श्री जगन्नाथ जगत गुरू,
आस भगत के आप।
नाम लेते ही आपका,
मिटे कष्ट संताप॥
हे श्री जगन्नाथ, आप जगत के गुरु हैं और भक्तों की एकमात्र आस हैं। आपका नाम लेते ही कष्ट और संताप मिट जाते हैं।
मैं अधम हूँ मूढ़ मति,
पूजा विधि का ना ज्ञान।
दोष मेरा ना धरना नाथ,
मैं हूँ तेरी संतान॥
मैं अधम हूँ, मूढ़ बुद्धि वाला हूँ, मुझे पूजा की विधि का ज्ञान नहीं। हे नाथ, मेरा दोष मत पकड़ना — मैं तो आपकी ही संतान हूँ।
1जय जगन्नाथ जगत के पालक।
भव भय भंजन कष्ट निवारक॥
हे जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप जगत के पालनकर्ता हैं, भव के भय को तोड़ने वाले और कष्ट का निवारण करने वाले हैं।
2संगी साथी ना जिसका कोई।
आसरा उसका बस एक तू ही॥
जिसका कोई संगी-साथी नहीं, उसका सहारा बस आप ही हैं।
3भगतों के दुख दूर करे तू।
संतों के सदा मन में बसे तू॥
आप भक्तों के दुख दूर करते हैं और संतों के मन में सदा बसे रहते हैं।
4पतित पावन नाम तिहारा।
सारे जग में तू इक प्यारा॥
आपका नाम पतितों को पावन करने वाला है; सारे जगत में आप ही एक प्यारे हैं।
5शंख क्षेत्र में धाम है तेरा।
पीड़ हरे है नाम तिहारा॥
शंख क्षेत्र (पुरी) में आपका धाम है; आपका नाम ही पीड़ा हर लेता है।
6सागर तट में नीलगिरी पर।
तूने बसा लिया अपना घर॥
सागर के तट पर, नीलगिरि पर, आपने अपना घर बसा लिया।
7जो तेरे रूप को मन में बसाये।
चिन्ता जग की ना उसे सताये॥
जो आपके रूप को मन में बसा लेता है, उसे जगत की चिंता नहीं सताती।
8तेरी शरण में जो भी आये।
विपदा से तू उसे बचाये॥
जो भी आपकी शरण में आता है, आप उसे विपदा से बचा लेते हैं।
9धाम तेरा हर धाम से न्यारा।
जिसके बिना है तीर्थ अधूरा॥
आपका धाम हर धाम से निराला है; उसके बिना तीर्थ-यात्रा अधूरी है।
10ना हो जब तक तेरे दर्शन।
निष्फल जीवन और तीर्थाटन॥
जब तक आपके दर्शन न हों, जीवन और तीर्थाटन दोनों निष्फल हैं।
11हाथ पैर नहीं है प्रभु तेरा।
फिर भी सभी को तेरा ही आसरा॥
हे प्रभु, आपके हाथ-पैर नहीं हैं — फिर भी सबको आपका ही सहारा है।
12नाथ जगत का तू कहलाता।
हर कोई तेरी महिमा गाता॥
आप जगत के नाथ कहलाते हैं; हर कोई आपकी महिमा गाता है।
13भगतों को तू सदा लुभाता।
महिमा अपनी उनसे गवाता॥
आप भक्तों को सदा लुभाते हैं और अपनी महिमा उन्हीं से गवाते हैं।
14दासी या भगत था एक अनोखा।
रूप तेरा साग भात में देखा॥
दासिया बाउरी नाम का एक अनोखा भक्त था, जिसने साग-भात में ही आपका रूप देख लिया।
15अपने बगीचे से श्रीफल तोड़ा।
दे ब्राह्मण को हाथ वो जोड़ा॥
उसने अपने बगीचे से एक श्रीफल (नारियल) तोड़ा और हाथ जोड़कर एक ब्राह्मण को दे दिया।
16जा रहे प्रभु का करने दर्शन।
श्रीफल ये कर देना अर्पण॥
प्रभु के दर्शन को जा रहे उस ब्राह्मण से कहा — यह श्रीफल प्रभु को अर्पण कर देना।
17अनहोनी ऐसी हुई भाई।
प्रभु ने बाँहें अपनी बढ़ाई॥
फिर भाई, ऐसी अनहोनी हुई कि प्रभु ने स्वयं अपनी बाँहें बढ़ा दीं।
18हाथ से विप्र के ले नारियल।
दासिया को दिया भक्ति का फल॥
ब्राह्मण के हाथ से नारियल लेकर उन्होंने दासिया को उसकी भक्ति का फल दे दिया।
19बंधु महंती की भक्ति कहें क्या।
प्रभु को मित्र सा प्यारा वो था॥
बंधु महंती की भक्ति का क्या कहना — प्रभु को वह मित्र के समान प्यारा था।
20दर्श की आस तेरे ले मन में।
