श्री जगन्नाथ चालीसा

śrī jagannātha cālīsā

Jagannath Chalisa (Puri)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
रथ यात्रा; एकादशी व गुरुवार
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)संकट-निवारण (Relief)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री जगन्नाथ चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। चौपाइयाँ "जय जगन्नाथ जगत के पालक, भव भय भंजन कष्ट निवारक" से शुरू होती हैं। इसकी आधी से अधिक चौपाइयाँ स्तुति नहीं, भक्तों की कथाएँ हैं — दासिया बाउरी, बंधु महंती, सालबेग, जयदेव, कर्माबाई, शंकरदेव, गुरु नानक और कबीर तक।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: प्रचलित हिन्दी जगन्नाथ चालीसा; पुरी परंपरा

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री जगन्नाथ चालीसा
IASTśrī jagannātha cālīsā
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतप्रचलित हिन्दी जगन्नाथ चालीसा; पुरी परंपरा
शुभ दिनरथ यात्रा; एकादशी व गुरुवार
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक बात बार-बार कहती है, और उसे सिद्ध भी करती है — जगन्नाथ के दरबार में जाति और मज़हब का कोई मोल नहीं। चौपाई 34 में वह वाक्य आता है — "जात पात का भेद न कोई" — पर उससे पहले की बीस चौपाइयाँ पहले ही उसे कथाओं से साबित कर चुकी होती हैं।

दासिया बाउरी (चौपाई 14–18) — एक निम्न जाति का भक्त, जिसने साग-भात में ही प्रभु का रूप देख लिया। उसने अपने बगीचे का नारियल एक ब्राह्मण के हाथ भेजा, और मंदिर में प्रभु ने स्वयं बाँहें बढ़ाकर उसे ले लिया।

बंधु महंती (19–23) — परिवार सहित पुरी पहुँचा तो रात हो चुकी थी, सिंहद्वार बंद था, और वह भूखा ही सो गया। "भगत का कष्ट ना सह पाये भगवन, स्वर्ण थाल में लाये भोजन।"

सालबेग (24–27) — चालीसा उन्हें "साल वेग पूत मुगल पिता का" कहती है। रथ यात्रा में वे सैकड़ों कोस दूर थे और पहुँच न सके; उनकी गुहार पर रथ वहीं रुक गया।

जयदेव (28–31) — "गीत गोविंद" लिखते-लिखते कवि एक पंक्ति पर अटक गए और स्नान करने चले गए; प्रभु ने कवि का ही रूप धरकर वह गीत पूरा कर दिया।

कर्माबाई (33) — "बिना मोल के प्यार से बिकता, कर्मा बाई की खिचड़ी खाता।"

और अंत में तीन नाम जो एक साथ शायद ही कहीं आते हों — शंकरदेव (असम के निराकार-उपासक संत, जो जगन्नाथ को देखकर उन्हीं के स्थापक बन गए), गुरु नानक और कबीर (35–36)।

एक और पंक्ति ध्यान खींचती है — "हाथ पैर नहीं है प्रभु तेरा, फिर भी सभी को तेरा ही आसरा" (11)। जगन्नाथ की मूर्ति का अपूर्ण स्वरूप यहाँ कमी नहीं, महिमा है।

अंतिम चौपाई में रचयिता की छाप है — "अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो।"

संपूर्ण चालीसा

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श्री जगन्नाथ जगत गुरू, आस भगत के आप। नाम लेते ही आपका, मिटे कष्ट संताप॥

हे श्री जगन्नाथ, आप जगत के गुरु हैं और भक्तों की एकमात्र आस हैं। आपका नाम लेते ही कष्ट और संताप मिट जाते हैं।

मैं अधम हूँ मूढ़ मति, पूजा विधि का ना ज्ञान। दोष मेरा ना धरना नाथ, मैं हूँ तेरी संतान॥

मैं अधम हूँ, मूढ़ बुद्धि वाला हूँ, मुझे पूजा की विधि का ज्ञान नहीं। हे नाथ, मेरा दोष मत पकड़ना — मैं तो आपकी ही संतान हूँ।

