श्री गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्
śrī govinda dāmodara stotram
Shri Govinda Damodara Stotram
श्री गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् बिल्वमंगलाचार्य (लीलाशुक) विरचित 71 श्लोकों का स्तोत्र है। इसकी पहचान इसका ध्रुवपद है — प्रत्येक श्लोक "गोविन्द दामोदर माधवेति" पर समाप्त होता है। यही पुनरावृत्ति इसे कीर्तन तथा सामूहिक गायन के लिए विशेष उपयुक्त बनाती है।
परिचय
श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।
स्रोत: रचयिता श्रीबिल्वमङ्गलाचार्य (लीलाशुक) — सम्पूर्ण 71 श्लोक
एक नज़र में
| मंत्र / पाठ | श्री गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् |
|---|---|
| IAST | śrī govinda dāmodara stotram |
| देवता | श्री कृष्ण |
| मूल स्रोत | रचयिता श्रीबिल्वमङ्गलाचार्य (लीलाशुक) — सम्पूर्ण 71 श्लोक |
| शुभ दिन | जन्माष्टमी; एकादशी; नित्य नाम-स्मरण |
| पाठ समय | 25–30 मिनट |
| कठिनाई | मध्यम (दीर्घ, किंतु लय सरल) |
उद्भव / पृष्ठभूमि
श्री गोविन्द दामोदर स्तोत्रम् बिल्वमंगलाचार्य (लीलाशुक) की रचना है, जिसके इकहत्तर श्लोकों में से प्रत्येक एक ही टेक पर आकर समाप्त होता है — "गोविन्द दामोदर माधवेति"। यह स्तुति नहीं, नाम-स्मरण का महाकाव्य है।
इसकी रचना-विधि अनूठी है। कवि स्वयं भगवान को नहीं पुकारता; वह उन क्षणों को गिनाता है जब किसी और ने पुकारा। भरी सभा में द्रौपदी ने पुकारा; दही बेचने निकली गोपी मोहवश "दही लो" के स्थान पर यही बोल गई; ऊखल से बँधा बालक धीरे-धीरे रोया; ग्राह के मुँह में फँसे गजेंद्र ने पुकारा; लंका में बंदी सीता ने पुकारा। इस प्रकार पूरा स्तोत्र उन आवाज़ों का संग्रह बन जाता है जिन्होंने संकट में यही नाम लिया।
अट्ठावनवें श्लोक से स्वर बदल जाता है। वहाँ से टेक बन जाती है — "जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव", अर्थात "हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर"। कवि कथाओं से हटकर अपनी ही जीभ से बात करने लगता है।
छप्पनवाँ श्लोक इस स्तोत्र का सबसे प्रसिद्ध है: "सुख के अंत में यही सार है, दुःख के अंत में यही गाने योग्य, और देह के अंत में यही जपने योग्य।"
संपूर्ण स्तोत्र
अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा। कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
कौरवों तथा पांडवों के समक्ष जब दुःशासन ने द्रौपदी के वस्त्र व केश खींचे, तब अनन्य-शरणा द्रौपदी ने यही पुकार लगाई — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे। त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे श्रीकृष्ण! हे विष्णु! हे मधु-कैटभ के शत्रु! हे भक्तों पर करुणा करने वाले भगवन्! हे मुरारि! हे केशव! हे लोकनाथ! मेरी रक्षा कीजिए — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
विक्रेतुकामा किल गोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः। दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति॥
दही आदि बेचने निकली गोपकन्या का चित्त मुरारि के चरणों में ऐसा लगा था कि मोहवश वह "दही लो" के स्थान पर यही पुकार बैठी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च सङ्घट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः। गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
ऊखल में भरे चावलों को मूसल से कूटती हुईं, अनुराग से भरी मुग्ध गोपियाँ गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
काचित्कराम्भोजपुटे निषण्णं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम्। अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति॥
किसी कमलनयनी गोपी ने अपने कर-कमल पर बैठे, किंशुक-सी लाल चोंच वाले पालतू शुक को यही बोलना सिखाया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गृहे गृहे गोपवधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम्। स्खलद्गिरां वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति॥
घर-घर में गोप-वधुओं के समूह पिंजरों में बंद मैनाओं को, जो अभी तुतलाती हैं, हर क्षण यही बुलवाने में लगे रहते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
पर्यङ्किकाभाजमलं कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिलगोपकन्याः। जगुः प्रबन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
पालने में लेटे बालक को सुलाती हुईं समस्त गोपकन्याएँ स्वर व ताल में बँधा यही गीत गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
रामानुजं वीक्षणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम्। आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
बलराम के छोटे भाई, चंचल दृष्टि से खेलते बालक को माखन का गोला हाथ में लेकर गोपी ने पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहि वक्त्राम्बुजराजहंसि। सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे विचित्र वर्णों व आभूषणों से सुंदर, हे मुख-कमल की राजहंसी रसना! तू मेरे मुख के अग्र-रंगमंच पर सदा यही उच्चारण कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
अङ्काधिरूढं शिशुगोपगूढं स्तनं धयन्तं कमलैककान्तम्। सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
