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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री ब्रह्मा आरती

आरती

पाठ

1

पितु मातु सहायक स्वामी सखा, तुम ही एक नाथ हमारे हो। जिनके कुछ और आधार नहीं, तिनके तुम ही रखवारे हो॥

2

सब भाँति सदा सुखदायक हो, दुःख निर्गुण नाशन हारे हो। प्रतिपाल करो सिगरे जग को, अतिशय करुणा उर धारे हो॥

3

भूल गये हैं हम तो तुमको, तुम तो हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो। उपकारन को कछु अन्त नहीं, छिन ही छिन जो विस्तारे हो॥

4

महाराज महा महिमा तुम्हरी, मुझसे बिरले बुधवारे हो। शुभ शान्ति निकेतन प्रेमनिधि, मन मन्दिर के उजियारे हो॥

5

इस जीवन के तुम जीवन हो, इन प्राणन के तुम प्यारे हो। तुम सों प्रभु पाय 'प्रताप' हरि, केहि के अब और सहारे हो॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. आप ही पिता, माता, सहायक, स्वामी और सखा हैं — आप ही हमारे एकमात्र नाथ हैं; जिनका कोई और आधार नहीं, उनके रखवाले आप ही हैं।
  2. आप हर प्रकार से सदा सुख देने वाले हैं, दुख और दुर्गुणों का नाश करने वाले हैं; आप सारे जगत का पालन करते हैं, और हृदय में अत्यधिक करुणा धारण किए हैं।
  3. हम तो आपको भूल गए हैं, पर आप हमारी सुध कभी नहीं भूलते; आपके उपकारों का कोई अंत नहीं, जिन्हें आप क्षण-क्षण बढ़ाते जाते हैं।
  4. हे महाराज, आपकी महिमा महान है — मुझ जैसे (अल्पबुद्धि) से विरले ही बुद्धिमान (उसे जानते) हैं; आप शुभ और शांति के धाम, प्रेम के सागर और मन-मंदिर के उजाले हैं।
  5. आप इस जीवन के भी जीवन हैं, इन प्राणों के प्रिय हैं; हे हरि, आप जैसे प्रभु को पाकर ("प्रताप" कहते हैं) अब और किसके सहारे की ज़रूरत है?

लाभ

  • शरणागति का भाव — "जिनके कुछ और आधार नहीं, तिनके तुम ही रखवारे हो"।
  • प्रभु की करुणा पर भरोसा — "तुम तो हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो"।
  • किसी शुभ कार्य के आरंभ और पूर्णिमा की पूजा में सरल प्रार्थना।

कब करें पाठ

पूर्णिमा को · किसी शुभ कार्य के आरंभ में · प्रातः व संध्या प्रार्थना में

स्रोत

रचयिता: छाप "प्रताप" (दो प्रतियों में "कमल"). drikpanchang.com — आरती श्री ब्रह्मा जी (आधार-पाठ) · aartigyan.com — ब्रह्मा जी की आरती · knowledgegallery.in — ब्रह्मा जी की आरती · lordshiva.co.in — ब्रह्मा जी की आरती

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