श्री जगन्नाथ चालीसा
śrī jagannātha cālīsā
Jagannath Chalisa (Puri)
परिचय
श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।
स्रोत: पारंपरिक जगन्नाथ चालीसा (पुरी)
संपूर्ण चालीसा
गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। श्री जगन्नाथ-पुरी-पति, वंदना करूँ महान॥
गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं पुरी-पति श्री जगन्नाथ की महान वंदना करता हूँ।
जय जय जगदीश जगन्नाथा। बलभद्र-सुभद्रा संग साथा॥
हे जगदीश जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के संग साथ विराजते हैं।
नील-माधव रूप मनोहर। बड़े नैन छवि अति सुन्दर॥
नील-माधव का मनोहर रूप; बड़े-बड़े नेत्रों वाली आपकी छवि अति सुन्दर है।
दारु-विग्रह अद्भुत न्यारा। पुरी-धाम में बसे प्यारा॥
दारु (काष्ठ) की अद्भुत व अनोखी मूर्ति; आप प्यारे पुरी-धाम में बसते हैं।
विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा। जगत-नाथ तुम जग-आधारा॥
आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; आप जगत के नाथ व जगत के आधार हैं।
चार-धाम में पुरी कहाई। तुम्हरी महिमा जग में छाई॥
चार धामों में पुरी गिनी जाती है; आपकी महिमा जगत में छाई है।
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
रथ पर होकर नगर भ्रमते। भक्तन को दरस सुख देते॥
रथ पर सवार होकर आप नगर भ्रमण करते हैं और भक्तों को दर्शन का सुख देते हैं।
रथ यात्रा जग-विख्याता। लाखों भक्त खींचें रथ माता॥
आपकी रथ यात्रा जगत-विख्यात है; लाखों भक्त (आप व सुभद्रा माता का) रथ खींचते हैं।
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
महाप्रसाद की महिमा भारी। पावन भोग जग-हितकारी॥
आपके महाप्रसाद की महिमा अति महान है; यह पावन भोग जगत का हित करने वाला है।
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥
आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
जो जन तुमको शीश नवावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
जात-पाँत का भेद न माना। सब भक्तन को एक सम जाना॥
आप जात-पाँत का भेद नहीं मानते और सब भक्तों को समान जानते हैं।
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। जगन्नाथ-कृपा सहज वह पावै॥
जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही जगन्नाथ-कृपा प्राप्त करता है।
मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥
आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
स्नान-यात्रा पर ज्वर तुम पाते। फिर नवयौवन रूप दिखाते॥
स्नान-यात्रा पर (परंपरानुसार) आप ज्वर-ग्रस्त होते हैं, फिर नवयौवन रूप में दर्शन देते हैं।
जो यह जगन्नाथ चालीसा गावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
जो यह जगन्नाथ चालीसा गाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा जगन्नाथ की होई॥
जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर जगन्नाथ की कृपा होती है।
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। भक्ति-सुख-शान्ति घर लावैं॥
सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में भक्ति, सुख व शांति लाते हैं।
जगन्नाथ-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
जिन पर जगन्नाथ की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
रथ यात्रा में जो जन धावै। जन्म-जन्म के पाप नसावै॥
जो जन रथ यात्रा में सम्मिलित होता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत जगन्नाथ देवा॥
जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर जगन्नाथ देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
भक्त-वत्सल तुम कहलाते। प्रेम-भक्ति से रीझ जाते॥
आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और प्रेम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
समता-प्रेम का मार्ग दिखाते। भक्ति-करुणा जग को भाते॥
आप समता व प्रेम का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व करुणा जगत को भाते हैं।
दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
जगन्नाथ-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥
जो जन जगन्नाथ-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
पुरी-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥
पुरी-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
करुणा-प्रेम का दान दिखाते। भक्ति-समता जग को सिखलाते॥
आप करुणा व प्रेम का दान देते हैं और जगत को भक्ति व समता सिखलाते हैं।
जो जन जगन्नाथ गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
जो जन जगन्नाथ के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
जगन्नाथ-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
जो जन जगन्नाथ-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
भक्ति-सुख-शान्ति घर में आवै। प्रेम-करुणा-संतोष बढ़ावै॥
घर में भक्ति, सुख व शांति आती है और प्रेम, करुणा व संतोष बढ़ता है।