जय जगन्नाथ जगत के पालक। भव भय भंजन कष्ट निवारक॥

हे जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप जगत के पालनकर्ता हैं, भव के भय को तोड़ने वाले और कष्ट का निवारण करने वाले हैं।

संगी साथी ना जिसका कोई। आसरा उसका बस एक तू ही॥

जिसका कोई संगी-साथी नहीं, उसका सहारा बस आप ही हैं।

भगतों के दुख दूर करे तू। संतों के सदा मन में बसे तू॥

आप भक्तों के दुख दूर करते हैं और संतों के मन में सदा बसे रहते हैं।

पतित पावन नाम तिहारा। सारे जग में तू इक प्यारा॥

आपका नाम पतितों को पावन करने वाला है; सारे जगत में आप ही एक प्यारे हैं।

शंख क्षेत्र में धाम है तेरा। पीड़ हरे है नाम तिहारा॥

शंख क्षेत्र (पुरी) में आपका धाम है; आपका नाम ही पीड़ा हर लेता है।

सागर तट में नीलगिरी पर। तूने बसा लिया अपना घर॥

सागर के तट पर, नीलगिरि पर, आपने अपना घर बसा लिया।

जो तेरे रूप को मन में बसाये। चिन्ता जग की ना उसे सताये॥

जो आपके रूप को मन में बसा लेता है, उसे जगत की चिंता नहीं सताती।

तेरी शरण में जो भी आये। विपदा से तू उसे बचाये॥

जो भी आपकी शरण में आता है, आप उसे विपदा से बचा लेते हैं।

धाम तेरा हर धाम से न्यारा। जिसके बिना है तीर्थ अधूरा॥

आपका धाम हर धाम से निराला है; उसके बिना तीर्थ-यात्रा अधूरी है।

ना हो जब तक तेरे दर्शन। निष्फल जीवन और तीर्थाटन॥

जब तक आपके दर्शन न हों, जीवन और तीर्थाटन दोनों निष्फल हैं।

हाथ पैर नहीं है प्रभु तेरा। फिर भी सभी को तेरा ही आसरा॥

हे प्रभु, आपके हाथ-पैर नहीं हैं — फिर भी सबको आपका ही सहारा है।

नाथ जगत का तू कहलाता। हर कोई तेरी महिमा गाता॥

आप जगत के नाथ कहलाते हैं; हर कोई आपकी महिमा गाता है।

भगतों को तू सदा लुभाता। महिमा अपनी उनसे गवाता॥

आप भक्तों को सदा लुभाते हैं और अपनी महिमा उन्हीं से गवाते हैं।

दासी या भगत था एक अनोखा। रूप तेरा साग भात में देखा॥

दासिया बाउरी नाम का एक अनोखा भक्त था, जिसने साग-भात में ही आपका रूप देख लिया।

अपने बगीचे से श्रीफल तोड़ा। दे ब्राह्मण को हाथ वो जोड़ा॥

उसने अपने बगीचे से एक श्रीफल (नारियल) तोड़ा और हाथ जोड़कर एक ब्राह्मण को दे दिया।

