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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री भैरव बाबा आरती
आरती · श्री शिव
पाठ
1
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥
2
तुम्हीं पाप उद्धारक, दुःख सिन्धु तारक। भक्तों के सुख कारक, भीषण वपु धारक॥
3
वाहन श्वान विराजत, कर त्रिशूल धारी। महिमा अमित तुम्हारी, जय जय भयहारी॥
4
तुम बिन देवा सेवा, सफल नहीं होवे। चौमुख दीपक दर्शन, दुःख सगरे खोवे॥
5
तेल चटकि दधि मिश्रित, भाषावलि तेरी। कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी॥
6
पाँव घुँघरू बाजत, अरु डमरू डमकावत। बटुकनाथ बन बालक, जन मन हरषावत॥
बटुकनाथ जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहे धरणीधर नर, मनवांछित फल पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे भैरव देव, हे प्रभु, आपकी जय हो! काली और गौरा (पार्वती) देवी भी आपकी सेवा करती हैं।
- आप ही पापों से उबारने वाले और दुख के सागर से तारने वाले हैं; आप भक्तों को सुख देने वाले और भीषण देह धारण करने वाले हैं।
- श्वान (कुत्ता) आपका वाहन है, हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं; आपकी महिमा अपार है — हे भय हरने वाले, आपकी जय हो, जय हो।
- आपके बिना देव-सेवा सफल नहीं होती; चौमुखे दीपक से आपका दर्शन सारे दुख मिटा देता है।
- तेल, चटपटे (पकवान) और दही-मिश्रित भोग आपको प्रिय है ("भाषावलि" शब्द प्रतियों में ऐसा ही है); हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।
- पाँवों में घुँघरू बजते हैं और हाथ में डमरू डमडमाता है; बालक बटुकनाथ बनकर आप लोगों का मन प्रसन्न करते हैं।
- (फलश्रुति) जो कोई मनुष्य बटुकनाथ जी की यह आरती गाता है — धरणीधर कहते हैं — वह मनचाहा फल पाता है।
लाभ
- भय और संकट से रक्षा — "महिमा अमित तुम्हारी, जय जय भयहारी"।
- पाप और दुख से उबरने की प्रार्थना — "तुम्हीं पाप उद्धारक, दुःख सिन्धु तारक"।
- फलश्रुति: मनचाहा फल।
कब करें पाठ
रविवार और मंगलवार को · कालाष्टमी और भैरव अष्टमी पर · संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: धरणीधर (फलश्रुति की छाप). knowledgegallery.in — भैरव जी की आरती (आधार-पाठ) · aartigyan.com — भैरव जी की आरती · ishtadev.com — जय भैरव देवा आरती
