श्री राधा चालीसा

śrī rādhā cālīsā

Radha Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नित्य; राधाष्टमी व जन्माष्टमी
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: पारंपरिक राधा चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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श्री राधे वृषभानुजा, भक्तन प्राण अधार। वृन्दावन की रासमयी, करूँ चरण में प्यार॥

वृषभानु-पुत्री श्री राधे भक्तों के प्राणों की आधार हैं; वृन्दावन की रासमयी देवी के चरणों में मैं प्रेम अर्पित करता हूँ।

जय जय राधे बरसाने वाली। श्याम-प्रिया तुम कृष्ण-दुलारी॥

हे बरसाने वाली राधे, आपकी जय हो; आप श्याम (कृष्ण) की प्रिया व दुलारी हैं।

वृषभानु-कीरति की प्यारी। गौर-वरण तन छवि अति न्यारी॥

आप वृषभानु व कीर्ति की प्यारी पुत्री हैं; गौर वर्ण तन की छवि अति अनुपम है।

नैन कमल-दल जैसे सोहैं। रूप निरख त्रिभुवन मन मोहैं॥

नेत्र कमल की पंखुड़ियों जैसे सुशोभित हैं; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।

श्याम-संग जुगल छवि राजै। वृन्दावन में रास सजावै॥

श्याम के संग युगल छवि सुशोभित है; वृन्दावन में आप रास सजाती हैं।

कृष्ण-हृदय में तुम्हीं समाई। प्रेम-भक्ति की मूल बताई॥

कृष्ण के हृदय में आप ही समाई हैं; आप प्रेम-भक्ति की मूल (स्रोत) कही जाती हैं।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। प्रेम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का रस पाता है।

राधे-कृष्ण नाम जो जपते। भव-बंधन से वे सब छुटते॥

जो राधे-कृष्ण नाम जपते हैं, वे सब भव-बंधन से छूट जाते हैं।

कोटि-कोटि भक्त तुम्हें ध्यावैं। ब्रज की गलियाँ धन्य बनावैं॥

करोड़ों भक्त आपका ध्यान करते हैं और ब्रज की गलियों को धन्य बनाते हैं।

गोपी-जन तुम संग रास रचावैं। मुरली-धुन सुन सब मन भावैं॥

गोपीजन आपके संग रास रचाती हैं; मुरली की धुन सुनकर सबका मन प्रसन्न होता है।

राधाष्टमी पर पूजन कीजै। मन-वांछित वर माँ से लीजै॥

राधाष्टमी पर पूजन कीजिए और राधा रानी से मन-वांछित वर प्राप्त कीजिए।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

प्रेम-सम्बन्ध में मेल कराती। रूठे को तुम पास बुलाती॥

आप प्रेम-सम्बन्धों में मेल कराती हैं और रूठे हुए (जनों) को पास बुला लेती हैं।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। प्रेम-भक्ति सुख सहज वह पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का सुख पाता है।

राधा-कुण्ड में स्नान जो करते। कृष्ण-प्रेम वे सहज ही भरते॥

जो राधा-कुण्ड में स्नान करते हैं, वे सहज ही कृष्ण-प्रेम से भर जाते हैं।

श्याम-वल्लभा नाम तुम्हारा। ब्रज-मण्डल में अति प्यारा॥

श्याम-वल्लभा आपका नाम है, जो ब्रज-मण्डल में अति प्यारा है।

मधुर भाव से जो तुम्हें गावै। ता पर श्याम-कृपा बरसावै॥

जो मधुर भाव से आपके गुण गाता है, उस पर श्याम (कृष्ण) की कृपा बरसती है।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। राधा-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही राधा-कृपा प्राप्त करता है।

तुलसी-माखन भोग लगावैं। श्रद्धा से जन तुम्हें मनावैं॥

भक्त तुलसी व माखन का भोग लगाते हैं और श्रद्धा से आपको मनाते हैं।

ता पर माँ प्रसन्न हो जावैं। प्रेम-भक्ति का रस बरसावैं॥

उस पर राधा रानी प्रसन्न हो जाती हैं और प्रेम-भक्ति का रस बरसाती हैं।

मंगल-कारी तुम सुखदाई। भक्तन की तुम सदा सहाई॥

आप मंगलकारी व सुख देने वाली हैं; आप सदा भक्तों की सहायक हैं।

जो श्रद्धा से सेवा करते। प्रेम-रस से वे मन भरते॥

जो श्रद्धा से सेवा करते हैं, वे प्रेम-रस से मन भर लेते हैं।

जो यह राधा चालीसा गावै। प्रेम-भक्ति रस सहज वह पावै॥

जो यह राधा चालीसा गाता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का रस पाता है।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा राधा की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर राधा रानी की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-शान्ति घर में लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।

राधा-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर राधा रानी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

दाम्पत्य-सुख तुम्हीं से आवै। प्रेम-सौहार्द घर में लावै॥

दाम्पत्य-सुख आप ही से आता है; आप घर में प्रेम व सौहार्द लाती हैं।

जन्माष्टमी पर तुम्हें मनावैं। श्याम-संग झूला झुलावैं॥

जन्माष्टमी पर भक्त आपको मनाते हैं और श्याम-संग आपको झूला झुलाते हैं।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत राधा देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर राधा रानी तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

जो मन-वचन-कर्म से ध्यावै। श्याम-संग नित रास रचावै॥

जो मन, वचन व कर्म से आपका ध्यान करता है, वह नित्य श्याम-संग के रास का आनन्द पाता है।

भक्ति-भाव जो जन अपनावै। प्रेम-रस में वह डूब जावै॥

जो जन भक्ति-भाव अपनाता है, वह प्रेम-रस में डूब जाता है।

राधा-नाम जो जन गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन राधा-नाम गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