जा रहे प्रभु का करने दर्शन। श्रीफल ये कर देना अर्पण॥

प्रभु के दर्शन को जा रहे उस ब्राह्मण से कहा — यह श्रीफल प्रभु को अर्पण कर देना।

अनहोनी ऐसी हुई भाई। प्रभु ने बाँहें अपनी बढ़ाई॥

फिर भाई, ऐसी अनहोनी हुई कि प्रभु ने स्वयं अपनी बाँहें बढ़ा दीं।

हाथ से विप्र के ले नारियल। दासिया को दिया भक्ति का फल॥

ब्राह्मण के हाथ से नारियल लेकर उन्होंने दासिया को उसकी भक्ति का फल दे दिया।

बंधु महंती की भक्ति कहें क्या। प्रभु को मित्र सा प्यारा वो था॥

बंधु महंती की भक्ति का क्या कहना — प्रभु को वह मित्र के समान प्यारा था।

दर्श की आस तेरे ले मन में। आया तेरे पुनीत नगर में॥

मन में आपके दर्शन की आस लेकर वह आपके पुनीत नगर (पुरी) आया।

संग में लाया कुटुंब था अपना। पहुँचा तुझ तक जब हुई रैना॥

अपना पूरा कुटुंब साथ लाया था; आप तक पहुँचा तो रात हो चुकी थी।

सिंह द्वार मंदिर का बंद था। भूखे पेट बंधु सोया था॥

मंदिर का सिंहद्वार बंद हो चुका था, और बंधु भूखे पेट ही सो गया।

भगत का कष्ट ना सह पाये भगवन। स्वर्ण थाल में लाये भोजन॥

भक्त का कष्ट भगवान सह न सके — वे स्वयं स्वर्ण-थाल में भोजन ले आए।

साल वेग पूत मुगल पिता का। नाम तेरा हर पल लेता था॥

सालबेग, जो मुगल पिता का पुत्र था, हर पल आपका ही नाम लेता था।

रथ यात्रा में आ पाये न पुरी। सैकड़ों कोस की थी जो दूरी॥

रथ यात्रा में वह पुरी नहीं पहुँच पाया — सैकड़ों कोस की दूरी जो थी।

गुहार लगाई जगन्नाथ को। आऊँ न जब तक रोकना रथ को॥

उसने जगन्नाथ से गुहार लगाई — जब तक मैं न आऊँ, रथ को रोके रखना।

सारा जग तब चकित हुआ था। भक्त की इच्छा जब पूर्ण हुई थी॥

सारा जगत तब चकित रह गया, जब उस भक्त की इच्छा पूरी हुई (रथ वहीं रुक गया)।

डूबे जय देव भक्ति में तेरे। गीत गोविंद रचा नाम में तेरे॥

कवि जयदेव आपकी भक्ति में डूबे और आपके ही नाम पर "गीत गोविंद" की रचना की।

लिखते लिखते कवि ठहर गये। रचना पूर्ण कौन कर पाये॥

लिखते-लिखते कवि एक जगह ठहर गए — वह रचना अब कौन पूरी करे?

पत्नी से कहा स्नान कर आऊँ। आकर फिर से बुद्धि लगाऊँ॥

उन्होंने पत्नी से कहा — मैं स्नान कर आऊँ, फिर लौटकर बुद्धि लगाऊँगा।

रूप कवि का धरा प्रभु ने। गीत अधूरा किया पूर्ण प्रभु ने॥

तब प्रभु ने स्वयं कवि का रूप धरा और अधूरा गीत पूरा कर दिया।

प्रेम से भक्त के प्रभु बंधे हैं। भक्ति प्रीति के डोर से जुड़े हैं॥

प्रभु अपने भक्त के प्रेम से बँधे हुए हैं; वे भक्ति और प्रीति की डोर से जुड़े हैं।

बिना मोल के प्यार से बिकता। कर्मा बाई की खिचड़ी खाता॥

वे बिना मोल के, केवल प्यार से बिक जाते हैं — कर्माबाई की खिचड़ी वे इसी भाव से खाते रहे।

जात पात का भेद न कोई। जो तुझे देखा सुध बिसराई॥

आपके यहाँ जात-पात का कोई भेद नहीं; जिसने आपको देख लिया, उसने अपनी सुध ही खो दी।

शंकर देव निराकार उपासक। देख तुझे बने तेरे स्थापक॥

शंकरदेव निराकार के उपासक थे; आपको देखकर वे ही आपके स्थापक बन गए।

श्री गुरुनानक संत कबीरा। हर कोई तुझको एक सा प्यारा॥

श्री गुरु नानक हों या संत कबीर — हर कोई आपको एक-सा प्यारा है।

तुम सा प्रभु कोई और कहाँ है। भक्त जहाँ है तू भी वहाँ है॥

आप जैसा प्रभु और कहाँ है — जहाँ भक्त है, वहाँ आप भी हैं।

भक्तों के मन को हरषाने। रथ पर आता दर्शन देने॥

भक्तों के मन को हर्षाने के लिए आप रथ पर आकर दर्शन देते हैं।

पाकर प्यारे प्रभु का दर्शन। कर लो धन्य सभी यह जीवन॥

प्यारे प्रभु का दर्शन पाकर सब अपना यह जीवन धन्य कर लो।

जय जगन्नाथ प्रेम से बोलो। अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो॥

