श्री कृष्णाष्टकम्

śrī kṛṣṇāṣṭakam

Shri Krishnashtakam (Vasudeva Sutam Devam)

समय
2–3 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)

श्री कृष्णाष्टकम् श्रीकृष्ण की स्तुति का नौ श्लोकों वाला स्तोत्र है — आठ स्तुति-श्लोक तथा एक फलश्रुति। परंपरा में इसे आदि शंकराचार्य का कहा जाता है, यद्यपि स्रोतों में इस पर मतभेद है। ध्यान रहे कि इस नाम से एक से अधिक भिन्न रचनाएँ प्रचलित हैं।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: आठ अनुष्टुप् श्लोक तथा एक फलश्रुति; "वसुदेवसुतं देवं" से आरंभ

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री कृष्णाष्टकम्
IASTśrī kṛṣṇāṣṭakam
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतआठ अनुष्टुप् श्लोक तथा एक फलश्रुति; "वसुदेवसुतं देवं" से आरंभ
शुभ दिनबुधवार; जन्माष्टमी
पाठ समय2–3 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री कृष्णाष्टकम् आठ अनुष्टुप् श्लोकों का स्तोत्र है जिसका प्रत्येक श्लोक "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्" — "उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ" — पर समाप्त होता है। इसका पहला श्लोक "वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्" भारत के सर्वाधिक गाए जाने वाले श्लोकों में है।

अधिकांश लोग इस पहले श्लोक को ही जानते हैं और उसे एक स्वतंत्र प्रार्थना मानकर पढ़ते हैं। वस्तुतः वह एक पूरे अष्टक का आरंभ है, और शेष सात श्लोक श्रीकृष्ण के स्वरूप का क्रमशः चित्र खींचते हैं — अलसी के नीले पुष्प जैसी कांति, पूर्णचंद्र-सा मुख, मोरपंख की चूड़ा, नील मेघ जैसी छवि, पीतांबर, तुलसी की गंध, श्रीवत्स का चिह्न और शंख-चक्र।

छंद अनुष्टुप् है — आठ अक्षरों की सरल चाल — इसीलिए यह कृष्ण के अष्टकों में कंठस्थ करने के लिए सबसे सुगम है। एक सावधानी: "कृष्णाष्टकम्" नाम से दो अलग स्तोत्र प्रचलित हैं; यह "वसुदेवसुतं देवं" वाला है, "भजे व्रजैकमण्डनं" वाला दूसरा है।

संपूर्ण अष्टकम्

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वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

वसुदेव के पुत्र, देव-स्वरूप, कंस तथा चाणूर का मर्दन करने वाले एवं माता देवकी को परम आनंद देने वाले — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

अतसीपुष्पसंकाशं हारनूपुरशोभितम्। रत्नकङ्कणकेयूरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जिनकी कांति अलसी के नीले पुष्प के समान है, जो हार व नूपुरों से सुशोभित हैं, तथा जो रत्नजड़ित कंकण व केयूर धारण किए हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

कुटिलालकसंयुक्तं पूर्णचन्द्रनिभाननम्। विलसत्कुण्डलधरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जो घुँघराली अलकों से युक्त हैं, जिनका मुख पूर्ण चंद्रमा के समान है, तथा जो झिलमिलाते कुंडल धारण किए हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

मन्दारगन्धसंयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजम्। बर्हिपिञ्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जो मंदार पुष्प की सुगंध से युक्त हैं, जिनकी हँसी मनोहर है, जो चतुर्भुज हैं, तथा जिनके शीश पर मोरपंख की चूड़ा शोभित है — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

उत्फुल्लपद्मपत्राक्षं नीलजीमूतसन्निभम्। यादवानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जिनके नेत्र खिले हुए कमल-दल के समान हैं, जिनकी छवि नील मेघ जैसी है, तथा जो यादवों के शिरोमणि रत्न हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

रुक्मिणीकेलिसंयुक्तं पीताम्बरसुशोभितम्। अवाप्ततुलसीगन्धं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जो रुक्मिणी के साथ क्रीड़ा-रत हैं, जो पीतांबर से सुशोभित हैं, तथा जिन्हें तुलसी की सुगंध प्राप्त है — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

गोपिकानां कुचद्वन्द्वकुङ्कुमाङ्कितवक्षसम्। श्रीनिकेतं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जिनका वक्षःस्थल रासलीला में गोपियों के अंग-लगे कुंकुम से अंकित हो गया है, जो लक्ष्मी के निवास हैं तथा महान धनुर्धर हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

श्रीवत्साङ्कं महोरस्कं वनमालाविराजितम्। शङ्खचक्रधरं देवं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

जिनके वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न है, जिनका वक्षःस्थल विशाल है, जो वनमाला से विराजित हैं, तथा जो शंख व चक्र धारण करने वाले देव हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। कोटिजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

