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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री भैरव बाबा आरती

आरती · श्री शिव

पाठ

1

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काल भैरव स्वामी, करूँ मैं तव सेवा॥

2

श्याम वरण तन सोहे, श्वान पर असवारी। कर त्रिशूल डमरू धर, गल मुण्डन माला॥

3

काशी कोतवाल कहलाओ, नगर रक्षा करते। पाप-ताप सब हरते, भय भक्तन के हरते॥

4

दुष्ट दलन भयहारी, संकट सब टारो। शरण पड़े की रक्षा, बाबा तुम करो हमारी॥

5

भैरव बाबा की आरती, जो जन नित गावे। भय संकट सब मिटते, अभय वर पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे भैरव देव, आपकी जय हो! हे काल भैरव स्वामी, मैं आपकी सेवा करता हूँ।
  2. श्याम वर्ण शरीर सुशोभित है, श्वान (कुत्ते) पर सवारी है; हाथों में त्रिशूल व डमरू तथा गले में मुण्डमाला धारण किए हुए हैं।
  3. आप काशी के कोतवाल कहलाते हैं और नगर की रक्षा करते हैं; आप समस्त पाप-ताप तथा भक्तों के भय का हरण करते हैं।
  4. हे दुष्टों का दमन व भय हरने वाले! हमारे सब संकट दूर कीजिए; हे बाबा, शरण में आए हुए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  5. जो भक्त नित्य भैरव बाबा की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय व संकट मिट जाते हैं और उसे अभय का वरदान मिलता है।

लाभ

  • भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • संकट, तंत्र-बाधा व विघ्न का शीघ्र नाश होता है।
  • साहस, आत्मबल व निर्भयता में वृद्धि होती है।

कब करें पाठ

रविवार व मंगलवार को · कालाष्टमी पर · रात्रि व संध्या काल में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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