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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री जगन्नाथ चालीसा

चालीसा · श्री कृष्ण

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। श्री जगन्नाथ-पुरी-पति, वंदना करूँ महान॥

1

जय जय जगदीश जगन्नाथा। बलभद्र-सुभद्रा संग साथा॥

2

नील-माधव रूप मनोहर। बड़े नैन छवि अति सुन्दर॥

3

दारु-विग्रह अद्भुत न्यारा। पुरी-धाम में बसे प्यारा॥

4

विष्णु-कृष्ण का रूप तुम्हारा। जगत-नाथ तुम जग-आधारा॥

5

चार-धाम में पुरी कहाई। तुम्हरी महिमा जग में छाई॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥

7

रथ पर होकर नगर भ्रमते। भक्तन को दरस सुख देते॥

8

रथ यात्रा जग-विख्याता। लाखों भक्त खींचें रथ माता॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

महाप्रसाद की महिमा भारी। पावन भोग जग-हितकारी॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥

13

जात-पाँत का भेद न माना। सब भक्तन को एक सम जाना॥

14

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। जगन्नाथ-कृपा सहज वह पावै॥

15

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

16

जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

17

स्नान-यात्रा पर ज्वर तुम पाते। फिर नवयौवन रूप दिखाते॥

18

जो यह जगन्नाथ चालीसा गावै। भक्ति-मुक्ति सहज वह पावै॥

19

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा जगन्नाथ की होई॥

20

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। भक्ति-सुख-शान्ति घर लावैं॥

21

जगन्नाथ-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

22

रथ यात्रा में जो जन धावै। जन्म-जन्म के पाप नसावै॥

23

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत जगन्नाथ देवा॥

24

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

25

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

26

भक्त-वत्सल तुम कहलाते। प्रेम-भक्ति से रीझ जाते॥

27

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

28

समता-प्रेम का मार्ग दिखाते। भक्ति-करुणा जग को भाते॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

जगन्नाथ-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

पुरी-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

करुणा-प्रेम का दान दिखाते। भक्ति-समता जग को सिखलाते॥

33

जो जन जगन्नाथ गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

34

जगन्नाथ-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

35

भक्ति-सुख-शान्ति घर में आवै। प्रेम-करुणा-संतोष बढ़ावै॥

36

भय-संकट सब दूर हटावै। जगन्नाथ जो जन नित ध्यावै॥

37

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। जगन्नाथ-नाम जो जन गावै॥

38

सुख-शान्ति-भक्ति घर में लावै। प्रेम-करुणा सब बढ़ावै॥

39

सब भक्तन को सम तुम जानो। भेद नहीं कोई तुम मानो॥

40

जय जय जय जगन्नाथ कृपाला। बलभद्र-सुभद्रा संग दयाला॥

जगन्नाथ चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भक्ति-मुक्ति-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं पुरी-पति श्री जगन्नाथ की महान वंदना करता हूँ।
  2. हे जगदीश जगन्नाथ, आपकी जय हो; आप भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के संग साथ विराजते हैं।
  3. नील-माधव का मनोहर रूप; बड़े-बड़े नेत्रों वाली आपकी छवि अति सुन्दर है।
  4. दारु (काष्ठ) की अद्भुत व अनोखी मूर्ति; आप प्यारे पुरी-धाम में बसते हैं।
  5. आप विष्णु-कृष्ण के रूप हैं; आप जगत के नाथ व जगत के आधार हैं।
  6. चार धामों में पुरी गिनी जाती है; आपकी महिमा जगत में छाई है।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
  8. रथ पर सवार होकर आप नगर भ्रमण करते हैं और भक्तों को दर्शन का सुख देते हैं।
  9. आपकी रथ यात्रा जगत-विख्यात है; लाखों भक्त (आप व सुभद्रा माता का) रथ खींचते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. आपके महाप्रसाद की महिमा अति महान है; यह पावन भोग जगत का हित करने वाला है।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
  14. आप जात-पाँत का भेद नहीं मानते और सब भक्तों को समान जानते हैं।
  15. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही जगन्नाथ-कृपा प्राप्त करता है।
  16. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  17. जो श्रद्धा से तुलसी चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  18. स्नान-यात्रा पर (परंपरानुसार) आप ज्वर-ग्रस्त होते हैं, फिर नवयौवन रूप में दर्शन देते हैं।
  19. जो यह जगन्नाथ चालीसा गाता है, वह सहज ही भक्ति व मुक्ति पाता है।
  20. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर जगन्नाथ की कृपा होती है।
  21. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में भक्ति, सुख व शांति लाते हैं।
  22. जिन पर जगन्नाथ की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  23. जो जन रथ यात्रा में सम्मिलित होता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  24. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर जगन्नाथ देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  25. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  26. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  27. आप भक्त-वत्सल कहलाते हैं और प्रेम-भक्ति से ही प्रसन्न (रीझ) जाते हैं।
  28. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  29. आप समता व प्रेम का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व करुणा जगत को भाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन जगन्नाथ-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. पुरी-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप करुणा व प्रेम का दान देते हैं और जगत को भक्ति व समता सिखलाते हैं।
  34. जो जन जगन्नाथ के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  35. जो जन जगन्नाथ-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  36. घर में भक्ति, सुख व शांति आती है और प्रेम, करुणा व संतोष बढ़ता है।
  37. जो जन जगन्नाथ का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  38. जो जन जगन्नाथ-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  39. घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और प्रेम व करुणा बढ़ती है।
  40. आप सब भक्तों को समान जानते हैं और किसी में कोई भेद नहीं मानते।
  41. हे कृपालु जगन्नाथ, आपकी जय हो; बलभद्र व सुभद्रा के संग आप दयालु हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल जगन्नाथ चालीसा पढ़ता है, उसे भक्ति, मुक्ति, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
  • मनोकामना पूर्ण होकर मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है।
  • मन में समता, प्रेम व करुणा का संचार होता है।

कब करें पाठ

रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) पर · एकादशी व नित्य संध्या में · गुरुवार को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक जगन्नाथ चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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