गोद में चढ़े, ग्वाल-शिशुओं में छिपे, स्तनपान करते तथा लक्ष्मी के एकमात्र प्रियतम को यशोदा ने प्रसन्नतापूर्वक यही कहकर पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
क्रीडन्तमन्तर्व्रजमात्मजं स्वं समं वयस्यैः पशुपालबालैः। प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
व्रज के भीतर अपने समवयस्क ग्वाल-बालों के साथ खेलते अपने पुत्र कृष्ण को यशोदा ने प्रेमपूर्वक पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमानः। रुरोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवेति॥
यशोदा द्वारा ऊखल से रस्सी में कसकर बाँधे जाते हुए माखनचोर धीरे-धीरे रोते हुए बोले — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
निजाङ्गणे कङ्कणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम्। आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति॥
अपने आँगन में कंगन से खेलते चंचल बालक को माखन का गोला दिखाकर गोपी ने हथेली से उसकी आँखें मलते हुए कहा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे। पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
घर-घर में गोप-वधुओं के समूह मिलकर, एकत्र होकर, नित्य ये पुण्य नाम पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
मन्दारमूले वदनाभिरामं बिम्बाधरे पूरितवेणुनादम्। गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
मंदार वृक्ष के नीचे, मनोहर मुख वाले, बिंबा-से अधरों पर वेणु का नाद भरे, गौओं-ग्वालों-गोपियों के बीच विराजमान — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदासुतबालकेलिम्। गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति॥
रात्रि के पिछले प्रहर में उठकर, यशोदा-नंदन की बाल-लीलाओं का स्मरण करती हुईं गोपियाँ दही मथते-मथते ऊँचे स्वर में गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती। उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति॥
घर में माखन का पिंड खाया गया या किसी को दे दिया गया — इस संशय में पड़ी यशोदा ने कहा, "हे मुरारि! सच बता" — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्थ। गायन्ति गोप्योऽथ सखीसमेता गोविन्द दामोदर माधवेति॥
घर की पूजा-अर्चना करके, प्रेम के बढ़ते प्रवाह में डूबी युवती ने दही मथा; और सखियों सहित गोपियाँ गाने लगीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
क्वचित् प्रभाते दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम्। आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति॥
किसी प्रभात में दही से भरे पात्र में मथानी डालकर, मुकुंद को निहारती हुई युवती अनेक प्रकार से यही गान करती है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
क्रीडापरं भोजनमज्जनार्थं हितैषिणी स्त्री तनुजं यशोदा। आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति॥
खेल में लगे अपने पुत्र को भोजन व स्नान के लिए हितैषिणी यशोदा ने, प्रेम से भरे नेत्रों सहित, पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः। तेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति॥
अपने धाम में सुखपूर्वक शयन करते विष्णु की शरण में देवर्षि आदि प्रमुख मुनि जाते हैं, और उसी से अच्युत में तन्मय हो जाते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः। वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
अरुणोदय के समय निद्रा त्यागकर, नित्यकर्म पूरे करके, श्रेष्ठ विप्र वेद-पाठ के अंत में नित्य यही पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम्। राधां जगुः साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति॥
वृंदावन में गोविंद के वियोग से खिन्न राधा को देखकर ग्वाल-गण तथा गोपियाँ अश्रुपूर्ण नेत्रों से गाने लगे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थं तनयं यशोदा। प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
प्रातःकाल गौएँ चरने निकल गईं; उनकी रक्षा के लिए यशोदा ने अपने पुत्र को हथेली से धीरे-धीरे जगाया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
प्रवालशोभा इव दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः। मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति॥
मूँगे-सी शोभा वाले लंबे केश धारण किए, केवल वायु, जल व पत्ते खाकर पवित्र देह वाले मुनि वृक्षों के नीचे बैठकर यही पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः। विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
इस प्रकार कहती हुईं, विरह से अत्यंत आतुर, कृष्ण में आसक्त चित्त वाली व्रज-स्त्रियाँ लज्जा त्यागकर सुस्वर में रो पड़ीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोपी कदाचिन्मणिपञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता। आनन्दकन्द व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति॥
किसी समय गोपी मणि-पिंजर में बैठे शुक से बुलवाने में लगी — "हे आनंदकंद! हे व्रजचंद्र! हे कृष्ण! गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोवत्सबालैः शिशुकाकपक्षं बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम्। उवाच माता चिबुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
