समय
2–3 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
श्री कृष्णाष्टकम् श्रीकृष्ण की स्तुति का नौ श्लोकों वाला स्तोत्र है — आठ स्तुति-श्लोक तथा एक फलश्रुति। परंपरा में इसे आदि शंकराचार्य का कहा जाता है, यद्यपि स्रोतों में इस पर मतभेद है। ध्यान रहे कि इस नाम से एक से अधिक भिन्न रचनाएँ प्रचलित हैं।
FAQ
श्री कृष्णाष्टकम् — सामान्य प्रश्न
यह एक पूरे अष्टक का पहला श्लोक है। अधिकांश लोग इसे अकेला ही जानते हैं क्योंकि यह इतना प्रसिद्ध है कि प्रायः स्वतंत्र प्रार्थना की तरह गाया जाता है — किंतु इसके बाद सात श्लोक और हैं, जो श्रीकृष्ण के स्वरूप का क्रमशः वर्णन करते हैं, और सभी "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्" पर समाप्त होते हैं।
हाँ, और यह भ्रम का बड़ा कारण है। "कृष्णाष्टकम्" नाम से कम से कम दो अलग स्तोत्र प्रचलित हैं — एक यह, जो "वसुदेवसुतं देवं" से आरंभ होता है; और दूसरा "भजे व्रजैकमण्डनं" से आरंभ होने वाला। ये एक ही पाठ के भेद नहीं, बल्कि दो अलग रचनाएँ हैं। यह पृष्ठ पहले वाले का है।
परंपरा में इसे आदि शंकराचार्य की रचना बताया जाता है, किंतु यहाँ यह निश्चित रूप में नहीं कहा जा सकता। चार स्रोतों में से दो शंकराचार्य का नाम देते हैं, जबकि दो इसे "परंपरागत" कहकर बिना किसी रचयिता के छापते हैं। इसलिए यहाँ attribution को परंपरागत बताया गया है, अंतिम निर्णय के रूप में नहीं।
अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है। नौवाँ श्लोक "कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं" फलश्रुति है, जो पाठ का फल बताता है और प्रायः साथ ही छापा जाता है। यहाँ वह अलग से चिह्नित करके दिया गया है।
जगद्गुरु अर्थात समस्त जगत् के गुरु। यह संबोधन विशेष रूप से सार्थक है क्योंकि श्रीकृष्ण ने ही अर्जुन को गीता का उपदेश दिया — वे केवल आराध्य नहीं, शिक्षक भी हैं। इसीलिए हर श्लोक वंदना पर नहीं, गुरु-वंदना पर समाप्त होता है।
दूसरे श्लोक में "अतसीपुष्पसंकाशं" आता है — अतसी अर्थात अलसी (सन) का फूल, जो हल्के नीले रंग का होता है। संस्कृत काव्य में श्रीकृष्ण के श्यामल-नील वर्ण के लिए यह पारंपरिक उपमा है। पाँचवें श्लोक में इसी भाव को "नीलजीमूत" यानी नील मेघ की उपमा से दोहराया गया है।
हाँ, यह इसके लिए विशेष उपयुक्त है। इसका छंद अनुष्टुप् है — आठ अक्षरों की सरल चाल — जिससे यह कृष्ण के अष्टकों में कंठस्थ करने योग्य सबसे सुगम है। अच्युताष्टकम् व जगन्नाथाष्टकम् के छंद इससे कहीं लंबे व कठिन हैं।
फलश्रुति स्वयं "प्रातरुत्थाय" कहती है — प्रातःकाल उठकर। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी तथा बुधवार को इसका विशेष महत्व माना जाता है।
और अष्टकम्
संबंधित अष्टकम्
पर्व
