श्री खाटू श्याम चालीसा

śrī khāṭū śyāma cālīsā

Khatu Shyam Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
41
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
एकादशी, फाल्गुन मेला व नित्य
उद्देश्य:संकट-मोचन (Relief from Troubles)रक्षा (Protection)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)

श्री खाटू श्याम चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर उनतालीस चौपाइयों में चलती है और एक दोहे पर पूर्ण होती है। इसका आरंभ "श्याम-श्याम भजि बारंबारा, सहज ही हो भवसागर पारा" से होता है। चौपाइयाँ बर्बरीक के वंश-क्रम से लेकर खाटू में उनके विराजने तक की कथा कहती हैं।

परिचय

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

स्रोत: परंपरागत खाटू श्याम चालीसा — प्रकाशित वाचना; रचयिता अज्ञात

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री खाटू श्याम चालीसा
IASTśrī khāṭū śyāma cālīsā
देवताश्री खाटू श्याम
मूल स्रोतपरंपरागत खाटू श्याम चालीसा — प्रकाशित वाचना; रचयिता अज्ञात
शुभ दिनएकादशी, फाल्गुन मेला व नित्य
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

चालीसा शुरू में ही वंश-क्रम स्पष्ट कर देती है — "भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया, कही भीम का पौत्र कहलाया" (चौपाई 3): माता अहिलावती (मोरवी) और पिता घटोत्कच के पुत्र, यानी भीम के पौत्र। फिर "बर्बरीक विष्णु अवतारा, भक्तन हेतु मनुज तन धारा" (5)।

इसके बाद का बड़ा हिस्सा नाम-माला है (6–14) — बासुदेव, मधुसूदन, गोपाल, मुरारी, गोवर्धनधारी, द्वारिकाधीश, राधाबल्लभ, मुरलीधर, पुरुषोत्तम। यह इस चालीसा की अपनी दृष्टि है: बर्बरीक को कृष्ण का नाम मिला, इसलिए कृष्ण के नाम भी यहाँ श्याम के नाम बन जाते हैं।

बीच में वे उदाहरण आते हैं जो नाम की शक्ति बताते हैं — गणिका, भीलनी, अहल्या, अजामिल और सदन कसाई (20–23)। और फिर वह पंक्ति जो खाटू में सबसे अधिक दोहराई जाती है — "प्रेम सहित जब नाम पुकारा, भक्त लगत श्याम को प्यारा" (34)।

अंत में खाटू आता है: "खाटू में हैं मथुरावासी, पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी" (35), और मुरली की तान सुनकर चारों दिशाओं से भक्तों का खाटू पहुँचना (36–38)।

एक बात जो जान लेनी चाहिए: खाटू श्याम चालीसा की कम-से-कम तीन वाचनाएँ प्रचलित हैं। यहाँ वह दी गई है जिसके दो स्वतंत्र प्रकाशित साक्ष्य मिले। बाक़ी दोनों नीचे "स्रोत" में दर्ज हैं — किसी को "ग़लत" कहकर छोड़ा नहीं गया।

संपूर्ण चालीसा

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श्री गुरु चरणन ध्यान धर, सुमीर सच्चिदानंद। श्याम चालीसा बणत है, रच चौपाई छंद॥

श्री गुरु के चरणों का ध्यान धरकर और सच्चिदानंद का स्मरण करके, चौपाई छंद में यह श्याम चालीसा रची जाती है।

श्याम-श्याम भजि बारंबारा। सहज ही हो भवसागर पारा॥

बार-बार "श्याम-श्याम" भजो — इसी से सहज ही भवसागर पार हो जाता है।

इन सम देव न दूजा कोई। दिन दयालु न दाता होई॥

इनके समान दूसरा कोई देव नहीं; दीनों पर दया करने वाला ऐसा दाता कोई नहीं।

भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया। कही भीम का पौत्र कहलाया॥