भय-संकट सब दूर हटावै। जगन्नाथ जो जन नित ध्यावै॥
जो जन जगन्नाथ का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। जगन्नाथ-नाम जो जन गावै॥
जो जन जगन्नाथ-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै। प्रेम-करुणा सब बढ़ावै॥
घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व करुणा बढ़ती है।
सब भक्तन को सम तुम जानो। भेद नहीं कोई तुम मानो॥
आप सब भक्तों को समान जानते हैं और किसी में कोई भेद नहीं मानते।
जय जय जय जगन्नाथ कृपाला। बलभद्र-सुभद्रा संग दयाला॥
हे कृपालु जगन्नाथ, आपकी जय हो; बलभद्र व सुभद्रा के संग आप दयालु हैं।
जगन्नाथ चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भक्ति-मुक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥
जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल जगन्नाथ चालीसा पढ़ता है, उसे भक्ति, मुक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
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अर्थ (हिन्दी)
- गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं पुरी-पति श्री जगन्नाथ की महान वंदना करता हूँ।
- हे जगदीश जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के संग साथ विराजते हैं।
- नील-माधव का मनोहर रूप; बड़े-बड़े नेत्रों वाली आपकी छवि अति सुन्दर है।
- दारु (काष्ठ) की अद्भुत व अनोखी मूर्ति; आप प्यारे पुरी-धाम में बसते हैं।
- आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; आप जगत के नाथ व जगत के आधार हैं।
- चार धामों में पुरी गिनी जाती है; आपकी महिमा जगत में छाई है।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- रथ पर सवार होकर आप नगर भ्रमण करते हैं और भक्तों को दर्शन का सुख देते हैं।
- आपकी रथ यात्रा जगत-विख्यात है; लाखों भक्त (आप व सुभद्रा माता का) रथ खींचते हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- आपके महाप्रसाद की महिमा अति महान है; यह पावन भोग जगत का हित करने वाला है।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- आप जात-पाँत का भेद नहीं मानते और सब भक्तों को समान जानते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही जगन्नाथ-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
- जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- स्नान-यात्रा पर (परंपरानुसार) आप ज्वर-ग्रस्त होते हैं, फिर नवयौवन रूप में दर्शन देते हैं।
- जो यह जगन्नाथ चालीसा गाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर जगन्नाथ की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में भक्ति, सुख व शांति लाते हैं।
- जिन पर जगन्नाथ की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- जो जन रथ यात्रा में सम्मिलित होता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर जगन्नाथ देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
- आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और प्रेम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- आप समता व प्रेम का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व करुणा जगत को भाते हैं।
- जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
- जो जन जगन्नाथ-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
- पुरी-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
- आप करुणा व प्रेम का दान देते हैं और जगत को भक्ति व समता सिखलाते हैं।
- जो जन जगन्नाथ के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन जगन्नाथ-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में भक्ति, सुख व शांति आती है और प्रेम, करुणा व संतोष बढ़ता है।
- जो जन जगन्नाथ का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- जो जन जगन्नाथ-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
- घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व करुणा बढ़ती है।
- आप सब भक्तों को समान जानते हैं और किसी में कोई भेद नहीं मानते।
- हे कृपालु जगन्नाथ, आपकी जय हो; बलभद्र व सुभद्रा के संग आप दयालु हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल जगन्नाथ चालीसा पढ़ता है, उसे भक्ति, मुक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
लाभ
- भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
- भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
- मनोकामना पूर्ण होकर मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है।
- मन में समता, प्रेम व करुणा का संचार होता है।
कब करें पाठ
पाठ विधि
भगवान जगन्नाथ के समक्ष तुलसी, पुष्प व भोग अर्पित करें, दीप जलाकर "जय जगन्नाथ" का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। रथ यात्रा पर इसका विशेष महत्व है।
प्रामाणिकता व स्रोत
देव परिचय
श्री कृष्ण
Lord Krishna
श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।
