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लिपि:
॥ श्री ॥
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
मंत्र · श्री कृष्ण
पाठ
1
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत-क्लेश-नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
अर्थ (हिन्दी)
- श्रीकृष्ण को, वसुदेव-नंदन को, हरि को, परमात्मा को — तथा शरणागतों का क्लेश नष्ट करने वाले गोविंद को बारंबार नमस्कार है।
लाभ
- परंपरा में यह क्लेश, संकट व बंधन से मुक्ति के लिए सर्वाधिक जपा जाने वाला कृष्ण-श्लोक है।
- श्लोक का मूल प्रसंग ही कारागार से मुक्ति का है, इसलिए इसे बंधन-मुक्ति का प्रार्थना-मंत्र माना जाता है।
- चार नाम (कृष्ण, वासुदेव, हरि, गोविंद) एक ही श्लोक में आते हैं, इसलिए यह संक्षिप्त नाम-स्मरण भी है।
- छोटा व सरल होने के कारण नित्य जप तथा बालकों को कंठस्थ कराने के लिए उपयुक्त।
कब करें पाठ
संकट, रोग अथवा कठिन परिस्थिति में · प्रातः स्नान के पश्चात नित्य जप में · जन्माष्टमी व एकादशी पर · यात्रा आरंभ करते समय
स्रोत
रचयिता: श्रीमद्भागवत महापुराण. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.16 — vedabase.io/en/library/sb/10/73/16 तथा gitabase.com/esp/SB/10/73/16 (देवनागरी, IAST व शब्दशः अर्थ) · प्रसंग — जरासंध-वध के पश्चात मुक्त हुए राजाओं की स्तुति; भागवत दशम स्कंध, अध्याय 73 · sanskritforus.com — हिंदी शब्दार्थ (2026-08-25 को देखा गया) · पाठ-भेद: मूल श्लोक में "ॐ" नहीं है — वह जप-परंपरा का जोड़ा हुआ है; तथा मूल में "प्रणत-क्लेश-नाशाय" एक समास है, "प्रणतः क्लेशनाशाय" प्रचलित रूप है। दोनों दर्ज हैं।
