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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री ब्रह्मा आरती

आरती

पाठ

1

जय ब्रह्मा देवा, स्वामी जय ब्रह्मा देवा। सृष्टि रचयिता तुम हो, करूँ मैं तव सेवा॥

2

चतुर्मुख रूप विराजे, हंस पर असवारी। कर में वेद-कमण्डलु, माला अति प्यारी॥

3

सावित्री संग शोभे, ज्ञान-विधाता हो। वेदों के तुम स्रोता, जग के दाता हो॥

4

पुष्कर धाम विराजे, तीर्थ अति पावन। भक्तन को सुख देते, हरते मन के अघन॥

5

ब्रह्मा जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ज्ञान-विवेक वह पावे, सुख-शान्ति पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे ब्रह्मा देव, आपकी जय हो! आप सृष्टि के रचयिता हैं; मैं आपकी सेवा करता हूँ।
  2. चार मुख वाले रूप में विराजमान, हंस पर सवारी करते हुए; हाथों में वेद, कमण्डलु व माला अति शोभा देते हैं।
  3. देवी सावित्री के संग सुशोभित, आप ज्ञान के विधाता हैं; आप वेदों के स्रोत व जगत को देने वाले हैं।
  4. अति पवित्र तीर्थ पुष्कर धाम में आप विराजमान हैं; भक्तों को सुख देते हैं और मन के पापों को हर लेते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से ब्रह्मा जी की यह आरती गाता है, वह ज्ञान-विवेक तथा सुख-शांति प्राप्त करता है।

लाभ

  • ज्ञान, विवेक व बुद्धि में वृद्धि होती है।
  • मन को शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • सृष्टि व कर्म के प्रति श्रद्धा व समझ बढ़ती है।

कब करें पाठ

कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला) पर · प्रातः पूजा में · किसी शुभ कार्य-आरंभ पर

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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