसी टेक पर लौटकर समाप्त होती है।

लाभ

  • सातवाँ पद फलश्रुति है — जो यह आरती गाता है वह मनवांछित फल पाता है।
  • छठा पद कहता है कि ध्यान करने वाला सब दुःखों से उबर जाता है।
  • अंतिम पद का भाव — "निज भक्तों के तुमने पूरण काज करे" — खाटू की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा यही है।
  • खाटू धाम में यह आरती प्रतिदिन पाँच बार होती है, अतः इसे नित्य पाठ में सम्मिलित करना सरल है।
  • चौथा पद भोग-परंपरा का आधार है — मोदक, खीर तथा चूरमा।

कब करें पाठ

प्रतिदिन प्रातः व संध्या पूजा मेंप्रत्येक एकादशी को — खाटू परंपरा का विशेष दिनफाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी (लक्खी मेला) परखाटू धाम के दर्शन अथवा निशान यात्रा के समय

पाठ विधि

श्याम बाबा के चित्र अथवा विग्रह के समक्ष घी या तेल की ज्योत जलाकर खड़े होकर आरती करें। आरंभ में "जय श्री श्याम" का जयकारा तीन बार कहें। "ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे" इस आरती की टेक है — प्रत्येक पद के बाद उसे दोहराने की परंपरा है; यही आरती की लय है। परंपरा में केसरिया या लाल वस्त्र, पुष्प-माला, मोरछड़ी तथा इत्र अर्पित किए जाते हैं, और भोग में चूरमा, मोदक अथवा खीर — जो चौथे पद में स्वयं गिनाए गए हैं। खाटू धाम में यह आरती दिन में पाँच बार होती है: मंगला, श्रृंगार, राज-भोग, संध्या तथा शयन। पाठ 3–4 मिनट का है; अंत में प्रसाद बाँटकर "जय श्री श्याम" के जयकारे से समापन करें। इसके साथ खाटू श्याम अष्टक, चालीसा अथवा श्याम पुष्पांजलि पढ़ने की परंपरा है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
मूल ग्रंथपारंपरिक खाटू श्याम आरती — खाटू धाम की प्रचलित वाचना
स्रोत परंपराhindunidhi.com — खाटू श्याम आरती (पूर्ण 8-पद वाचना); तथा hindunidhi.com — खाटू श्याम जी आरती (उसी पाठ का दूसरा पृष्ठ)। · ⚠️ दोनों संदर्भ एक ही प्रकाशक के हैं, अतः यह पृष्ठ दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता — और यह छिपाया नहीं गया। · ⚠️ पाठ-भेद दर्ज: एक संक्षिप्त 5-पद वाचना भी प्रचलित है (जो पहले इसी पृष्ठ पर थी) — उसमें "सिर पर चंवर ढुरे" के स्थान पर "सिर पर सुन्दर पाग" आता है, तथा एक अतिरिक्त पद होता है: *"हारे का सहारा, श्याम तुम्हारा नाम। लखदातार दयालु, पूरण करो काम।"* कोई पद चुपचाप हटाया नहीं गया — वह यहाँ दर्ज है। · ⚠️ स्रोत की दो मुद्रण-त्रुटियाँ सुधारी गईं, शब्द नहीं बदले: "सिर पार मुकुट धरे" → "सिर पर मुकुट धरे"; समापन में "बाबा जी श्री श्याम हरे" → "बाबा जय श्री श्याम हरे" (टेक की पहली पंक्ति में स्रोत स्वयं "जय" लिखता है)। · ⚠️ `deityId` सुधारा गया — पहले 'krishna' था, अब 'khatu-shyam'। खाटू श्याम बर्बरीक हैं (घटोत्कच के पुत्र, भीम के पौत्र); कृष्ण ने उन्हें अपना *नाम* दिया, पहचान नहीं। पुष्टि: खाटू श्याम अष्टक की चौपाई 5 व 12। · ⚠️ `festivalIds` सुधारा गया — पहले 'janmashtami' था, अब 'ekadashi'। जन्माष्टमी कृष्ण का पर्व है, खाटू श्याम का नहीं। · hindunidhi.com — खाटू श्याम मंदिर इतिहास; मंदिर की पाँच आरतियों (मंगला, श्रृंगार, राज-भोग, संध्या, शयन) तथा उनके समय का विवरण।
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह पृष्ठ इस सत्र में पुनः लिखा गया। पहले यहाँ केवल 5 पद थे; अब पूर्ण 8-पद वाचना दी गई है। कोई पद चुपचाप हटाया नहीं गया — पुरानी संक्षिप्त वाचना का अतिरिक्त पद *"हारे का सहारा, श्याम तुम्हारा नाम…"* तथा उसका पाठ-भेद *"सिर पर सुन्दर पाग"* (बनाम "सिर पर चंवर ढुरे") नीचे स्रोत-सूची व FAQ में दर्ज हैं। दो और सुधार हुए: `deityId` "krishna" से "khatu-shyam" किया गया, क्योंकि खाटू श्याम बर्बरीक हैं — घटोत्कच के पुत्र व भीम के पौत्र; कृष्ण ने उन्हें अपना *नाम* दिया, पहचान नहीं (पुष्टि: खाटू श्याम अष्टक की चौपाई 5 व 12)। और `festivalIds` 'janmashtami' से 'ekadashi' किया गया, क्योंकि जन्माष्टमी कृष्ण का पर्व है, खाटू श्याम का नहीं; खाटू का दिन एकादशी है (पुष्टि: श्याम पुष्पांजलि — "फाल्गुन शुक्ला द्वादशी उत्सव भारी होए")। स्रोत की दो मुद्रण-त्रुटियाँ सुधारी गईं — "सिर पार मुकुट" → "सिर पर मुकुट", तथा समापन में "बाबा जी श्री श्याम" → "बाबा जय श्री श्याम"; शब्द नहीं बदले गए।

देव परिचय

श्री खाटू श्याम

Khatu Shyam Ji (Barbarik)

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

देवता वर्गशरणागत रक्षा · त्याग व बलिदान · मनोकामना पूर्ति · हारे का सहारा
वाहननीला घोड़ा
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