श्री जगन्नाथ चालीसा
पाठ
गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। श्री जगन्नाथ-पुरी-पति, वंदना करूँ महान॥
जय जय जगदीश जगन्नाथा। बलभद्र-सुभद्रा संग साथा॥
नील-माधव रूप मनोहर। बड़े नैन छवि अति सुन्दर॥
दारु-विग्रह अद्भुत न्यारा। पुरी-धाम में बसे प्यारा॥
विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा। जगत-नाथ तुम जग-आधारा॥
चार-धाम में पुरी कहाई। तुम्हरी महिमा जग में छाई॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
रथ पर होकर नगर भ्रमते। भक्तन को दरस सुख देते॥
रथ यात्रा जग-विख्याता। लाखों भक्त खींचें रथ माता॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
महाप्रसाद की महिमा भारी। पावन भोग जग-हितकारी॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
जात-पाँत का भेद न माना। सब भक्तन को एक सम जाना॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। जगन्नाथ-कृपा सहज वह पावै॥
मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥
जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
स्नान-यात्रा पर ज्वर तुम पाते। फिर नवयौवन रूप दिखाते॥
जो यह जगन्नाथ चालीसा गावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा जगन्नाथ की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। भक्ति-सुख-शान्ति घर लावैं॥
जगन्नाथ-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
रथ यात्रा में जो जन धावै। जन्म-जन्म के पाप नसावै॥
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत जगन्नाथ देवा॥
संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
भक्त-वत्सल तुम कहलाते। प्रेम-भक्ति से रीझ जाते॥
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
समता-प्रेम का मार्ग दिखाते। भक्ति-करुणा जग को भाते॥
दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
जगन्नाथ-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥
पुरी-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥
करुणा-प्रेम का दान दिखाते। भक्ति-समता जग को सिखलाते॥
जो जन जगन्नाथ गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
जगन्नाथ-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
भक्ति-सुख-शान्ति घर में आवै। प्रेम-करुणा-संतोष बढ़ावै॥
भय-संकट सब दूर हटावै। जगन्नाथ जो जन नित ध्यावै॥
मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। जगन्नाथ-नाम जो जन गावै॥
सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै। प्रेम-करुणा सब बढ़ावै॥
सब भक्तन को सम तुम जानो। भेद नहीं कोई तुम मानो॥
जय जय जय जगन्नाथ कृपाला। बलभद्र-सुभद्रा संग दयाला॥
जगन्नाथ चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भक्ति-मुक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥
अर्थ (हिन्दी)
- गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं पुरी-पति श्री जगन्नाथ की महान वंदना करता हूँ।
- हे जगदीश जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के संग साथ विराजते हैं।
- नील-माधव का मनोहर रूप; बड़े-बड़े नेत्रों वाली आपकी छवि अति सुन्दर है।
- दारु (काष्ठ) की अद्भुत व अनोखी मूर्ति; आप प्यारे पुरी-धाम में बसते हैं।
- आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; आप जगत के नाथ व जगत के आधार हैं।
- चार धामों में पुरी गिनी जाती है; आपकी महिमा जगत में छाई है।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- रथ पर सवार होकर आप नगर भ्रमण करते हैं और भक्तों को दर्शन का सुख देते हैं।
- आपकी रथ यात्रा जगत-विख्यात है; लाखों भक्त (आप व सुभद्रा माता का) रथ खींचते हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- आपके महाप्रसाद की महिमा अति महान है; यह पावन भोग जगत का हित करने वाला है।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- आप जात-पाँत का भेद नहीं मानते और सब भक्तों को समान जानते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही जगन्नाथ-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
- जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- स्नान-यात्रा पर (परंपरानुसार) आप ज्वर-ग्रस्त होते हैं, फिर नवयौवन रूप में दर्शन देते हैं।
- जो यह जगन्नाथ चालीसा गाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर जगन्नाथ की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में भक्ति, सुख व शांति लाते हैं।
- जिन पर जगन्नाथ की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- जो जन रथ यात्रा में सम्मिलित होता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर जगन्नाथ देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
- आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और प्रेम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- आप समता व प्रेम का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व करुणा जगत को भाते हैं।
- जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
- जो जन जगन्नाथ-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
- पुरी-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
- आप करुणा व प्रेम का दान देते हैं और जगत को भक्ति व समता सिखलाते हैं।
- जो जन जगन्नाथ के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन जगन्नाथ-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में भक्ति, सुख व शांति आती है और प्रेम, करुणा व संतोष बढ़ता है।
- जो जन जगन्नाथ का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- जो जन जगन्नाथ-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
- घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व करुणा बढ़ती है।
- आप सब भक्तों को समान जानते हैं और किसी में कोई भेद नहीं मानते।
- हे कृपालु जगन्नाथ, आपकी जय हो; बलभद्र व सुभद्रा के संग आप दयालु हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल जगन्नाथ चालीसा पढ़ता है, उसे भक्ति, मुक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
लाभ
- भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
- भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
- मनोकामना पूर्ण होकर मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है।
- मन में समता, प्रेम व करुणा का संचार होता है।
कब करें पाठ
रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) पर · एकादशी व नित्य संध्या में · गुरुवार को
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक जगन्नाथ चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
