समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, एकादशी व जन्माष्टमी
उद्देश्य:वात्सल्य व संतान (Family)भक्ति व प्रेम (Love)रक्षा (Protection)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ गोपालाय नमः श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 50 है, जिसका अर्थ है “गायों के पालक को नमस्कार”। “गो” का अर्थ इंद्रियाँ भी है, इसलिए गूढ़ अर्थ में गोपाल इंद्रियों के नियामक हैं। परंपरा में इसे वात्सल्य व संतान-कल्याण से जोड़ा जाता है।
FAQ
ॐ गोपालाय नमः — सामान्य प्रश्न
गोपाल अर्थात् "गो का पालन करने वाला" — गायों का रक्षक। "गो" का अर्थ इंद्रियाँ भी है, इसलिए एक गूढ़ व्याख्या में गोपाल वे हैं जो साधक की इंद्रियों का नियमन करते हैं। यह नाम अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 50 पर आता है।
दोनों अलग हैं। "ॐ गोपालाय नमः" शुद्ध नाम-मंत्र है, जबकि सन्तान गोपाल मंत्र सन्तान-प्राप्ति की कामना का विशिष्ट मंत्र है जो "ॐ देवकीसुत गोविन्द…" से आरंभ होता है। इस संग्रह में दोनों के अलग पृष्ठ हैं।
दक्षिण भारत में उडुपी श्रीकृष्ण मठ और गुरुवायूर के बालकृष्ण विग्रह इस स्वरूप की प्रसिद्ध उपासना-पीठें मानी जाती हैं। साथ ही वृंदावन की समस्त बाल-लीला परंपरा इसी नाम से जुड़ी है।
परंपरा में इसे वात्सल्य-भाव व बाल-कल्याण से जोड़ा जाता है और संतान-सुख की कामना के साथ भी जपा जाता है। विशेष रूप से संतान-प्राप्ति के संकल्प के लिए सन्तान गोपाल मंत्र का विधान अलग से बताया जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, एकादशी व जन्माष्टमी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — प्रातः व संध्या नित्य पूजा में; बुधवार व एकादशी को; जन्माष्टमी व गोपाष्टमी पर; संतान-कल्याण के संकल्प के साथ। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