प्रेम से बोलो — जय जगन्नाथ! कुंदन कहता है, नाम का यह अमृत पी लो।

कृष्ण बलराम दोनों ओर, बीच सुभद्रा बहन। नीलांचल वासी जगन्नाथ, सदा बसो मोरे मन॥

एक ओर कृष्ण (जगन्नाथ), दूसरी ओर बलराम, और बीच में बहन सुभद्रा। हे नीलांचल-वासी जगन्नाथ, आप सदा मेरे मन में बसे रहें।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे श्री जगन्नाथ, आप जगत के गुरु हैं और भक्तों की एकमात्र आस हैं। आपका नाम लेते ही कष्ट और संताप मिट जाते हैं।
  2. मैं अधम हूँ, मूढ़ बुद्धि वाला हूँ, मुझे पूजा की विधि का ज्ञान नहीं। हे नाथ, मेरा दोष मत पकड़ना — मैं तो आपकी ही संतान हूँ।
  3. हे जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप जगत के पालनकर्ता हैं, भव के भय को तोड़ने वाले और कष्ट का निवारण करने वाले हैं।
  4. जिसका कोई संगी-साथी नहीं, उसका सहारा बस आप ही हैं।
  5. आप भक्तों के दुख दूर करते हैं और संतों के मन में सदा बसे रहते हैं।
  6. आपका नाम पतितों को पावन करने वाला है; सारे जगत में आप ही एक प्यारे हैं।
  7. शंख क्षेत्र (पुरी) में आपका धाम है; आपका नाम ही पीड़ा हर लेता है।
  8. सागर के तट पर, नीलगिरि पर, आपने अपना घर बसा लिया।
  9. जो आपके रूप को मन में बसा लेता है, उसे जगत की चिंता नहीं सताती।
  10. जो भी आपकी शरण में आता है, आप उसे विपदा से बचा लेते हैं।
  11. आपका धाम हर धाम से निराला है; उसके बिना तीर्थ-यात्रा अधूरी है।
  12. जब तक आपके दर्शन न हों, जीवन और तीर्थाटन दोनों निष्फल हैं।
  13. हे प्रभु, आपके हाथ-पैर नहीं हैं — फिर भी सबको आपका ही सहारा है।
  14. आप जगत के नाथ कहलाते हैं; हर कोई आपकी महिमा गाता है।
  15. आप भक्तों को सदा लुभाते हैं और अपनी महिमा उन्हीं से गवाते हैं।
  16. दासिया बाउरी नाम का एक अनोखा भक्त था, जिसने साग-भात में ही आपका रूप देख लिया।
  17. उसने अपने बगीचे से एक श्रीफल (नारियल) तोड़ा और हाथ जोड़कर एक ब्राह्मण को दे दिया।
  18. प्रभु के दर्शन को जा रहे उस ब्राह्मण से कहा — यह श्रीफल प्रभु को अर्पण कर देना।
  19. फिर भाई, ऐसी अनहोनी हुई कि प्रभु ने स्वयं अपनी बाँहें बढ़ा दीं।
  20. ब्राह्मण के हाथ से नारियल लेकर उन्होंने दासिया को उसकी भक्ति का फल दे दिया।
  21. बंधु महंती की भक्ति का क्या कहना — प्रभु को वह मित्र के समान प्यारा था।
  22. मन में आपके दर्शन की आस लेकर वह आपके पुनीत नगर (पुरी) आया।
  23. अपना पूरा कुटुंब साथ लाया था; आप तक पहुँचा तो रात हो चुकी थी।
  24. मंदिर का सिंहद्वार बंद हो चुका था, और बंधु भूखे पेट ही सो गया।
  25. भक्त का कष्ट भगवान सह न सके — वे स्वयं स्वर्ण-थाल में भोजन ले आए।
  26. सालबेग, जो मुगल पिता का पुत्र था, हर पल आपका ही नाम लेता था।
  27. रथ यात्रा में वह पुरी नहीं पहुँच पाया — सैकड़ों कोस की दूरी जो थी।
  28. उसने जगन्नाथ से गुहार लगाई — जब तक मैं न आऊँ, रथ को रोके रखना।
  29. सारा जगत तब चकित रह गया, जब उस भक्त की इच्छा पूरी हुई (रथ वहीं रुक गया)।
  30. कवि जयदेव आपकी भक्ति में डूबे और आपके ही नाम पर "गीत गोविंद" की रचना की।
  31. लिखते-लिखते कवि एक जगह ठहर गए — वह रचना अब कौन पूरी करे?
  32. उन्होंने पत्नी से कहा — मैं स्नान कर आऊँ, फिर लौटकर बुद्धि लगाऊँगा।
  33. तब प्रभु ने स्वयं कवि का रूप धरा और अधूरा गीत पूरा कर दिया।
  34. प्रभु अपने भक्त के प्रेम से बँधे हुए हैं; वे भक्ति और प्रीति की डोर से जुड़े हैं।
  35. वे बिना मोल के, केवल प्यार से बिक जाते हैं — कर्माबाई की खिचड़ी वे इसी भाव से खाते रहे।
  36. आपके यहाँ जात-पात का कोई भेद नहीं; जिसने आपको देख लिया, उसने अपनी सुध ही खो दी।
  37. शंकरदेव निराकार के उपासक थे; आपको देखकर वे ही आपके स्थापक बन गए।
  38. श्री गुरु नानक हों या संत कबीर — हर कोई आपको एक-सा प्यारा है।
  39. आप जैसा प्रभु और कहाँ है — जहाँ भक्त है, वहाँ आप भी हैं।
  40. भक्तों के मन को हर्षाने के लिए आप रथ पर आकर दर्शन देते हैं।
  41. प्यारे प्रभु का दर्शन पाकर सब अपना यह जीवन धन्य कर लो।
  42. प्रेम से बोलो — जय जगन्नाथ! कुंदन कहता है, नाम का यह अमृत पी लो।
  43. एक ओर कृष्ण (जगन्नाथ), दूसरी ओर बलराम, और बीच में बहन सुभद्रा। हे नीलांचल-वासी जगन्नाथ, आप सदा मेरे मन में बसे रहें।

