जगन्नाथाष्टकम्

jagannāthāṣṭakam

Jagannathashtakam

समय
4–5 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
रथयात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया); एकादशी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)दर्शन (Divine Vision)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)

जगन्नाथाष्टकम् भगवान जगन्नाथ की स्तुति का नौ श्लोकों वाला स्तोत्र है, जिसका श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है। प्रत्येक श्लोक इसी प्रार्थना पर समाप्त होता है कि "जगन्नाथ स्वामी मेरे नयनों के पथ के अतिथि बनें"। रथयात्रा तथा पुरी-दर्शन में इसका विशेष पाठ होता है।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: रचयिता: आदि शंकराचार्य — पुरी के श्रीजगन्नाथ की स्तुति

एक नज़र में

मंत्र / पाठजगन्नाथाष्टकम्
IASTjagannāthāṣṭakam
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतरचयिता: आदि शंकराचार्य — पुरी के श्रीजगन्नाथ की स्तुति
शुभ दिनरथयात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया); एकादशी
पाठ समय4–5 मिनट
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

जगन्नाथाष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जिसकी हर पंक्ति एक ही प्रार्थना पर आकर ठहरती है — "जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे", अर्थात "वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ"। परंपरा कहती है कि पुरी-यात्रा के समय शंकराचार्य ने इसकी रचना की, और आगे चलकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसका पाठ किया।

इस स्तोत्र की माँग असामान्य है। भक्त धन नहीं माँगता, मोक्ष भी नहीं — सातवाँ श्लोक स्पष्ट कहता है कि राज्य, स्वर्ण-रत्न और सुंदर वधू — कुछ भी प्रार्थनीय नहीं। माँग केवल एक है: दर्शन। "आप मेरी आँखों के रास्ते आ जाइए।"

पहले दो श्लोक वृंदावन के वंशीधर कृष्ण का चित्र देते हैं, तीसरा नीलाचल के मंदिर में बलभद्र और सुभद्रा के बीच विराजमान जगन्नाथ का, और पाँचवाँ रथयात्रा का — रथ पर चढ़े हुए, मार्ग में जुटे भूदेवों की स्तुति हर पग पर सुनते हुए। यही क्रम बताता है कि वृंदावन का कन्हैया और पुरी के जगन्नाथ एक ही हैं।

संपूर्ण अष्टकम्

PDF डाउनलोड

कदाचित्कालिन्दीतटविपिनसङ्गीतकरवो मुदाभीरीनारीवदनकमलास्वादमधुपः। रमाशम्भुब्रह्मामरपतिगणेशार्चितपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जो कभी कालिंदी (यमुना) के तट के वनों में संगीत की ध्वनि करते हैं, जो गोपांगनाओं के मुख-कमलों का आनंद लेने वाले भ्रमर हैं, तथा जिनके चरण लक्ष्मी, शंभु, ब्रह्मा, इंद्र व गणेश द्वारा पूजित हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचरकटाक्षं विदधते। सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जिनके बाएँ हाथ में वंशी है, सिर पर मोरपंख, कटि पर पीत दुकूल, तथा जो नेत्रों के कोरों से अपने सखाओं पर कटाक्ष करते हैं, और जो सदा श्रीवृंदावन में निवास कर लीला करते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरे वसन् प्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना। सुभद्रामध्यस्थः सकलसुरसेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जो महासागर के तट पर, स्वर्ण-सी चमकती रेत वाले नीलाचल शिखर पर, मंदिर के भीतर बलवान सहोदर बलभद्र के साथ निवास करते हैं, सुभद्रा के मध्य विराजमान हैं, तथा समस्त देवताओं को सेवा का अवसर देते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

कृपापारावारः सजलजलदश्रेणिरुचिरो रमावाणीरामः स्फुरदमलपङ्केरुहमुखः। सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जो कृपा के महासागर हैं, जिनकी छवि जल से भरी मेघमाला के समान मनोहर है, जो लक्ष्मी व सरस्वती को आनंद देते हैं, जिनका मुख निर्मल खिले कमल-सा है, जो देवेंद्रों द्वारा आराध्य हैं तथा जिनका चरित वेदों के शिखर (उपनिषदों) में गाया गया है — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