बछड़ों व ग्वाल-शिशुओं के साथ शिखा बाँधते हुए, कमलदल-से विशाल नेत्रों वाले पुत्र की ठुड्डी पकड़कर माता ने कहा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
प्रभातकाले वरवल्लवौघा गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डाः। आकारयामासुरनन्तमाद्यं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
प्रातःकाल श्रेष्ठ ग्वालों के समूह गौओं की रक्षा हेतु छड़ी हाथ में लिए उस आदि-अनंत को पुकारने लगे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः। गोपाङ्गनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जब मुरारि कालिय-मर्दन के लिए कदंब वृक्ष से जलाशय में कूदे, तब गोपियाँ व ग्वाले दौड़कर चीत्कार कर उठे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
अक्रूरमासाद्य यदा मुकुन्दश्चापोत्सवार्थं मथुरां प्रविष्टः। तदा स पौरैर्जयसीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माधवेति॥
अक्रूर के साथ जब मुकुंद धनुष-यज्ञ के लिए मथुरा में प्रविष्ट हुए, तब नगरवासियों ने "जय हो" कहकर उद्घोष किया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
कंसस्य दूतेन यदैव नीतौ वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसूनू। रुरोद गोपी भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जब कंस का दूत वसुदेव के दोनों पुत्रों को वृंदावन से ले गया, तब गोपी अपने भवन के भीतर रो पड़ी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
सरोवरे कालियनागबद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य। चक्रुर्लुठन्त्यः पथि गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति॥
सरोवर में कालिय नाग द्वारा जकड़े यशोदा-नंदन को सुनकर गोप-बालाएँ मार्ग में लोटती हुईं पुकारने लगीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
अक्रूरयाने यदुवंशनाथं सङ्गच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य। ऊचुर्वियोगत् किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति॥
अक्रूर के रथ पर यदुवंश-नाथ को मथुरा जाते देखकर, वियोग से व्याकुल गोप-बालाएँ बोल उठीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
चक्रन्द गोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना। प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति॥
कमल-वन के छोर पर पुष्पों की शय्या पर लेटी, कृष्ण से बिछुड़ी गोपी खिले नील-कमल जैसे नेत्रों से रोती हुई बोली — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
मातापितृभ्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललाप गोपी। आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति॥
माता-पिता से घिरी हुई गोपी घर में प्रविष्ट होकर विलाप करने लगी — "हे विश्वनाथ! आकर मेरी रक्षा कीजिए — गोविन्द! दामोदर! माधव!"
वृन्दावनस्थं हरिमाशु बुद्ध्वा गोपी गता कापि वनं निशायाम्। तत्राप्यदृष्ट्वाऽतिभयादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हरि को वृंदावन में जानकर कोई गोपी रात्रि में शीघ्र वन को गई; वहाँ भी उन्हें न देखकर अत्यंत भय से बोल उठी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः। ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जो मनुष्य अपने घर में सुखपूर्वक शयन करते हुए भी विष्णु के नामों का उच्चारण करते हैं, वे निश्चय ही उन्हीं में तन्मय हो जाते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
सा नीरजाक्षीमवलोक्य राधां रुरोद गोविन्दवियोगखिन्नाम्। सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति॥
गोविंद के वियोग से खिन्न कमलनयनी राधा को देखकर सखी खिले कमल जैसे नेत्रों से रो पड़ी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि। आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे रस जानने वाली जिह्वा! तू मधुर की प्रेमी है; मैं तुझे सत्य और परम हित की बात कहता हूँ — इन मधुर अक्षरों का ही उच्चारण कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सकं वेदविदो वदन्ति। संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
वेदज्ञ कहते हैं कि यह मनुष्यों की आत्यंतिक व्याधि हरने वाला चिकित्सक है और संसार के तीनों तापों के नाश का बीज है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
ताताज्ञया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते। चक्रन्द रामस्य निजा जनित्री गोविन्द दामोदर माधवेति॥
पिता की आज्ञा से जब रामचंद्र लक्ष्मण व सीता सहित वन को गए, तब राम की अपनी माता रो पड़ीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
एकाकिनी दण्डककाननान्तात् सा नीयमाना दशकन्धरेण। सीता तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति॥
दंडक वन से अकेली, रावण द्वारा हरी जाती हुई अनन्य-शरणा सीता तब क्रंदन कर उठीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम्। रुरोद सीता रघुनाथ पाहि गोविन्द दामोदर माधवेति॥
राम से बिछुड़ी जनकनंदिनी सीता हृदय में राम का रूप चिंतन करती हुई रोईं — "हे रघुनाथ! रक्षा कीजिए — गोविन्द! दामोदर! माधव!"
