श्री ब्रह्मा चालीसा
पाठ
गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। ब्रह्मा-देव की वंदना, देहु ज्ञान-वरदान॥
जय जय ब्रह्मा सृष्टि-रचैया। वेद-विधाता जग के दैया॥
चतुर्मुख रूप विराजे न्यारा। हंस-वाहन शोभा भारा॥
कर में वेद-कमण्डलु-माला। सृष्टि रचत तुम परम कृपाला॥
सावित्री-संग शोभा पाते। वेद-ज्ञान जग को सिखलाते॥
त्रिदेवों में तुम प्रथम कहाये। सृष्टि-रचना का भार उठाये॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥
पुष्कर-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित दरस को घेरा॥
पुष्कर-सरोवर पावन माना। स्नान करत जन पुण्य कमाना॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
कार्तिक-पूर्णिमा मेला भारी। भक्त-गण आवें दूर-निवारी॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥
विद्यार्थी जो तुम्हें मनावैं। बुद्धि-विद्या वे सब पावैं॥
रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-शान्ति घर में लाते॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। ब्रह्मा-कृपा सहज वह पावै॥
मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। ज्ञान-दायक तुम सुख-साधन॥
सरस्वती-पति ज्ञान के सागर। वेद-शास्त्र के तुम हो आगर॥
जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो यह ब्रह्मा चालीसा गावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा ब्रह्मा की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। ज्ञान-सुख घर में लावैं॥
ब्रह्मा-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
यज्ञ-हवन में तुम्हीं विराजो। सृष्टि-व्यवस्था नित तुम साजो॥
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत ब्रह्मा देवा॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
चार वेद तुम्हीं से आये। ब्रह्म-ज्ञान जग में फैलाये॥
सृष्टि-रचना का भार सँभाला। जग-जीवन का चक्र चलाला॥
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
ब्रह्मा-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥
पुष्कर-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥
ज्ञान-विवेक का बल बताते। सन्मार्ग जग को दिखलाते॥
सृष्टि-विधाता तुम कल्याणी। वेद-ज्ञान के तुम हो दानी॥
जो जन ब्रह्मा गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
ब्रह्मा-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
ज्ञान-सुख-शान्ति घर में आवै। भक्ति-विवेक-संतोष बढ़ावै॥
भय-संकट सब दूर हटावै। ब्रह्मा जो जन नित ध्यावै॥
ज्ञान-मार्ग वह सहज वह पावै। ब्रह्मा-नाम जो जन गावै॥
ज्ञान-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-विवेक सब बढ़ावै॥
जय जय जय ब्रह्मा सुखदाता। वेद-ज्ञान-विवेक के दाता॥
ब्रह्मा चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। ज्ञान-विवेक-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥
अर्थ (हिन्दी)
- गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं ब्रह्मा देव की वंदना करता हूँ; हे प्रभु, ज्ञान का वरदान दीजिए।
- हे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेदों के विधाता व जगत के दाता हैं।
- चार मुख वाले रूप में अद्वितीय विराजमान; हंस-वाहन पर अति शोभा है।
- हाथों में वेद, कमण्डलु व माला धारण किए; हे परम कृपालु, आप सृष्टि की रचना करते हैं।
- देवी सावित्री के संग आप शोभा पाते हैं और जगत को वेद-ज्ञान सिखलाते हैं।
- त्रिदेवों में आप प्रथम कहलाते हैं और सृष्टि-रचना का भार उठाते हैं।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
- पुष्कर-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।
- पुष्कर-सरोवर पावन माना जाता है; उसमें स्नान कर जन पुण्य कमाते हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- कार्तिक-पूर्णिमा को भारी मेला लगता है; भक्तगण दूर-दूर से आते हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
- जो विद्यार्थी आपको मनाते हैं, वे बुद्धि व विद्या पाते हैं।
- आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही ब्रह्मा-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; ज्ञान-दायक व सुख देने वाले हैं।
- आप सरस्वती के स्वामी व ज्ञान के सागर हैं; वेद-शास्त्र के भण्डार हैं।
- जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- जो यह ब्रह्मा चालीसा गाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में ज्ञान व सुख लाते हैं।
- जिन पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- यज्ञ-हवन में आप ही विराजते हैं और नित्य सृष्टि की व्यवस्था सजाते हैं।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर ब्रह्मा देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- चारों वेद आप ही से आए और आपने जगत में ब्रह्म-ज्ञान फैलाया।
- आपने सृष्टि-रचना का भार सँभाला और जगत-जीवन का चक्र चलाया।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
- जो जन ब्रह्मा-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
- पुष्कर-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
- आप ज्ञान व विवेक का बल बताते हैं और जगत को सन्मार्ग दिखलाते हैं।
- आप सृष्टि के विधाता व कल्याणकारी हैं; वेद-ज्ञान के दाता हैं।
- जो जन ब्रह्मा देव के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन ब्रह्मा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति, विवेक व संतोष बढ़ता है।
- जो जन ब्रह्मा देव का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- जो जन ब्रह्मा-नाम गाता है, वह सहज ही ज्ञान-मार्ग पा लेता है।
- घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व विवेक बढ़ता है।
- हे सुख देने वाले ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेद, ज्ञान व विवेक के दाता हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल ब्रह्मा चालीसा पढ़ता है, उसे ज्ञान, विवेक, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।
लाभ
- ज्ञान, विवेक व बुद्धि में वृद्धि होती है।
- मन को शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
- विद्यार्थियों को विद्या व सफलता मिलती है।
- सृष्टि व कर्म के प्रति श्रद्धा व समझ बढ़ती है।
कब करें पाठ
कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला) पर · प्रातः पूजा में · किसी शुभ कार्य-आरंभ पर
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक ब्रह्मा चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
