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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री बांके बिहारी आरती

आरती · श्री कृष्ण

पाठ

1

जय जय बांके बिहारी, गिरिधर श्याम मुरारी। वृन्दावन में विराजे, छवि अति सुखकारी॥

2

त्रिभंगी छवि मनोहर, मोरमुकुट सिर सोहे। नैन कमल-दल जैसे, त्रिभुवन मन मोहे॥

3

हरिदास के प्यारे, ठाकुर मनभावन। बांसुरी अधर सजी, सबके मन-पावन॥

4

झाँकी अति सुखदाई, पल-पल छवि न्यारी। भक्तन के दुख हरते, बिहारी गिरधारी॥

5

बांके बिहारी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। प्रेम-भक्ति रस पावे, श्याम-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे बांके बिहारी, गिरिधर, श्याम, मुरारी, आपकी जय हो! वृन्दावन में विराजमान आपकी छवि अति सुखदायी है।
  2. त्रिभंगी मनोहर छवि वाले, सिर पर मोरमुकुट सुशोभित; कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्र — आप तीनों लोकों के मन को मोह लेते हैं।
  3. स्वामी हरिदास के प्यारे, मन को भाने वाले ठाकुर; अधरों पर बांसुरी सजी है, जो सबके मन को पावन करती है।
  4. अति सुखदायी झाँकी, पल-पल बदलती अनुपम छवि; हे बिहारी गिरधारी, आप भक्तों के दुःख हरते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से बांके बिहारी की यह आरती गाता है, वह प्रेम-भक्ति का रस तथा श्याम (कृष्ण) की कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • प्रेम, भक्ति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
  • मन शांत होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • श्रीकृष्ण की कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

जन्माष्टमी पर · नित्य संध्या में · एकादशी व गुरुवार को

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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