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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री बालाजी आरती
आरती · श्री विष्णु
पाठ
1
जय बालाजी देवा, प्रभु जय वेंकटेशा। भक्तन के दुख हरते, श्रीनिवास परमेशा॥
2
शेष-शैल विराजत, सप्तगिरि पर धामा। लक्ष्मी संग विराजे, सुन्दर अति अभिरामा॥
3
कलियुग के तुम स्वामी, दर्शन सुख देते। ऋण-संकट सब हरते, मनवांछित देते॥
4
गोविंदा गोविंदा, जयकारा गूँजे। शरण पड़े की रक्षा, बालाजी कीजे॥
5
बालाजी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ऋण-संकट सब मिटते, सुख-सम्पति पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे बालाजी देव, हे वेंकटेश, आपकी जय हो! हे श्रीनिवास परमेश्वर, आप भक्तों के दुःख हरने वाले हैं।
- शेषशैल (सात पर्वतों) पर आपका धाम सुशोभित है; लक्ष्मी (पद्मावती) के संग आप अति सुन्दर व मनोहर रूप में विराजमान हैं।
- आप कलियुग के स्वामी हैं और दर्शन का सुख देते हैं; आप ऋण व संकट हर लेते हैं तथा मनोवांछित फल देते हैं।
- "गोविंदा-गोविंदा" का जयकारा गूँजता है; हे बालाजी, शरण में आए हुए जनों की रक्षा कीजिए।
- जो भक्त श्रद्धा से बालाजी की यह आरती गाता है, उसके ऋण व संकट मिट जाते हैं और वह सुख-सम्पत्ति प्राप्त करता है।
लाभ
- ऋण-मुक्ति व आर्थिक संकट से राहत मिलती है।
- मनोकामना पूर्ण होकर समृद्धि आती है।
- भक्ति, सुख-शांति व विष्णु-कृपा प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
शनिवार को · एकादशी व वैकुण्ठ एकादशी पर · प्रातः व संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