लाभ

  • आधी से अधिक चौपाइयाँ भक्तों की कथाएँ हैं — दासिया बाउरी, बंधु महंती, सालबेग, जयदेव, कर्माबाई।
  • रथ यात्रा के दिनों का प्रमुख पाठ; एकादशी और गुरुवार को भी पढ़ा जाता है।
  • चौपाई 34–36 जाति और मज़हब के भेद को सीधे नकारती हैं।
  • पाठ छोटा है — 40 चौपाइयाँ, लगभग 8–10 मिनट।

कब करें पाठ

रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) परआषाढ़ मास भरएकादशी कोगुरुवार व नित्य संध्या में

पाठ विधि

भगवान जगन्नाथ के चित्र या विग्रह के समक्ष दीप जलाएँ; तुलसी-दल, पीले पुष्प और भोग अर्पित करें। पुरी की परंपरा में भोग का विशेष महत्व है — खिचड़ी, खीर या जो भी सहज हो, प्रेम से अर्पित करें (चालीसा स्वयं कर्माबाई की खिचड़ी का उदाहरण देती है)। "जय जगन्नाथ" का तीन बार स्मरण कर पहले दोनों दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा पढ़ें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराaartibhajanchalisa.in — श्री जगन्नाथ जी की चालीसा (आधार-पाठ) · hindi.oneindia.com — जगन्नाथ चालीसा (दो लेख; पाठ आधार से शब्दशः एक) · gugel.in — श्री जगन्नाथ चालीसा (दूसरी परंपरा) · रचयिता की छाप — चौपाई 40 "अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो" · ⚠️ hindunidhi.com और revivingcultures.com के जगन्नाथ-चालीसा पृष्ठ इस पाठ के नहीं हैं; वे नहीं लिए गए।
रचयिताअज्ञात (छाप: कुंदन — चौपाई 40)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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श्री जगन्नाथ चालीसा — सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