रथारूढो गच्छन् पथि मिलितभूदेवपटलैः स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः। दयासिन्धुर्बन्धुः सकलजगतां सिन्धुसुतया जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जो रथ पर आरूढ़ होकर मार्ग पर चलते हैं और पथ में जुटे ब्राह्मण-समूहों की स्तुति हर पग पर सुनकर दयार्द्र हो जाते हैं, जो दया के सिंधु तथा समस्त जगत् के बंधु हैं और सिंधु-सुता लक्ष्मी के साथ हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

परब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि। रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसखो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

जो साक्षात परब्रह्म हैं, जिनके नेत्र खिले हुए नील-कमल की पंखुड़ियों जैसे हैं, जो नीलाचल पर निवास करते हैं और जिनके चरण शेषनाग के शीश पर रखे हैं, तथा जो रस के आनंद-स्वरूप एवं राधा के सरस विग्रह के आलिंगन-सखा हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकतां भोगविभवं न याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूम्। सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

मुझे न राज्य प्रार्थनीय है, न स्वर्ण अथवा भोग-वैभव; न मैं उस सुंदरी वधू की याचना करता हूँ जिसे सब लोग चाहते हैं। जिनका चरित प्रमथपति शिव सदा समय-समय पर गाते रहते हैं — बस वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते। अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

हे सुरपति! इस सारहीन संसार-बंधन को शीघ्र हर लीजिए। हे यादवपति! मेरे पापों की अपार राशि को हर लीजिए। दीन-अनाथों के लिए आपका अचल व निश्चित चरण-पद ही आश्रय है — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।

जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः। सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥

जो संयमी व शुद्ध होकर इस पुण्यमय जगन्नाथाष्टक का पाठ करता है, वह समस्त पापों से विशुद्ध आत्मा होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है। (यह फलश्रुति है — अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है।)

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

अर्थ (हिन्दी)

  1. जो कभी कालिंदी (यमुना) के तट के वनों में संगीत की ध्वनि करते हैं, जो गोपांगनाओं के मुख-कमलों का आनंद लेने वाले भ्रमर हैं, तथा जिनके चरण लक्ष्मी, शंभु, ब्रह्मा, इंद्र व गणेश द्वारा पूजित हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  2. जिनके बाएँ हाथ में वंशी है, सिर पर मोरपंख, कटि पर पीत दुकूल, तथा जो नेत्रों के कोरों से अपने सखाओं पर कटाक्ष करते हैं, और जो सदा श्रीवृंदावन में निवास कर लीला करते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  3. जो महासागर के तट पर, स्वर्ण-सी चमकती रेत वाले नीलाचल शिखर पर, मंदिर के भीतर बलवान सहोदर बलभद्र के साथ निवास करते हैं, सुभद्रा के मध्य विराजमान हैं, तथा समस्त देवताओं को सेवा का अवसर देते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  4. जो कृपा के महासागर हैं, जिनकी छवि जल से भरी मेघमाला के समान मनोहर है, जो लक्ष्मी व सरस्वती को आनंद देते हैं, जिनका मुख निर्मल खिले कमल-सा है, जो देवेंद्रों द्वारा आराध्य हैं तथा जिनका चरित वेदों के शिखर (उपनिषदों) में गाया गया है — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  5. जो रथ पर आरूढ़ होकर मार्ग पर चलते हैं और पथ में जुटे ब्राह्मण-समूहों की स्तुति हर पग पर सुनकर दयार्द्र हो जाते हैं, जो दया के सिंधु तथा समस्त जगत् के बंधु हैं और सिंधु-सुता लक्ष्मी के साथ हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  6. जो साक्षात परब्रह्म हैं, जिनके नेत्र खिले हुए नील-कमल की पंखुड़ियों जैसे हैं, जो नीलाचल पर निवास करते हैं और जिनके चरण शेषनाग के शीश पर रखे हैं, तथा जो रस के आनंद-स्वरूप एवं राधा के सरस विग्रह के आलिंगन-सखा हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  7. मुझे न राज्य प्रार्थनीय है, न स्वर्ण अथवा भोग-वैभव; न मैं उस सुंदरी वधू की याचना करता हूँ जिसे सब लोग चाहते हैं। जिनका चरित प्रमथपति शिव सदा समय-समय पर गाते रहते हैं — बस वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  8. हे सुरपति! इस सारहीन संसार-बंधन को शीघ्र हर लीजिए। हे यादवपति! मेरे पापों की अपार राशि को हर लीजिए। दीन-अनाथों के लिए आपका अचल व निश्चित चरण-पद ही आश्रय है — वे जगन्नाथ स्वामी मेरी दृष्टि के पथ पर आ जाएँ।
  9. जो संयमी व शुद्ध होकर इस पुण्यमय जगन्नाथाष्टक का पाठ करता है, वह समस्त पापों से विशुद्ध आत्मा होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है। (यह फलश्रुति है — अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है।)