प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ सुरासुराणां सुखदुःखहेतो। रुरोद सीता तु समुद्रमध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति॥
"हे विष्णु! हे रघुवंश-नाथ! हे देव-दानवों के सुख-दुःख के हेतु! प्रसन्न होइए" — समुद्र के मध्य (लंका में) सीता रोती हुई बोलीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
अन्तर्जले ग्राहगृहीतपादो विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः। तदा गजेन्द्रो नितरां जगाद गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जल के भीतर ग्राह द्वारा पकड़े गए चरण वाले, तथा जिसके सभी बंधु थककर छोड़ चुके थे, उस गजेंद्र ने तब अत्यंत आर्त होकर पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
हंसध्वजः शङ्खयुतो ददर्श पुत्रं कटाहे प्रतपन्तमेनम्। पुण्यानि नामानि हरेर्जपन्तं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
राजा हंसध्वज ने अपने पुत्र को खौलते कड़ाह में तपते हुए भी हरि के पुण्य नामों का जप करते देखा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चाब्रवीत् काननवासिनीशम्। अन्तः प्रविष्टं मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
दुर्वासा का वचन सुनकर द्रौपदी ने वन-वासियों के ईश को मन ही मन भीतर से पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयः चिन्ताहरश्चिन्तितपारिजातः। कस्तूरिकाकल्पितनीलवर्णो गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जो योगियों द्वारा सदा ध्येय हैं, अप्रमेय हैं, चिंता हरने वाले तथा चिंतित मनोरथ पूर्ण करने वाले पारिजात हैं, कस्तूरी-सा नील वर्ण जिनका है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते। करावलम्बं मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवेति॥
मोह के अंधकार से भरे, विषयों से तप्त, अत्यंत गहरे संसार-कूप में गिरे हुए मुझको हे विष्णु! हाथ का सहारा दीजिए — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै जिह्वे रसज्ञे सुलभं मनोज्ञम्। द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः प्रजप्तं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे रसज्ञ जिह्वा! भव-बंधन से मुक्ति हेतु इस सुलभ व मनोहर मंत्र का भजन कर, जिसे व्यास आदि मुनियों ने जपा है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते। वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे जिह्वा! मैं तुझसे ही याचना करता हूँ — जब दंडधारी यमराज सामने आएँ, तब मुझे यही मधुर वचन भक्तिपूर्वक कहने देना — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो। उच्चस्वरैस्त्वं वद सर्वदैव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे गोपाल! हे वंशीधर! हे रूप के सागर! हे लोकेश! हे नारायण! हे दीनबंधु! — तू सदा ऊँचे स्वर में यही कह — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि। समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे जिह्वा! सदा इसी प्रकार कृष्ण के सुंदर व मनोहर नामों का भजन कर, जो समस्त भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण। गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति॥
गोविंद! गोविंद! हे हरि! हे मुरारि! गोविंद! गोविंद! हे मुकुंद! हे कृष्ण! गोविंद! गोविंद! हे चक्रपाणि! — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम्। देहावसाने त्विदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति॥
सुख के अंत में यही सार है, दुःख के अंत में यही गाने योग्य है, और देह के अंत में यही जपने योग्य है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (यह इस स्तोत्र का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है।)
दुर्वारवाक्यं परिगृह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथञ्चित्। सभां प्रविष्टा मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
दुर्निवार आदेश को स्वीकार कर, हिरनी-सी भयभीत द्रौपदी किसी प्रकार सभा में प्रविष्ट हुईं और मन ही मन पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे श्रीकृष्ण! हे राधावर! हे गोकुलेश! हे गोपाल! हे गोवर्धन-नाथ! हे विष्णु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (यहाँ से टेक बदल जाती है।)
