श्री ब्रह्मा चालीसा

śrī brahmā cālīsā

Brahma Chalisa (Pushkar)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला); प्रातः पूजा
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

स्रोत: ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर (राजस्थान)

संपूर्ण चालीसा

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गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। ब्रह्मा-देव की वंदना, देहु ज्ञान-वरदान॥

गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं ब्रह्मा देव की वंदना करता हूँ; हे प्रभु, ज्ञान का वरदान दीजिए।

जय जय ब्रह्मा सृष्टि-रचैया। वेद-विधाता जग के दैया॥

हे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेदों के विधाता व जगत के दाता हैं।

चतुर्मुख रूप विराजे न्यारा। हंस-वाहन शोभा भारा॥

चार मुख वाले रूप में अद्वितीय विराजमान; हंस-वाहन पर अति शोभा है।

कर में वेद-कमण्डलु-माला। सृष्टि रचत तुम परम कृपाला॥

हाथों में वेद, कमण्डलु व माला धारण किए; हे परम कृपालु, आप सृष्टि की रचना करते हैं।

सावित्री-संग शोभा पाते। वेद-ज्ञान जग को सिखलाते॥

देवी सावित्री के संग आप शोभा पाते हैं और जगत को वेद-ज्ञान सिखलाते हैं।

त्रिदेवों में तुम प्रथम कहाये। सृष्टि-रचना का भार उठाये॥

त्रिदेवों में आप प्रथम कहलाते हैं और सृष्टि-रचना का भार उठाते हैं।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।

पुष्कर-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित दरस को घेरा॥

पुष्कर-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।

पुष्कर-सरोवर पावन माना। स्नान करत जन पुण्य कमाना॥

पुष्कर-सरोवर पावन माना जाता है; उसमें स्नान कर जन पुण्य कमाते हैं।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

कार्तिक-पूर्णिमा मेला भारी। भक्त-गण आवें दूर-निवारी॥

कार्तिक-पूर्णिमा को भारी मेला लगता है; भक्तगण दूर-दूर से आते हैं।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।

विद्यार्थी जो तुम्हें मनावैं। बुद्धि-विद्या वे सब पावैं॥

जो विद्यार्थी आपको मनाते हैं, वे बुद्धि व विद्या पाते हैं।

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-शान्ति घर में लाते॥

आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। ब्रह्मा-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही ब्रह्मा-कृपा प्राप्त करता है।

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। ज्ञान-दायक तुम सुख-साधन॥

आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; ज्ञान-दायक व सुख देने वाले हैं।

सरस्वती-पति ज्ञान के सागर। वेद-शास्त्र के तुम हो आगर॥

आप सरस्वती के स्वामी व ज्ञान के सागर हैं; वेद-शास्त्र के भण्डार हैं।

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।

जो यह ब्रह्मा चालीसा गावै। ज्ञान-विवेक सहज वह पावै॥

जो यह ब्रह्मा चालीसा गाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा ब्रह्मा की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। ज्ञान-सुख घर में लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में ज्ञान व सुख लाते हैं।

ब्रह्मा-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

यज्ञ-हवन में तुम्हीं विराजो। सृष्टि-व्यवस्था नित तुम साजो॥

यज्ञ-हवन में आप ही विराजते हैं और नित्य सृष्टि की व्यवस्था सजाते हैं।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत ब्रह्मा देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर ब्रह्मा देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

चार वेद तुम्हीं से आये। ब्रह्म-ज्ञान जग में फैलाये॥

चारों वेद आप ही से आए और आपने जगत में ब्रह्म-ज्ञान फैलाया।

सृष्टि-रचना का भार सँभाला। जग-जीवन का चक्र चलाला॥

आपने सृष्टि-रचना का भार सँभाला और जगत-जीवन का चक्र चलाया।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।

ब्रह्मा-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

जो जन ब्रह्मा-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।

पुष्कर-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

पुष्कर-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।

ज्ञान-विवेक का बल बताते। सन्मार्ग जग को दिखलाते॥

आप ज्ञान व विवेक का बल बताते हैं और जगत को सन्मार्ग दिखलाते हैं।

सृष्टि-विधाता तुम कल्याणी। वेद-ज्ञान के तुम हो दानी॥

आप सृष्टि के विधाता व कल्याणकारी हैं; वेद-ज्ञान के दाता हैं।

जो जन ब्रह्मा गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन ब्रह्मा देव के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

ब्रह्मा-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन ब्रह्मा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