जो प्रातःकाल उठकर इस पुण्यमय कृष्णाष्टक का पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं। (यह फलश्रुति है — अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है।)

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अर्थ (हिन्दी)

  1. वसुदेव के पुत्र, देव-स्वरूप, कंस तथा चाणूर का मर्दन करने वाले एवं माता देवकी को परम आनंद देने वाले — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  2. जिनकी कांति अलसी के नीले पुष्प के समान है, जो हार व नूपुरों से सुशोभित हैं, तथा जो रत्नजड़ित कंकण व केयूर धारण किए हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  3. जो घुँघराली अलकों से युक्त हैं, जिनका मुख पूर्ण चंद्रमा के समान है, तथा जो झिलमिलाते कुंडल धारण किए हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  4. जो मंदार पुष्प की सुगंध से युक्त हैं, जिनकी हँसी मनोहर है, जो चतुर्भुज हैं, तथा जिनके शीश पर मोरपंख की चूड़ा शोभित है — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  5. जिनके नेत्र खिले हुए कमल-दल के समान हैं, जिनकी छवि नील मेघ जैसी है, तथा जो यादवों के शिरोमणि रत्न हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  6. जो रुक्मिणी के साथ क्रीड़ा-रत हैं, जो पीतांबर से सुशोभित हैं, तथा जिन्हें तुलसी की सुगंध प्राप्त है — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  7. जिनका वक्षःस्थल रासलीला में गोपियों के अंग-लगे कुंकुम से अंकित हो गया है, जो लक्ष्मी के निवास हैं तथा महान धनुर्धर हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  8. जिनके वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न है, जिनका वक्षःस्थल विशाल है, जो वनमाला से विराजित हैं, तथा जो शंख व चक्र धारण करने वाले देव हैं — उन जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
  9. जो प्रातःकाल उठकर इस पुण्यमय कृष्णाष्टक का पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं। (यह फलश्रुति है — अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है।)

लाभ

  • फलश्रुति के अनुसार प्रातःकाल पाठ करने से करोड़ों जन्मों के पाप स्मरण मात्र से नष्ट होते हैं।
  • अनुष्टुप् छंद व आठ अक्षरों की सरल चाल के कारण कृष्ण के अष्टकों में कंठस्थ करने योग्य सबसे सुगम।
  • प्रत्येक श्लोक श्रीकृष्ण के स्वरूप का एक अंग दिखाता है, इसलिए यह ध्यान के लिए भी उपयुक्त है।
  • प्रसिद्ध प्रथम श्लोक के साथ शेष सात भी सीख लेने पर नित्य वंदना पूर्ण हो जाती है।

कब करें पाठ

प्रातःकाल उठकर — फलश्रुति स्वयं यही कहती हैजन्माष्टमी परबुधवार कोनित्य कृष्ण-वंदना में

पाठ विधि

प्रातःकाल स्नान के पश्चात श्रीकृष्ण के समक्ष बैठकर आठों श्लोकों का क्रम से पाठ करें और अंत में फलश्रुति पढ़ें। प्रत्येक श्लोक में वर्णित स्वरूप-अंग का मन में दर्शन करते चलें, तथा "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्" पर मस्तक झुकाएँ। छंद सरल है, इसलिए इसे बालकों को कंठस्थ कराना भी सुगम है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
स्रोत परंपराjkyog.in — Krishnashtkam "Vasudeva Sutam Devam" (देवनागरी, श्लोक 1–8) · astrosage.com — Krishna Ashtakam (श्लोक 1–8 तथा फलश्रुति "कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं" पूर्ण रूप में) · bhajansangrah.in तथा shrinathdham.com — दोनों स्वतंत्र रूप से 8 + फलश्रुति = 9 की संरचना की पुष्टि करते हैं · रचयिता: jkyog व astrosage आदि शंकराचार्य बताते हैं; bhajansangrah व shrinathdham बिना नाम के "परंपरागत" छापते हैं — मतभेद दर्ज है, निर्णय नहीं सुनाया गया। · वर्तनी: संयुक्तं व कुचद्वन्द्व (मानक रूप) लिए गए, जहाँ एक स्रोत सम्युक्तं / कुचद्वन्द छापता है।
रचयितापरंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य (स्रोतों में मतभेद)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है; नौवाँ श्लोक फलश्रुति है, जिसे प्रायः साथ ही छापा जाता है और यहाँ अलग से चिह्नित करके दिया गया है। रचयिता को लेकर स्रोत बँटे हुए हैं — दो आदि शंकराचार्य का नाम देते हैं, दो इसे परंपरागत रचना कहकर बिना नाम के छापते हैं; इसलिए यहाँ attribution को "परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य" लिखा गया है, निश्चित रूप में नहीं।

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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श्री कृष्णाष्टकम् — सामान्य प्रश्न

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