समय
4–5 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार व एकादशी; जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)रक्षा (Protection)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
अच्युताष्टकम् श्रीविष्णु-कृष्ण की स्तुति का स्तोत्र है, जिसका श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है। नाम "अष्टक" है, किंतु इसमें नौ श्लोक मिलते हैं — आठ स्तुति तथा एक फलश्रुति। प्रत्येक श्लोक भगवान के विविध नामों को माला-सा पिरोता चलता है।
FAQ
अच्युताष्टकम् — सामान्य प्रश्न
इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। तीनों प्रामाणिक स्रोत — greenmesg, भक्ति भारत तथा स्तोत्र-रत्नावली — एकमत से उन्हीं को रचयिता बताते हैं।
नाम "अष्टक" है, किंतु प्रचलित पाठ नौ श्लोकों का है — आठ स्तुति के तथा नौवाँ फलश्रुति का, जो स्वयं स्तोत्र का नाम लेता है ("अच्युतस्याष्टकं यः पठेत्")। तीनों स्रोत नौ ही श्लोक देते हैं। यह विसंगति नहीं है; अनेक अष्टकों में स्तुति के आठ श्लोकों के बाद एक फलश्रुति जोड़ी जाती है।
"अच्युत" का अर्थ है — जो कभी अपने स्वरूप से च्युत न हो, अर्थात अटल, अविनाशी, जिसका कभी पतन न हो। यही नाम स्तोत्र का शीर्षक भी है और उसका मूल भाव भी।
दोनों का — और यही इसकी विशेषता है। पहला ही श्लोक "गोपिकावल्लभं" (कृष्ण) और "जानकीनायकं" (राम) को एक साथ जोड़ता है। पाँचवाँ श्लोक पूर्णतः राम की लीलाओं का है — दंडकारण्य, लक्ष्मण, वानर, अगस्त्य — और छठा पूर्णतः कृष्ण की — धेनुक, अरिष्ट, केशी, पूतना तथा यमुना-तट की क्रीड़ा। शंकराचार्य का भाव यही है कि नाम अनेक हैं, तत्त्व एक।
प्रातः अथवा संध्या पूजा में नित्य पाठ किया जा सकता है। जन्माष्टमी, रामनवमी तथा एकादशी पर इसका विशेष महत्व माना जाता है। फलश्रुति स्वयं "प्रत्यहं" अर्थात प्रतिदिन पाठ का निर्देश देती है।
नौवाँ श्लोक (फलश्रुति) कहता है कि जो प्रेमपूर्वक तथा उत्कंठा सहित प्रतिदिन इसका पाठ करता है, विश्वम्भर श्रीहरि शीघ्र ही उसके वश में हो जाते हैं। यह परंपरागत मान्यता है।
छठे श्लोक में बाल गोपाल की छह बातें आती हैं — धेनुकासुर व अरिष्टासुर का वध, केशी का वध, कंस का हृदय हर लेना, वंशी वादन, पूतना पर कोप, तथा "सूरजा" (सूर्यपुत्री यमुना) के तट पर क्रीड़ा। "सूरजा" यमुना का ही एक नाम है, क्योंकि वे सूर्य की पुत्री मानी जाती हैं।
हाँ। यह स्तोत्र सरल लय व नाम-मालाओं से बना है, इसमें कोई जटिल विधि अथवा दीक्षा अपेक्षित नहीं है। इसकी सरलता के कारण इसे बालकों को कंठस्थ कराने की परंपरा भी है।
हाँ, कुछ छोटे भेद मिलते हैं। तीसरे श्लोक में कुछ संस्करण "रुक्मिणि" छापते हैं तथा कुछ "रुक्मिणी"; पाँचवें श्लोक में "अगस्त्य" के स्थान पर संक्षिप्त "अगस्त" तथा "वानरैः" के स्थान पर "वानरौः" भी मिलता है। यहाँ नाम के शुद्ध रूप (रुक्मिणी, अगस्त्य) तथा व्याकरण-सम्मत रूप (वानरैः, राघवः) रखे गए हैं, और भेद यहीं दर्ज कर दिया गया है।
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