ज्ञान-सुख-शान्ति घर में आवै। भक्ति-विवेक-संतोष बढ़ावै॥

घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति, विवेक व संतोष बढ़ता है।

भय-संकट सब दूर हटावै। ब्रह्मा जो जन नित ध्यावै॥

जो जन ब्रह्मा देव का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।

ज्ञान-मार्ग वह सहज वह पावै। ब्रह्मा-नाम जो जन गावै॥

जो जन ब्रह्मा-नाम गाता है, वह सहज ही ज्ञान-मार्ग पा लेता है।

ज्ञान-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-विवेक सब बढ़ावै॥

घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व विवेक बढ़ता है।

जय जय जय ब्रह्मा सुखदाता। वेद-ज्ञान-विवेक के दाता॥

हे सुख देने वाले ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेद, ज्ञान व विवेक के दाता हैं।

ब्रह्मा चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। ज्ञान-विवेक-सुख-शान्ति सब, सहज मिलैं सदाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल ब्रह्मा चालीसा पढ़ता है, उसे ज्ञान, विवेक, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं ब्रह्मा देव की वंदना करता हूँ; हे प्रभु, ज्ञान का वरदान दीजिए।
  2. हे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेदों के विधाता व जगत के दाता हैं।
  3. चार मुख वाले रूप में अद्वितीय विराजमान; हंस-वाहन पर अति शोभा है।
  4. हाथों में वेद, कमण्डलु व माला धारण किए; हे परम कृपालु, आप सृष्टि की रचना करते हैं।
  5. देवी सावित्री के संग आप शोभा पाते हैं और जगत को वेद-ज्ञान सिखलाते हैं।
  6. त्रिदेवों में आप प्रथम कहलाते हैं और सृष्टि-रचना का भार उठाते हैं।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
  8. पुष्कर-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।
  9. पुष्कर-सरोवर पावन माना जाता है; उसमें स्नान कर जन पुण्य कमाते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. कार्तिक-पूर्णिमा को भारी मेला लगता है; भक्तगण दूर-दूर से आते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
  14. जो विद्यार्थी आपको मनाते हैं, वे बुद्धि व विद्या पाते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही ब्रह्मा-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; ज्ञान-दायक व सुख देने वाले हैं।
  18. आप सरस्वती के स्वामी व ज्ञान के सागर हैं; वेद-शास्त्र के भण्डार हैं।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह ब्रह्मा चालीसा गाता है, वह सहज ही ज्ञान व विवेक पाता है।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में ज्ञान व सुख लाते हैं।
  23. जिन पर ब्रह्मा देव की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. यज्ञ-हवन में आप ही विराजते हैं और नित्य सृष्टि की व्यवस्था सजाते हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर ब्रह्मा देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  27. चारों वेद आप ही से आए और आपने जगत में ब्रह्म-ज्ञान फैलाया।
  28. आपने सृष्टि-रचना का भार सँभाला और जगत-जीवन का चक्र चलाया।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन ब्रह्मा-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. पुष्कर-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप ज्ञान व विवेक का बल बताते हैं और जगत को सन्मार्ग दिखलाते हैं।
  34. आप सृष्टि के विधाता व कल्याणकारी हैं; वेद-ज्ञान के दाता हैं।
  35. जो जन ब्रह्मा देव के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन ब्रह्मा-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति, विवेक व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन ब्रह्मा देव का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन ब्रह्मा-नाम गाता है, वह सहज ही ज्ञान-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में ज्ञान, सुख व शांति आती है और भक्ति व विवेक बढ़ता है।
  41. हे सुख देने वाले ब्रह्मा, आपकी जय हो; आप वेद, ज्ञान व विवेक के दाता हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल ब्रह्मा चालीसा पढ़ता है, उसे ज्ञान, विवेक, सुख व शांति सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • ज्ञान, विवेक व बुद्धि में वृद्धि होती है।
  • मन को शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • विद्यार्थियों को विद्या व सफलता मिलती है।
  • सृष्टि व कर्म के प्रति श्रद्धा व समझ बढ़ती है।

कब करें पाठ

कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला) परप्रातः पूजा मेंकिसी शुभ कार्य-आरंभ पर

पाठ विधि

भगवान ब्रह्मा के समक्ष श्वेत/पीले पुष्प व दीप अर्पित करें, वेद-वंदना करते हुए चालीसा का पाठ करें। कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर में पूजा का विशेष महत्व है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक ब्रह्मा चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

श्री ब्रह्मा चालीसा — सामान्य प्रश्न

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