भीम के सुपुत्र (घटोत्कच) और माता अहिलावती से जन्मे — इसीलिए भीम के पौत्र कहलाए।

यह सब कथा कही कल्पांतर। तनिक न मानो इसमें अंतर॥

यह सारी कथा कल्पों से कही जाती रही है; इसमें तनिक भी संदेह न मानो।

बर्बरीक विष्णु अवतारा। भक्तन हेतु मनुज तन धारा॥

बर्बरीक विष्णु के अवतार हैं; भक्तों के लिए उन्होंने मनुष्य-शरीर धारण किया।

बासुदेव देवकी प्यारे। जसुमति मैया नंद दुलारे॥

वासुदेव और देवकी के प्यारे; यशोदा मैया और नंद के दुलारे।

मधुसूदन गोपाल मुरारी। वृजकिशोर गोवर्धन धारी॥

मधुसूदन, गोपाल, मुरारी; ब्रजकिशोर और गोवर्धन धारण करने वाले।

सियाराम श्री हरि गोबिंदा। दिनपाल श्री बाल मुकुंदा॥

सियाराम, श्री हरि, गोविंद; दीनों का पालन करने वाले श्री बाल मुकुंद।

दामोदर रण छोड़ बिहारी। नाथ द्वारिकाधीश खरारी॥

दामोदर, रणछोड़ बिहारी; नाथ द्वारिकाधीश और खर नामक असुर के शत्रु।

राधाबल्लभ रुक्मणि कंता। गोपी बल्लभ कंस हनंता॥

राधा के वल्लभ, रुक्मिणी के कांत; गोपियों के प्रिय और कंस का वध करने वाले।

मनमोहन चित चोर कहाए। माखन चोरि-चारि कर खाए॥

मनमोहन और चित्त-चोर कहलाए; माखन चुरा-चुराकर खाया।

मुरलीधर यदुपति घनश्यामा। कृष्ण पतित पावन अभिरामा॥

मुरलीधर, यदुपति, घनश्याम; कृष्ण — पतितों को पावन करने वाले, मनोहर।

मायापति लक्ष्मीपति ईशा। पुरुषोत्तम केशव जगदीशा॥

माया के स्वामी, लक्ष्मी के पति, ईश्वर; पुरुषोत्तम, केशव और जगदीश।

विश्वपति जय भुवन पसारा। दीनबंधु भक्तन रखवारा॥

विश्व के स्वामी, जिनसे सारे भुवन फैले; दीनों के बंधु और भक्तों के रखवाले।

प्रभु का भेद न कोई पाया। शेष महेश थके मुनिराया॥

प्रभु का रहस्य कोई नहीं पा सका; शेषनाग, महेश और मुनिगण भी थक गए।

नारद शारद ऋषि योगिंदर। श्याम-श्याम सब रटत निरंतर॥

नारद, शारदा, ऋषि और योगींद्र — सब निरंतर "श्याम-श्याम" रटते रहते हैं।

कवि कोदी करी कनन गिनंता। नाम अपार अथाह अनंता॥

कवि गिनते-गिनते थक जाएँ, फिर भी आपके नाम अपार, अथाह और अनंत हैं।

हर सृष्टि हर सुग में भाई। ये अवतार भक्त सुखदाई॥

हर सृष्टि और हर युग में — यह अवतार भक्तों को सुख देने वाला है।

हृदय माहि करि देखु विचारा। श्याम भजे तो हो निस्तारा॥

हृदय में विचार करके देख लो — श्याम को भजने से ही उद्धार होता है।

कौर पढ़ावत गणिका तारी। भीलनी की भक्ति बलिहारी॥

तोते को नाम पढ़ाते-पढ़ाते गणिका तर गई; भीलनी (शबरी) की भक्ति पर बलिहारी।

सती अहिल्या गौतम नारी। भई श्रापवश शिला दुलारी॥

गौतम ऋषि की पत्नी सती अहल्या, जो श्रापवश शिला बन गई थीं।

श्याम चरण रज चित लाई। पहुँची पति लोक में जाही॥

श्याम की चरण-रज चित्त में धारण करके वे पति-लोक को प्राप्त हुईं।

अजामिल अरु सदन कसाई। नाम प्रताप परम गति पाई॥

अजामिल और सदन कसाई ने भी नाम के प्रताप से परम गति पाई।

जाके श्याम नाम अधारा। सुख लहहि दुःख दूर हो सारा॥

जिसे श्याम-नाम का आधार है, वह सुख पाता है और उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं।