श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे श्रीनाथ! हे विश्वेश्वर! हे विश्वमूर्ते! हे देवकीनंदन! हे दैत्यों के शत्रु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे गोपीपति! हे कंस के शत्रु! हे मुकुंद! हे लक्ष्मीपति! हे केशव! हे वासुदेव! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
गोपीजनाह्लादकर व्रजेश गोचारणारण्यकृतप्रवेश। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे गोपीजनों को आह्लादित करने वाले! हे व्रजेश! हे गौ-चराने के लिए वन में प्रवेश करने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
प्राणेश विश्वम्भर कैटभारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे प्राणेश! हे विश्वम्भर! हे कैटभ के शत्रु! हे वैकुंठ! हे नारायण! हे चक्रपाणि! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीतावर रावणारे। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे हरि! हे मुरारि! हे आदि मधुसूदन! हे श्रीराम! हे सीतावर! हे रावण के शत्रु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष गोगोपगोपीसुखदानदक्ष। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे यादवेंद्र! हे गोवर्धन धारण करने वाले! हे कमलनयन! हे गौओं, ग्वालों व गोपियों को सुख देने में निपुण! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतबन्धुशेष। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे पृथ्वी का भार उतारने हेतु ग्वाल-वेष धारण करने वाले! हे विहार-लीला में शेषनाग तक को बंधु बना लेने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
बकीबकाघासुरधेनुकारे केशीतृणावर्तविघातदक्ष। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे पूतना, बकासुर, अघासुर व धेनुकासुर के शत्रु! हे केशी व तृणावर्त के वध में निपुण! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे जानकी के जीवन! हे रामचंद्र! हे निशाचरों के शत्रु! हे भरत के अग्रज! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रह्लादबाधाहर हे कृपालो। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे नारायण! हे अनंत! हे हरि! हे नृसिंह! हे प्रह्लाद की बाधा हरने वाले! हे कृपालु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे लीला से मनुष्य-आकृति धारण करने वाले राम-रूप! हे अपने प्रताप से समस्त राजाओं को दास बना लेने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरि! हे मुरारि! हे नाथ! हे नारायण! हे वासुदेव! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (संक्षिप्त संस्करणों में प्रायः यही श्लोक आरंभ में गाया जाता है।)
वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम्। जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति॥
कहने में समर्थ होते हुए भी कोई नहीं कहता — अहो, लोगों का व्यसनों की ओर कैसा झुकाव है! हे जिह्वा, तू तो इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
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अर्थ (हिन्दी)
- कौरवों तथा पांडवों के समक्ष जब दुःशासन ने द्रौपदी के वस्त्र व केश खींचे, तब अनन्य-शरणा द्रौपदी ने यही पुकार लगाई — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे श्रीकृष्ण! हे विष्णु! हे मधु-कैटभ के शत्रु! हे भक्तों पर करुणा करने वाले भगवन्! हे मुरारि! हे केशव! हे लोकनाथ! मेरी रक्षा कीजिए — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- दही आदि बेचने निकली गोपकन्या का चित्त मुरारि के चरणों में ऐसा लगा था कि मोहवश वह "दही लो" के स्थान पर यही पुकार बैठी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- ऊखल में भरे चावलों को मूसल से कूटती हुईं, अनुराग से भरी मुग्ध गोपियाँ गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- किसी कमलनयनी गोपी ने अपने कर-कमल पर बैठे, किंशुक-सी लाल चोंच वाले पालतू शुक को यही बोलना सिखाया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- घर-घर में गोप-वधुओं के समूह पिंजरों में बंद मैनाओं को, जो अभी तुतलाती हैं, हर क्षण यही बुलवाने में लगे रहते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- पालने में लेटे बालक को सुलाती हुईं समस्त गोपकन्याएँ स्वर व ताल में बँधा यही गीत गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- बलराम के छोटे भाई, चंचल दृष्टि से खेलते बालक को माखन का गोला हाथ में लेकर गोपी ने पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे विचित्र वर्णों व आभूषणों से सुंदर, हे मुख-कमल की राजहंसी रसना! तू मेरे मुख के अग्र-रंगमंच पर सदा यही उच्चारण कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- गोद में चढ़े, ग्वाल-शिशुओं में छिपे, स्तनपान करते तथा लक्ष्मी के एकमात्र प्रियतम को यशोदा ने प्रसन्नतापूर्वक यही कहकर पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- व्रज के भीतर अपने समवयस्क ग्वाल-बालों के साथ खेलते अपने पुत्र कृष्ण को यशोदा ने प्रेमपूर्वक पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- यशोदा द्वारा ऊखल से रस्सी में कसकर बाँधे जाते हुए माखनचोर धीरे-धीरे रोते हुए बोले — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- अपने आँगन में कंगन से खेलते चंचल बालक को माखन का गोला दिखाकर गोपी ने हथेली से उसकी आँखें मलते हुए कहा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- घर-घर में गोप-वधुओं के समूह मिलकर, एकत्र होकर, नित्य ये पुण्य नाम पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- मंदार वृक्ष के नीचे, मनोहर मुख वाले, बिंबा-से अधरों पर वेणु का नाद भरे, गौओं-ग्वालों-गोपियों के बीच विराजमान — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- रात्रि के पिछले प्रहर में उठकर, यशोदा-नंदन की बाल-लीलाओं का स्मरण करती हुईं गोपियाँ दही मथते-मथते ऊँचे स्वर में गाती हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- घर में माखन का पिंड खाया गया या किसी को दे दिया गया — इस संशय में पड़ी यशोदा ने कहा, "हे मुरारि! सच बता" — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- घर की पूजा-अर्चना करके, प्रेम के बढ़ते प्रवाह में डूबी युवती ने दही मथा; और सखियों सहित गोपियाँ गाने लगीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- किसी प्रभात में दही से भरे पात्र में मथानी डालकर, मुकुंद को निहारती हुई युवती अनेक प्रकार से यही गान करती है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- खेल में लगे अपने पुत्र को भोजन व स्नान के लिए हितैषिणी यशोदा ने, प्रेम से भरे नेत्रों सहित, पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- अपने धाम में सुखपूर्वक शयन करते विष्णु की शरण में देवर्षि आदि प्रमुख मुनि जाते हैं, और उसी से अच्युत में तन्मय हो जाते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- अरुणोदय के समय निद्रा त्यागकर, नित्यकर्म पूरे करके, श्रेष्ठ विप्र वेद-पाठ के अंत में नित्य यही पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- वृंदावन में गोविंद के वियोग से खिन्न राधा को देखकर ग्वाल-गण तथा गोपियाँ अश्रुपूर्ण नेत्रों से गाने लगे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- प्रातःकाल गौएँ चरने निकल गईं; उनकी रक्षा के लिए यशोदा ने अपने पुत्र को हथेली से धीरे-धीरे जगाया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- मूँगे-सी शोभा वाले लंबे केश धारण किए, केवल वायु, जल व पत्ते खाकर पवित्र देह वाले मुनि वृक्षों के नीचे बैठकर यही पढ़ते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- इस प्रकार कहती हुईं, विरह से अत्यंत आतुर, कृष्ण में आसक्त चित्त वाली व्रज-स्त्रियाँ लज्जा त्यागकर सुस्वर में रो पड़ीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- किसी समय गोपी मणि-पिंजर में बैठे शुक से बुलवाने में लगी — "हे आनंदकंद! हे व्रजचंद्र! हे कृष्ण! गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- बछड़ों व ग्वाल-शिशुओं के साथ शिखा बाँधते हुए, कमलदल-से विशाल नेत्रों वाले पुत्र की ठुड्डी पकड़कर माता ने कहा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- प्रातःकाल श्रेष्ठ ग्वालों के समूह गौओं की रक्षा हेतु छड़ी हाथ में लिए उस आदि-अनंत को पुकारने लगे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- जब मुरारि कालिय-मर्दन के लिए कदंब वृक्ष से जलाशय में कूदे, तब गोपियाँ व ग्वाले दौड़कर चीत्कार कर उठे — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- अक्रूर के साथ जब मुकुंद धनुष-यज्ञ के लिए मथुरा में प्रविष्ट हुए, तब नगरवासियों ने "जय हो" कहकर उद्घोष किया — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- जब कंस का दूत