समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, एकादशी व जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति व प्रेम (Love)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ कृष्णाय नमः सबसे संक्षिप्त कृष्ण नाम-मंत्र है। “कृष्ण” की व्युत्पत्ति “कृष्” धातु से है — जो सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यह चतुर्विंशति नामावली का अंतिम नाम 24 है और अष्टोत्तर शतनामावली का प्रथम नाम। तुलसी माला से 108 बार जप की परंपरा है।
FAQ
ॐ कृष्णाय नमः — सामान्य प्रश्न
"कृष्ण" की व्युत्पत्ति "कृष्" धातु से है, जिसका अर्थ है आकर्षित करना — अर्थात् जो सबको अपनी ओर खींच लेते हैं। एक अन्य व्याख्या में इसका अर्थ श्याम वर्ण है, और तीसरी में "कृष" (सत्ता) + "ण" (आनन्द) यानी सच्चिदानन्द।
दोनों रूप शास्त्रीय हैं। श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली (नारद पञ्चरात्र) में प्रथम नाम "ॐ श्रीकृष्णाय नमः" है, जबकि चतुर्विंशति नामावली में "श्री कृष्णाय नमः" रूप आता है। "श्री" आदर-सूचक उपसर्ग है; अर्थ में कोई भेद नहीं।
"ॐ कृष्णाय नमः" शुद्ध नाम-मंत्र है, जबकि "ॐ क्लीं कृष्णाय नमः" में "क्लीं" बीजाक्षर जुड़ा है, जो कामबीज कहलाता है और आकर्षण व प्रेम से जोड़ा जाता है। इस संग्रह में दोनों के अलग पृष्ठ हैं।
भक्ति परंपरा में कृष्ण-उपासना के लिए तुलसी माला विशेष बताई जाती है, क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु व कृष्ण को अत्यंत प्रिय मानी जाती हैं। 108 बार अर्थात् एक माला जप की सामान्य परंपरा है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, एकादशी व जन्माष्टमी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — प्रातः व संध्या नित्य पूजा में; बुधवार व एकादशी को; जन्माष्टमी की रात्रि में; चलते-फिरते मानसिक नाम-जप के रूप में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
"कृ" में ऋ-कार है — इसे हिन्दी में "क्रि" की तरह बोलना प्रचलित है और स्वीकार्य माना जाता है। परंपरा में कहा जाता है कि मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
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