श्याम सलोवन है अति सुंदर। मोर मुकुट सिर तन पीतांबर॥

श्याम सलोने और अत्यंत सुंदर हैं; सिर पर मोर मुकुट और शरीर पर पीतांबर।

गले बैजंती माल सुहाई। छवि अनूप भक्तन मान भाई॥

गले में वैजयंती माला सुशोभित है; यह अनुपम छवि भक्तों के मन को भाती है।

श्याम-श्याम सुमिरहु दिन-राती। श्याम दुपहरि कर परभाती॥

दिन-रात "श्याम-श्याम" का स्मरण करो — दोपहर में भी और प्रभात में भी।

श्याम सारथी जिस रथ के। रोड़े दूर होए उस पथ के॥

जिस रथ के सारथी श्याम हों, उस मार्ग के सारे रोड़े दूर हो जाते हैं।

श्याम भक्त न कहीं पर हारा। भीर परी तब श्याम पुकारा॥

श्याम का भक्त कहीं नहीं हारा; जब भी विपत्ति पड़ी, उसने श्याम को पुकारा।

रसना श्याम नाम रस पी ले। जी ले श्याम नाम के ही ले॥

हे जिह्वा, श्याम-नाम का रस पी ले; श्याम के नाम के सहारे ही जी ले।

संसारी सुख भोग मिलेगा। अंत श्याम सुख योग मिलेगा॥

संसार के सुख-भोग भी मिलेंगे, और अंत में श्याम के सुख का योग भी।

श्याम प्रभु हैं तन के काले। मन के गोरे भोले-भाले॥

श्याम प्रभु शरीर से श्याम वर्ण हैं, पर मन से उजले और भोले-भाले हैं।

श्याम संत भक्तन हितकारी। रोग-दोष अध नाशे भारी॥

श्याम संतों और भक्तों का हित करने वाले हैं; वे भारी रोग, दोष और पाप नष्ट कर देते हैं।

प्रेम सहित जब नाम पुकारा। भक्त लगत श्याम को प्यारा॥

जब प्रेमपूर्वक नाम पुकारा जाता है, तभी भक्त श्याम को प्यारा लगने लगता है।

खाटू में हैं मथुरावासी। पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी॥

मथुरा में बसने वाले अब खाटू में विराजते हैं; वे पूर्ण पारब्रह्म और अविनाशी हैं।

सुधा तान भरि मुरली बजाई। चहुँ दिशि जहाँ सुनी पाई॥

अमृत-भरी तान से मुरली बजाई, जो चारों दिशाओं में जहाँ-तहाँ सुनाई दी।

वृद्ध-बाल जेते नारि नर। मुग्ध भये सुनि बंशी स्वर॥

वृद्ध, बालक, स्त्री और पुरुष — जितने भी थे, बाँसुरी का स्वर सुनकर मुग्ध हो गए।

हड़बड़ कर सब पहुँचे जाई। खाटू में जहाँ श्याम कन्हाई॥

सब हड़बड़ाकर वहाँ जा पहुँचे — खाटू में, जहाँ श्याम कन्हाई विराजते हैं।

जिसने श्याम स्वरूप निहारा। भव भय से पाया छुटकारा॥

जिसने भी श्याम का स्वरूप निहारा, उसने भव के भय से छुटकारा पा लिया।

श्याम सलोने साँवरे, बर्बरीक तनुधार। इच्छा पूर्ण भक्त की, करो न लाओ बार॥

फलश्रुति: हे सलोने साँवरे श्याम, हे बर्बरीक-शरीरधारी! भक्त की इच्छा पूर्ण कीजिए — देर न कीजिए।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

भवसागरसंसार रूपी समुद्र
अहिलावतीबर्बरीक की माता — मोरवी भी कहलाती हैं
कल्पांतरकल्पों से, युगों से
खरारीखर नामक असुर के शत्रु
हनंतावध करने वाले
योगिंदरयोगियों के स्वामी, योगींद्र
गणिकावह वेश्या जो तोते को राम-नाम सिखाते-सिखाते तर गई
भीलनीशबरी
अजामिलभागवत का वह पापी जो "नारायण" पुकारकर तर गया
सदन कसाईभक्त-परंपरा का वह कसाई जो नाम-स्मरण से तर गया
परभातीप्रभात का भजन
तनुधारशरीर धारण करने वाले

अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री गुरु के चरणों का ध्यान धरकर और सच्चिदानंद का स्मरण करके, चौपाई छंद में यह श्याम चालीसा रची जाती है।
  2. बार-बार "श्याम-श्याम" भजो — इसी से सहज ही भवसागर पार हो जाता है।
  3. इनके समान दूसरा कोई देव नहीं; दीनों पर दया करने वाला ऐसा दाता कोई नहीं।
  4. भीम के सुपुत्र (घटोत्कच) और माता अहिलावती से जन्मे — इसीलिए भीम के पौत्र कहलाए।
  5. यह सारी कथा कल्पों से कही जाती रही है; इसमें तनिक भी संदेह न मानो।
  6. बर्बरीक विष्णु के अवतार हैं; भक्तों के लिए उन्होंने मनुष्य-शरीर धारण किया।
  7. वासुदेव और देवकी के प्यारे; यशोदा मैया और नंद के दुलारे।
  8. मधुसूदन, गोपाल, मुरारी; ब्रजकिशोर और गोवर्धन धारण करने वाले।
  9. सियाराम, श्री हरि, गोविंद; दीनों का पालन करने वाले श्री बाल मुकुंद।
  10. दामोदर, रणछोड़ बिहारी; नाथ द्वारिकाधीश और खर नामक असुर के शत्रु।
  11. राधा के वल्लभ, रुक्मिणी के कांत; गोपियों के प्रिय और कंस का वध करने वाले।
  12. मनमोहन और चित्त-चोर कहलाए; माखन चुरा-चुराकर खाया।
  13. मुरलीधर, यदुपति, घनश्याम; कृष्ण — पतितों को पावन करने वाले, मनोहर।
  14. माया के स्वामी, लक्ष्मी के पति, ईश्वर; पुरुषोत्तम, केशव और जगदीश।
  15. विश्व के स्वामी, जिनसे सारे भुवन फैले; दीनों के बंधु और भक्तों के रखवाले।
  16. प्रभु का रहस्य कोई नहीं पा सका; शेषनाग, महेश और मुनिगण भी थक गए।
  17. नारद, शारदा, ऋषि और योगींद्र — सब निरंतर "श्याम-श्याम" रटते रहते हैं।
  18. कवि गिनते-गिनते थक जाएँ, फिर भी आपके नाम अपार, अथाह और अनंत हैं।
  19. हर सृष्टि और हर युग में — यह अवतार भक्तों को सुख देने वाला है।
  20. हृदय में विचार करके देख लो — श्याम को भजने से ही उद्धार होता है।
  21. तोते को नाम पढ़ाते-पढ़ाते गणिका तर गई; भीलनी (शबरी) की भक्ति पर बलिहारी।
  22. गौतम ऋषि की पत्नी सती अहल्या, जो श्रापवश शिला बन गई थीं।
  23. श्याम की चरण-रज चित्त में धारण करके वे पति-लोक को प्राप्त हुईं।
  24. अजामिल और सदन कसाई ने भी नाम के प्रताप से परम गति पाई।
  25. जिसे श्याम-नाम का आधार है, वह सुख पाता है और उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं।
  26. श्याम सलोने और अत्यंत सुंदर हैं; सिर पर मोर मुकुट और शरीर पर पीतांबर।
  27. गले में वैजयंती माला सुशोभित है; यह अनुपम छवि भक्तों के मन को भाती है।
  28. दिन-रात "श्याम-श्याम" का स्मरण करो — दोपहर में भी और प्रभात में भी।
  29. जिस रथ के सारथी श्याम हों, उस मार्ग के सारे रोड़े दूर हो जाते हैं।
  30. श्याम का भक्त कहीं नहीं हारा; जब भी विपत्ति पड़ी, उसने श्याम को पुकारा।
  31. हे जिह्वा, श्याम-नाम का रस पी ले; श्याम के नाम के सहारे ही जी ले।
  32. संसार के सुख-भोग भी मिलेंगे, और अंत में श्याम के सुख का योग भी।
  33. श्याम प्रभु शरीर से श्याम वर्ण हैं, पर मन से उजले और भोले-भाले हैं।
  34. श्याम संतों और भक्तों का हित करने वाले हैं; वे भारी रोग, दोष और पाप नष्ट कर देते हैं।
  35. जब प्रेमपूर्वक नाम पुकारा जाता है, तभी भक्त श्याम को प्यारा लगने लगता है।
  36. मथुरा में बसने वाले अब खाटू में विराजते हैं; वे पूर्ण पारब्रह्म और अविनाशी हैं।
  37. अमृत-भरी तान से मुरली बजाई, जो चारों दिशाओं में जहाँ-तहाँ सुनाई दी।
  38. वृद्ध, बालक, स्त्री और पुरुष — जितने भी थे, बाँसुरी का स्वर सुनकर मुग्ध हो गए।
  39. सब हड़बड़ाकर वहाँ जा पहुँचे — खाटू में, जहाँ श्याम कन्हाई विराजते हैं।
  40. जिसने भी श्याम का स्वरूप निहारा, उसने भव के भय से छुटकारा पा लिया।
  41. फलश्रुति: हे सलोने साँवरे श्याम, हे बर्बरीक-शरीरधारी! भक्त की इच्छा पूर्ण कीजिए — देर न कीजिए।

लाभ

  • बर्बरीक का वंश-क्रम और खाटू में विराजने की कथा — दोनों इसी पाठ में।
  • एकादशी की पूजा का प्रमुख पाठ; फाल्गुन के लक्खी मेले में भी पढ़ा जाता है।
  • नाम की शक्ति के उदाहरण — गणिका, शबरी, अहल्या, अजामिल, सदन कसाई।
  • भाषा सरल और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।