आया तेरे पुनीत नगर में॥
मन में आपके दर्शन की आस लेकर वह आपके पुनीत नगर (पुरी) आया।
21संग में लाया कुटुंब था अपना।
पहुँचा तुझ तक जब हुई रैना॥
अपना पूरा कुटुंब साथ लाया था; आप तक पहुँचा तो रात हो चुकी थी।
22सिंह द्वार मंदिर का बंद था।
भूखे पेट बंधु सोया था॥
मंदिर का सिंहद्वार बंद हो चुका था, और बंधु भूखे पेट ही सो गया।
23भगत का कष्ट ना सह पाये भगवन।
स्वर्ण थाल में लाये भोजन॥
भक्त का कष्ट भगवान सह न सके — वे स्वयं स्वर्ण-थाल में भोजन ले आए।
24साल वेग पूत मुगल पिता का।
नाम तेरा हर पल लेता था॥
सालबेग, जो मुगल पिता का पुत्र था, हर पल आपका ही नाम लेता था।
25रथ यात्रा में आ पाये न पुरी।
सैकड़ों कोस की थी जो दूरी॥
रथ यात्रा में वह पुरी नहीं पहुँच पाया — सैकड़ों कोस की दूरी जो थी।
26गुहार लगाई जगन्नाथ को।
आऊँ न जब तक रोकना रथ को॥
उसने जगन्नाथ से गुहार लगाई — जब तक मैं न आऊँ, रथ को रोके रखना।
27सारा जग तब चकित हुआ था।
भक्त की इच्छा जब पूर्ण हुई थी॥
सारा जगत तब चकित रह गया, जब उस भक्त की इच्छा पूरी हुई (रथ वहीं रुक गया)।
28डूबे जय देव भक्ति में तेरे।
गीत गोविंद रचा नाम में तेरे॥
कवि जयदेव आपकी भक्ति में डूबे और आपके ही नाम पर "गीत गोविंद" की रचना की।
29लिखते लिखते कवि ठहर गये।
रचना पूर्ण कौन कर पाये॥
लिखते-लिखते कवि एक जगह ठहर गए — वह रचना अब कौन पूरी करे?
30पत्नी से कहा स्नान कर आऊँ।
आकर फिर से बुद्धि लगाऊँ॥
उन्होंने पत्नी से कहा — मैं स्नान कर आऊँ, फिर लौटकर बुद्धि लगाऊँगा।
31रूप कवि का धरा प्रभु ने।
गीत अधूरा किया पूर्ण प्रभु ने॥
तब प्रभु ने स्वयं कवि का रूप धरा और अधूरा गीत पूरा कर दिया।
32प्रेम से भक्त के प्रभु बंधे हैं।
भक्ति प्रीति के डोर से जुड़े हैं॥
प्रभु अपने भक्त के प्रेम से बँधे हुए हैं; वे भक्ति और प्रीति की डोर से जुड़े हैं।
33बिना मोल के प्यार से बिकता।
कर्मा बाई की खिचड़ी खाता॥
वे बिना मोल के, केवल प्यार से बिक जाते हैं — कर्माबाई की खिचड़ी वे इसी भाव से खाते रहे।
34जात पात का भेद न कोई।
जो तुझे देखा सुध बिसराई॥
आपके यहाँ जात-पात का कोई भेद नहीं; जिसने आपको देख लिया, उसने अपनी सुध ही खो दी।
35शंकर देव निराकार उपासक।
देख तुझे बने तेरे स्थापक॥
शंकरदेव निराकार के उपासक थे; आपको देखकर वे ही आपके स्थापक बन गए।
36श्री गुरुनानक संत कबीरा।
हर कोई तुझको एक सा प्यारा॥
श्री गुरु नानक हों या संत कबीर — हर कोई आपको एक-सा प्यारा है।
37तुम सा प्रभु कोई और कहाँ है।
भक्त जहाँ है तू भी वहाँ है॥
आप जैसा प्रभु और कहाँ है — जहाँ भक्त है, वहाँ आप भी हैं।
38भक्तों के मन को हरषाने।
रथ पर आता दर्शन देने॥
भक्तों के मन को हर्षाने के लिए आप रथ पर आकर दर्शन देते हैं।
39पाकर प्यारे प्रभु का दर्शन।
कर लो धन्य सभी यह जीवन॥
प्यारे प्रभु का दर्शन पाकर सब अपना यह जीवन धन्य कर लो।
40जय जगन्नाथ प्रेम से बोलो।
अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो॥
प्रेम से बोलो — जय जगन्नाथ! कुंदन कहता है, नाम का यह अमृत पी लो।
कृष्ण बलराम दोनों ओर,
बीच सुभद्रा बहन।
नीलांचल वासी जगन्नाथ,
सदा बसो मोरे मन॥
एक ओर कृष्ण (जगन्नाथ), दूसरी ओर बलराम, और बीच में बहन सुभद्रा। हे नीलांचल-वासी जगन्नाथ, आप सदा मेरे मन में बसे रहें।