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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री व्यंकटेश (बालाजी) आरती

आरती · श्री विष्णु

पाठ

1

शेषाचल अवतार तारक तूं देवा। सुरवर मुनिवर भावें करिती जन सेवा। कमळारमणा अससी अगणित गुण ठेवा। कमळाक्षा मज रक्षुनि सत्वर वर द्यावा॥

जय देव जय देव जय व्यंकटेशा। केवळ करुणासिंधू पुरवीसी आशा॥

2

हें निजवैकुंठ म्हणुनि ध्यातों मी तूतें। दाखविसी गुण कैसे सकळिक लोकाते। देखुनि तुझें स्वरूप सुख अद्भुत होतें। ध्यातों तुजला श्रीपति दृढ मानस होतें॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे देव, आप शेषाचल पर अवतरित तारने वाले हैं; श्रेष्ठ देवता, मुनि और लोग भाव से आपकी सेवा करते हैं; हे कमला (लक्ष्मी) के पति, आप अगणित गुणों का भंडार हैं; हे कमल-नयन, मेरी रक्षा करके शीघ्र वर दीजिए।
  2. (ध्रुवपद) हे देव, हे व्यंकटेश, आपकी जय हो! आप करुणा के सागर हैं, (भक्तों की) आशाएँ पूरी करते हैं।
  3. इसी को (आपका) निज-वैकुंठ मानकर मैं आपका ध्यान करता हूँ; आप सब लोगों को कैसे-कैसे गुण दिखाते हैं! आपका स्वरूप देखकर अद्भुत सुख होता है; हे श्रीपति, आपका ध्यान करने से मन दृढ़ हो जाता है।

लाभ

  • बालाजी की करुणा पर भरोसा — "केवळ करुणासिंधू पुरवीसी आशा"।
  • मन की दृढ़ता — "ध्यातों तुजला श्रीपति दृढ मानस होतें"।

कब करें पाठ

शनिवार को · एकादशी पर · बालाजी-पूजन के बाद

स्रोत

रचयिता: अज्ञात (किसी प्रति में नाम नहीं). santsahitya.in — श्री व्यंकटेश आरती (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — श्री व्यंकटेश जी आरती

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