कब करें पाठ

प्रत्येक एकादशी कोफाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी (लक्खी मेला) परनित्य प्रातः व संध्याखाटू धाम की यात्रा से पहले

पाठ विधि

श्याम बाबा के चित्र के समक्ष घी या तेल की ज्योत जलाकर बैठें और "जय श्री श्याम" का जयकारा तीन बार कहें। केसरिया पुष्प, मोरछड़ी तथा इत्र अर्पित करें और चूरमा-पंजीरी का भोग लगाएँ। दोहे से आरंभ कर उनतालीस चौपाइयाँ क्रम से पढ़ें, फिर समापन दोहा। यह दोहा-चौपाई छंद है, इसलिए लय में गाकर पढ़ने की परंपरा है। साथ में खाटू श्याम आरती या अष्टक पढ़ा जाता है; अंत में प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)
स्रोत परंपराhindi.webdunia.com — श्री खाटू श्याम चालीसा (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — श्री खाटू श्याम चालीसा (स्वतंत्र पुष्टि; पाठ वही, केवल पृष्ठ-सज्जा अलग) · ⚠️ कम से कम तीन वाचनाएँ प्रचलित हैं और तीनों दर्ज हैं: (1) यहाँ दी गई — *"श्री गुरु चरणन ध्यान धर… रच चौपाई छंद"*; (2) *"श्री गुरु चरण ध्यान धरि… रचि चालीस छंद"*; (3) सीकर वाचना — *"श्री गुरु पदरज शीशधर प्रथम सुमिरू गणेश"* (bhaktibharat.com पर)। किसी को "सही" कहकर बाक़ी नहीं छोड़ी गईं। · ℹ️ सीकर वाचना में कवि-छाप "विप्लव" है (*"चरण शरण विप्लव पड़े"*), और वही छाप खाटू श्याम अष्टक में तीन बार आती है — दोनों के एक ही कवि की होने का संकेत। अनुमान है, प्रमाण नहीं। · ⚠️ `deityId` सुधारा गया — पहले "krishna" था, अब "khatu-shyam"। खाटू श्याम बर्बरीक हैं (घटोत्कच के पुत्र, भीम के पौत्र); कृष्ण ने उन्हें अपना *नाम* दिया, पहचान नहीं। · ⚠️ `festivalIds` सुधारा गया — पहले "janmashtami" था, अब "ekadashi"। जन्माष्टमी कृष्ण का पर्व है, खाटू श्याम का नहीं।
रचयिताअज्ञात (परंपरा से प्रचलित)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

संपादकीय टिप्पणी: खाटू श्याम चालीसा की एक से अधिक वाचनाएँ प्रचलित हैं — कम से कम तीन। यहाँ वह वाचना दी गई है जिसके दो स्वतंत्र प्रकाशित साक्ष्य मिले — *"श्री गुरु चरणन ध्यान धर… रच चौपाई छंद"*, पहली चौपाई *"श्याम-श्याम भजि बारंबारा"*। दूसरी वाचना *"श्री गुरु चरण ध्यान धरि… रचि चालीस छंद"* से आरंभ होती है, और तीसरी — सीकर वाचना — *"श्री गुरु पदरज शीशधर प्रथम सुमिरू गणेश"* से। तीनों प्रचलित हैं; किसी को "ग़लत" कहकर छोड़ा नहीं गया। ध्यान देने योग्य बात — सीकर वाचना के मंगल-दोहे में कवि-छाप "विप्लव" मिलती है (*"चरण शरण विप्लव पड़े"*), और वही छाप खाटू श्याम अष्टक में तीन बार आती है; इससे दोनों के एक ही कवि की होने का संकेत मिलता है — अनुमान है, प्रमाण नहीं। इस पृष्ठ पर पहले हुए दो सुधार यथावत हैं: `deityId` "krishna" से "khatu-shyam" (खाटू श्याम बर्बरीक हैं — घटोत्कच के पुत्र व भीम के पौत्र; कृष्ण ने उन्हें अपना *नाम* दिया, पहचान नहीं), और `festivalIds` "janmashtami" से "ekadashi"।

देव परिचय

श्री खाटू श्याम

Khatu Shyam Ji (Barbarik)

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

देवता वर्गशरणागत रक्षा · त्याग व बलिदान · मनोकामना पूर्ति · हारे का सहारा
वाहननीला घोड़ा
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