वसुदेव के दोनों पुत्रों को वृंदावन से ले गया, तब गोपी अपने भवन के भीतर रो पड़ी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- सरोवर में कालिय नाग द्वारा जकड़े यशोदा-नंदन को सुनकर गोप-बालाएँ मार्ग में लोटती हुईं पुकारने लगीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- अक्रूर के रथ पर यदुवंश-नाथ को मथुरा जाते देखकर, वियोग से व्याकुल गोप-बालाएँ बोल उठीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- कमल-वन के छोर पर पुष्पों की शय्या पर लेटी, कृष्ण से बिछुड़ी गोपी खिले नील-कमल जैसे नेत्रों से रोती हुई बोली — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- माता-पिता से घिरी हुई गोपी घर में प्रविष्ट होकर विलाप करने लगी — "हे विश्वनाथ! आकर मेरी रक्षा कीजिए — गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हरि को वृंदावन में जानकर कोई गोपी रात्रि में शीघ्र वन को गई; वहाँ भी उन्हें न देखकर अत्यंत भय से बोल उठी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- जो मनुष्य अपने घर में सुखपूर्वक शयन करते हुए भी विष्णु के नामों का उच्चारण करते हैं, वे निश्चय ही उन्हीं में तन्मय हो जाते हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- गोविंद के वियोग से खिन्न कमलनयनी राधा को देखकर सखी खिले कमल जैसे नेत्रों से रो पड़ी — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे रस जानने वाली जिह्वा! तू मधुर की प्रेमी है; मैं तुझे सत्य और परम हित की बात कहता हूँ — इन मधुर अक्षरों का ही उच्चारण कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- वेदज्ञ कहते हैं कि यह मनुष्यों की आत्यंतिक व्याधि हरने वाला चिकित्सक है और संसार के तीनों तापों के नाश का बीज है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- पिता की आज्ञा से जब रामचंद्र लक्ष्मण व सीता सहित वन को गए, तब राम की अपनी माता रो पड़ीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- दंडक वन से अकेली, रावण द्वारा हरी जाती हुई अनन्य-शरणा सीता तब क्रंदन कर उठीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- राम से बिछुड़ी जनकनंदिनी सीता हृदय में राम का रूप चिंतन करती हुई रोईं — "हे रघुनाथ! रक्षा कीजिए — गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- "हे विष्णु! हे रघुवंश-नाथ! हे देव-दानवों के सुख-दुःख के हेतु! प्रसन्न होइए" — समुद्र के मध्य (लंका में) सीता रोती हुई बोलीं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- जल के भीतर ग्राह द्वारा पकड़े गए चरण वाले, तथा जिसके सभी बंधु थककर छोड़ चुके थे, उस गजेंद्र ने तब अत्यंत आर्त होकर पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- राजा हंसध्वज ने अपने पुत्र को खौलते कड़ाह में तपते हुए भी हरि के पुण्य नामों का जप करते देखा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- दुर्वासा का वचन सुनकर द्रौपदी ने वन-वासियों के ईश को मन ही मन भीतर से पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- जो योगियों द्वारा सदा ध्येय हैं, अप्रमेय हैं, चिंता हरने वाले तथा चिंतित मनोरथ पूर्ण करने वाले पारिजात हैं, कस्तूरी-सा नील वर्ण जिनका है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- मोह के अंधकार से भरे, विषयों से तप्त, अत्यंत गहरे संसार-कूप में गिरे हुए मुझको हे विष्णु! हाथ का सहारा दीजिए — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे रसज्ञ जिह्वा! भव-बंधन से मुक्ति हेतु इस सुलभ व मनोहर मंत्र का भजन कर, जिसे व्यास आदि मुनियों ने जपा है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे जिह्वा! मैं तुझसे ही याचना करता हूँ — जब दंडधारी यमराज सामने आएँ, तब मुझे यही मधुर वचन भक्तिपूर्वक कहने देना — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे गोपाल! हे वंशीधर! हे रूप के सागर! हे लोकेश! हे नारायण! हे दीनबंधु! — तू सदा ऊँचे स्वर में यही कह — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे जिह्वा! सदा इसी प्रकार कृष्ण के सुंदर व मनोहर नामों का भजन कर, जो समस्त भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले हैं — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- गोविंद! गोविंद! हे हरि! हे मुरारि! गोविंद! गोविंद! हे मुकुंद! हे कृष्ण! गोविंद! गोविंद! हे चक्रपाणि! — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- सुख के अंत में यही सार है, दुःख के अंत में यही गाने योग्य है, और देह के अंत में यही जपने योग्य है — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (यह इस स्तोत्र का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है।)