लाभ

  • फलश्रुति के अनुसार संयमपूर्वक पाठ करने से साधक पापों से विशुद्ध होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
  • रथयात्रा के अवसर पर इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • यह स्तोत्र माँगना नहीं, केवल दर्शन चाहना सिखाता है — इसीलिए इसे वैराग्य का पाठ भी कहा जाता है।
  • वृंदावन के कृष्ण तथा पुरी के जगन्नाथ की एकता का भाव दृढ़ होता है।

कब करें पाठ

रथयात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) परपुरी-यात्रा अथवा जगन्नाथ दर्शन के समयएकादशी कोप्रातः नित्य पाठ में

पाठ विधि

श्रीजगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के चित्र अथवा विग्रह के समक्ष बैठकर आठों श्लोकों का क्रम से पाठ करें और अंत में फलश्रुति पढ़ें। हर श्लोक की अंतिम पंक्ति "जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे" पर क्षण भर ठहरकर दर्शन की ही प्रार्थना का भाव रखें — इस स्तोत्र में यही एकमात्र याचना है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
स्रोत परंपराsanskritdocuments.org — जगन्नाथाष्टकम् (आधार पाठ; पुष्पिका "इति श्रीमद् शङ्कराचार्यप्रणीतं जगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णं॥" तथा पाठ-भेद-सूचना सहित) · greenmesg.org — Jagannathashtakam (देवनागरी, IAST व अंग्रेज़ी अर्थ) · dharmsutra.org — जगन्नाथ अष्टकम् (देवनागरी) · hindunidhi.com — श्री जगन्नाथाष्टकम् (देवनागरी) · पाठ-भेद श्लोक 1: सङ्गीतकरवो (3 स्रोत) बनाम सङ्गीततरलो (1 स्रोत) — करवो लिया गया। · पाठ-भेद श्लोक 7: "न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकतां भोगविभवं" बनाम "न वै याचे राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं" — स्रोत 2–2 बँटे; आधार-संस्करण का पाठ लिया गया। · पाठ-भेद श्लोक 8: "अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं" बनाम "अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं" — स्रोत 2–2 बँटे; आधार-संस्करण का पाठ लिया गया। · श्लोक 2–5 का पाठ greenmesg व dharmsutra से, जो परस्पर सहमत हैं; इन्हें आधार-संस्करण से मिलाया नहीं जा सका।
रचयिताआदि शंकराचार्य
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: अष्टक स्वयं आठ श्लोकों का है — शंकराचार्य की पुष्पिका आठवें के बाद ही आती है। नौवाँ श्लोक फलश्रुति है, जिसे कुछ संस्करण साथ छापते हैं और कुछ गणना से बाहर रखते हैं; यहाँ वह अलग से चिह्नित करके दिया गया है। इस स्तोत्र की पाठ-परंपरा में तीन स्थानों पर वास्तविक भेद मिलते हैं — श्लोक 1, 7 व 8 — जो नीचे प्रश्नोत्तर तथा स्रोत-सूची में दर्ज हैं।

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
सभी पाठ देखें

जगन्नाथाष्टकम् — सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