राधे-राधे जो जन गावै। श्याम-कृपा सहज वह पावै॥

जो जन "राधे-राधे" गाता है, वह सहज ही श्याम (कृष्ण) की कृपा पाता है।

राधा-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन राधा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

प्रेम-भक्ति रस घर में आवै। सुख-सौहार्द-संतोष बढ़ावै॥

घर में प्रेम-भक्ति का रस आता है और सुख, सौहार्द व संतोष बढ़ता है।

भय-संकट सब दूर हटावै। राधा-नाम जो जन ध्यावै॥

जो जन राधा-नाम का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।

जय जय जय श्री राधे प्यारी। श्याम-संग तुम जग-हितकारी॥

हे प्यारी श्री राधे, आपकी जय हो; श्याम-संग आप जगत का हित करने वाली हैं।

राधा चालीसा जो पढ़े, प्रेम सहित मन लाय। प्रेम-भक्ति रस पाइके, श्याम-कृपा बरसाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर राधा चालीसा पढ़ता है, वह प्रेम-भक्ति का रस पाकर श्याम (कृष्ण) की कृपा प्राप्त करता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. वृषभानु-पुत्री श्री राधे भक्तों के प्राणों की आधार हैं; वृन्दावन की रासमयी देवी के चरणों में मैं प्रेम अर्पित करता हूँ।
  2. हे बरसाने वाली राधे, आपकी जय हो; आप श्याम (कृष्ण) की प्रिया व दुलारी हैं।
  3. आप वृषभानु व कीर्ति की प्यारी पुत्री हैं; गौर वर्ण तन की छवि अति अनुपम है।
  4. नेत्र कमल की पंखुड़ियों जैसे सुशोभित हैं; आपका रूप निरखकर तीनों लोक मोहित हो जाते हैं।
  5. श्याम के संग युगल छवि सुशोभित है; वृन्दावन में आप रास सजाती हैं।
  6. कृष्ण के हृदय में आप ही समाई हैं; आप प्रेम-भक्ति की मूल (स्रोत) कही जाती हैं।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का रस पाता है।
  8. जो राधे-कृष्ण नाम जपते हैं, वे सब भव-बंधन से छूट जाते हैं।
  9. करोड़ों भक्त आपका ध्यान करते हैं और ब्रज की गलियों को धन्य बनाते हैं।
  10. गोपीजन आपके संग रास रचाती हैं; मुरली की धुन सुनकर सबका मन प्रसन्न होता है।
  11. राधाष्टमी पर पूजन कीजिए और राधा रानी से मन-वांछित वर प्राप्त कीजिए।
  12. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  13. आप प्रेम-सम्बन्धों में मेल कराती हैं और रूठे हुए (जनों) को पास बुला लेती हैं।
  14. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  15. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का सुख पाता है।
  16. जो राधा-कुण्ड में स्नान करते हैं, वे सहज ही कृष्ण-प्रेम से भर जाते हैं।
  17. श्याम-वल्लभा आपका नाम है, जो ब्रज-मण्डल में अति प्यारा है।
  18. जो मधुर भाव से आपके गुण गाता है, उस पर श्याम (कृष्ण) की कृपा बरसती है।
  19. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही राधा-कृपा प्राप्त करता है।
  20. भक्त तुलसी व माखन का भोग लगाते हैं और श्रद्धा से आपको मनाते हैं।
  21. उस पर राधा रानी प्रसन्न हो जाती हैं और प्रेम-भक्ति का रस बरसाती हैं।
  22. आप मंगलकारी व सुख देने वाली हैं; आप सदा भक्तों की सहायक हैं।
  23. जो श्रद्धा से सेवा करते हैं, वे प्रेम-रस से मन भर लेते हैं।
  24. जो यह राधा चालीसा गाता है, वह सहज ही प्रेम-भक्ति का रस पाता है।
  25. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर राधा रानी की कृपा होती है।
  26. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  27. जिन पर राधा रानी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  28. दाम्पत्य-सुख आप ही से आता है; आप घर में प्रेम व सौहार्द लाती हैं।
  29. जन्माष्टमी पर भक्त आपको मनाते हैं और श्याम-संग आपको झूला झुलाते हैं।
  30. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर राधा रानी तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  31. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  32. जो मन, वचन व कर्म से आपका ध्यान करता है, वह नित्य श्याम-संग के रास का आनन्द पाता है।
  33. जो जन भक्ति-भाव अपनाता है, वह प्रेम-रस में डूब जाता है।
  34. जो जन राधा-नाम गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  35. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  36. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  37. जो जन "राधे-राधे" गाता है, वह सहज ही श्याम (कृष्ण) की कृपा पाता है।
  38. जो जन राधा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  39. घर में प्रेम-भक्ति का रस आता है और सुख, सौहार्द व संतोष बढ़ता है।
  40. जो जन राधा-नाम का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  41. हे प्यारी श्री राधे, आपकी जय हो; श्याम-संग आप जगत का हित करने वाली हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर राधा चालीसा पढ़ता है, वह प्रेम-भक्ति का रस पाकर श्याम (कृष्ण) की कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • प्रेम, भक्ति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • दाम्पत्य व सम्बन्धों में प्रेम व सौहार्द आता है।
  • श्रीकृष्ण की कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  • मन शांत होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कब करें पाठ

नित्य संध्या मेंराधाष्टमी व जन्माष्टमी परएकादशी व गुरुवार को

पाठ विधि

राधा-कृष्ण के समक्ष तुलसी, पुष्प व माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें, "राधे राधे" का स्मरण करते हुए दीप जलाकर चालीसा का पाठ करें और तत्पश्चात प्रसाद वितरण करें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक राधा चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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श्री राधा चालीसा — सामान्य प्रश्न

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