कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने

kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane

Krishnaya Vasudevaya Mantra (Bhagavata 10.73.16)

समय
15–20 सेकंड (एक आवृत्ति)
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; एकादशी; जन्माष्टमी
उद्देश्य:संकट-मोचन (Relief from Distress)रोग-निवृत्ति (Healing)शरणागति (Surrender)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र

"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने" श्रीमद्भागवत (10.73.16) का श्लोक है, जिसे जरासंध के कारागार से छूटे राजाओं ने श्रीकृष्ण के सामने कहा था। इसका अर्थ है — शरण में आए लोगों के क्लेश मिटाने वाले कृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा, गोविंद को बार-बार नमस्कार। यह संकट से मुक्ति के लिए जपा जाता है।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 73, श्लोक 16

एक नज़र में

मंत्र / पाठकृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
IASTkṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane
प्रकारसाधना मंत्र
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतश्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 73, श्लोक 16
जप संख्या108
मालातुलसी माला
शुभ दिनबुधवार; एकादशी; जन्माष्टमी
पाठ समय15–20 सेकंड (एक आवृत्ति)
कठिनाईसरल (Beginner)

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, अध्याय 73 का सोलहवाँ श्लोक है — और उसका प्रसंग जाने बिना इसका अर्थ अधूरा रह जाता है।

जरासंध ने बीस हज़ार से अधिक राजाओं को जीतकर कारागार में डाल रखा था। भीम द्वारा जरासंध-वध के पश्चात श्रीकृष्ण ने उन सबको मुक्त कराया। वर्षों की कैद से निकले, क्षीण-काय उन राजाओं ने बाहर आकर जो पहली बात कही, वही यह श्लोक है।

इसीलिए इसका केंद्रीय पद — "प्रणत-क्लेश-नाशाय", अर्थात "शरणागतों का क्लेश नष्ट करने वाले" — यहाँ कोई काव्य-अलंकार नहीं है। जिन्होंने यह कहा, उनके लिए यह शब्दशः अनुभव था। यही कारण है कि परंपरा इसे संकट, रोग व बंधन से मुक्ति के लिए जपती है।

एक बात ध्यान देने योग्य है: प्रचलन में यह "ॐ" से आरंभ किया जाता है, किंतु भागवत के मूल श्लोक में ॐ नहीं है — वह जप-परंपरा का जोड़ा हुआ है।

मंत्र

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कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत-क्लेश-नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

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उच्चारण (Pronunciation)

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत-क्लेश-नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane | praṇata-kleśa-nāśāya govindāya namo namaḥ ||

Krishnaya Vasudevaya Haraye Paramatmane, Pranata-Klesha-Nashaya Govindaya Namo Namah.

प्रचलित पाठॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

जप-परंपरा में यही रूप सर्वाधिक बोला जाता है, और यह पूर्णतः मान्य है। मूल भागवत-पाठ से इसमें दो अंतर हैं — आरंभ में "ॐ" जोड़ा गया है, तथा "प्रणतक्लेशनाशाय" के स्थान पर विसर्ग सहित "प्रणतः क्लेशनाशाय" है, जिससे वह चतुर्थी की शृंखला से निकलकर अलग पद बन जाता है। भाव दोनों में एक ही है।

उच्चारण मार्गदर्शन: "कृष्णाय" में "कृ" ऋ-कार है और "ष्ण" संयुक्ताक्षर (ष् + ण) — इसे "कृशनाय" न बनाएँ। "हरये" में "ये" का उच्चारण स्पष्ट रखें, "हरे" नहीं। "परमात्मने" में "त्म" संयुक्ताक्षर है और अंत "ने" पर है, "ना" पर नहीं। "प्रणत-क्लेश-नाशाय" एक ही समास है, इसलिए तीनों खंड जोड़कर बोलें; बीच में विसर्ग लगाकर "प्रणतः" कहना प्रचलित है पर मूल पाठ वैसा नहीं। अंतिम "नमो नमः" में दूसरा "नमः" कुछ दीर्घ रखें।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

कृष्णायश्रीकृष्ण को
वासुदेवायवसुदेव के पुत्र को
हरयेहरि को — जो पाप व दुःख हर लेते हैं
परमात्मनेपरमात्मा को; सबके भीतर स्थित परम आत्मा को
प्रणतजो शरण में आ चुके हैं, नत हो चुके हैं
क्लेशकष्ट, पीड़ा, संकट
नाशायनष्ट करने वाले को
गोविन्दायगोविंद को — गौओं व इंद्रियों के स्वामी को
नमो नमःबारंबार नमस्कार

अर्थ (हिन्दी)

  1. श्रीकृष्ण को, वसुदेव-नंदन को, हरि को, परमात्मा को — तथा शरणागतों का क्लेश नष्ट करने वाले गोविंद को बारंबार नमस्कार है।

लाभ

  • परंपरा में यह क्लेश, संकट व बंधन से मुक्ति के लिए सर्वाधिक जपा जाने वाला कृष्ण-श्लोक है।
  • श्लोक का मूल प्रसंग ही कारागार से मुक्ति का है, इसलिए इसे बंधन-मुक्ति का प्रार्थना-मंत्र माना जाता है।
  • चार नाम (कृष्ण, वासुदेव, हरि, गोविंद) एक ही श्लोक में आते हैं, इसलिए यह संक्षिप्त नाम-स्मरण भी है।
  • छोटा व सरल होने के कारण नित्य जप तथा बालकों को कंठस्थ कराने के लिए उपयुक्त।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 108 बार (एक माला)।

माला: तुलसी माला

उत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्या

जप का उत्तम समय

संकट, रोग अथवा कठिन परिस्थिति मेंप्रातः स्नान के पश्चात नित्य जप मेंजन्माष्टमी व एकादशी परयात्रा आरंभ करते समय

जप विधि (चैंटिंग मेथड)

शुद्ध होकर श्रीकृष्ण के समक्ष बैठें और तुलसी की माला पर 108 बार जप करें। जप से पूर्व संकल्प लें कि किस क्लेश से मुक्ति की प्रार्थना है — इस श्लोक की परंपरा उसी भाव की है। जप-प्रचलन में इसके आरंभ में "ॐ" जोड़ा जाता है; मूल भागवत-श्लोक में वह नहीं है, अतः दोनों रूप मान्य हैं।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल ग्रंथश्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.16
स्रोत परंपराश्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.16 — vedabase.io/en/library/sb/10/73/16 तथा gitabase.com/esp/SB/10/73/16 (देवनागरी, IAST व शब्दशः अर्थ) · प्रसंग — जरासंध-वध के पश्चात मुक्त हुए राजाओं की स्तुति; भागवत दशम स्कंध, अध्याय 73 · sanskritforus.com — हिंदी शब्दार्थ (2026-08-25 को देखा गया) · पाठ-भेद: मूल श्लोक में "ॐ" नहीं है — वह जप-परंपरा का जोड़ा हुआ है; तथा मूल में "प्रणत-क्लेश-नाशाय" एक समास है, "प्रणतः क्लेशनाशाय" प्रचलित रूप है। दोनों दर्ज हैं।
रचयिताश्रीमद्भागवत महापुराण
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
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