- दुर्निवार आदेश को स्वीकार कर, हिरनी-सी भयभीत द्रौपदी किसी प्रकार सभा में प्रविष्ट हुईं और मन ही मन पुकारा — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे श्रीकृष्ण! हे राधावर! हे गोकुलेश! हे गोपाल! हे गोवर्धन-नाथ! हे विष्णु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (यहाँ से टेक बदल जाती है।)
- हे श्रीनाथ! हे विश्वेश्वर! हे विश्वमूर्ते! हे देवकीनंदन! हे दैत्यों के शत्रु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे गोपीपति! हे कंस के शत्रु! हे मुकुंद! हे लक्ष्मीपति! हे केशव! हे वासुदेव! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे गोपीजनों को आह्लादित करने वाले! हे व्रजेश! हे गौ-चराने के लिए वन में प्रवेश करने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे प्राणेश! हे विश्वम्भर! हे कैटभ के शत्रु! हे वैकुंठ! हे नारायण! हे चक्रपाणि! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे हरि! हे मुरारि! हे आदि मधुसूदन! हे श्रीराम! हे सीतावर! हे रावण के शत्रु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे यादवेंद्र! हे गोवर्धन धारण करने वाले! हे कमलनयन! हे गौओं, ग्वालों व गोपियों को सुख देने में निपुण! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे पृथ्वी का भार उतारने हेतु ग्वाल-वेष धारण करने वाले! हे विहार-लीला में शेषनाग तक को बंधु बना लेने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे पूतना, बकासुर, अघासुर व धेनुकासुर के शत्रु! हे केशी व तृणावर्त के वध में निपुण! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे जानकी के जीवन! हे रामचंद्र! हे निशाचरों के शत्रु! हे भरत के अग्रज! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे नारायण! हे अनंत! हे हरि! हे नृसिंह! हे प्रह्लाद की बाधा हरने वाले! हे कृपालु! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे लीला से मनुष्य-आकृति धारण करने वाले राम-रूप! हे अपने प्रताप से समस्त राजाओं को दास बना लेने वाले! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
- हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरि! हे मुरारि! हे नाथ! हे नारायण! हे वासुदेव! — हे जिह्वा, तू इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!" (संक्षिप्त संस्करणों में प्रायः यही श्लोक आरंभ में गाया जाता है।)
- कहने में समर्थ होते हुए भी कोई नहीं कहता — अहो, लोगों का व्यसनों की ओर कैसा झुकाव है! हे जिह्वा, तू तो इसी अमृत का पान कर — "गोविन्द! दामोदर! माधव!"
लाभ
- यह नाम-स्मरण का स्तोत्र है — इसकी टेक ही इसका मंत्र है, इसलिए अर्थ न समझने पर भी इसका पाठ फलदायी माना जाता है।
- छप्पनवाँ श्लोक अंतिम समय के स्मरण के लिए विशेष रूप से पढ़ा जाता है — "देहावसाने त्विदमेव जाप्यं"।
- चालीसवें से चौवनवें श्लोक तक कवि अपनी ही जिह्वा को समझाता है, इसलिए यह जप-साधना की प्रेरणा का पाठ भी है।
- द्रौपदी, गजेंद्र, सीता व प्रह्लाद के प्रसंग इसमें आते हैं — संकट में नाम-स्मरण का बल यही स्तोत्र सबसे विस्तार से दिखाता है।
कब करें पाठ
पाठ विधि
यह लंबा स्तोत्र है, इसलिए इसे एक ही बैठक में पूरा करना आवश्यक नहीं। परंपरा में इसे लय के साथ गाया जाता है, क्योंकि हर श्लोक की अंतिम पंक्ति एक ही है — "गोविन्द दामोदर माधवेति"। समूह में एक व्यक्ति श्लोक पढ़े और शेष केवल टेक दोहराएँ, यह विधि भी प्रचलित है। श्लोक 58 से टेक बदल जाती है, वहाँ से भाव भी बदलकर आत्म-संबोधन का हो जाता है।
प्रामाणिकता व स्रोत
संपादकीय टिप्पणी: यह सम्पूर्ण 71-श्लोकीय पाठ है, जैसा मूल स्रोत में पुष्पिका सहित मिलता है। प्रचलन में प्रायः 8–11 श्लोकों वाले संक्षिप्त संस्करण गाए जाते हैं, जो क्रम बदल देते हैं और कभी-कभी अन्य स्तोत्रों के श्लोक भी जोड़ लेते हैं — इसीलिए यहाँ पूरा मूल पाठ क्रम से दिया गया है।
देव परिचय
श्री कृष्ण
Lord Krishna
श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।
