श्री ब्रह्मा चालीसा

śrī brahmā cālīsā

Brahma Chalisa (Pushkar)

समय
11–13 मिनट
श्लोक/चौपाई
54
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला); नित्य प्रातः
उद्देश्य:विद्या व ज्ञान (Knowledge)शुभ आरंभ (Auspicious start)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (52/52 श्लोक)

श्री ब्रह्मा चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर बावन चौपाइयों में चलती है — नाम चालीसा है, पर चौपाइयाँ चालीस नहीं। चौपाइयाँ "जय जय कमलासान जगमूला, रहहु सदा जनपै अनुकूला" से शुरू होती हैं। इसका बीच का पूरा हिस्सा एक कथा है: ब्रह्मा का अपना अभिमान और उसका टूटना।

परिचय

स्रोत: परंपरागत ब्रह्मा चालीसा; पुष्कर (राजस्थान) का उल्लेख अंतिम चौपाइयों में

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री ब्रह्मा चालीसा
IASTśrī brahmā cālīsā
मूल स्रोतपरंपरागत ब्रह्मा चालीसा; पुष्कर (राजस्थान) का उल्लेख अंतिम चौपाइयों में
शुभ दिनकार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला); नित्य प्रातः
पाठ समय11–13 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक बात में बिल्कुल अलग है — इसका नायक स्वयं भूल करता है, और चालीसा उस भूल को छिपाती नहीं।

रूप और परिवार (चौपाई 1–13). चतुर्भुज, चारों दिशाओं में मुख, रक्त-वर्ण शरीर, श्वेत दाढ़ी, श्वेत वस्त्र और यज्ञोपवीत। फिर परिवार — अर्धांगिनी सावित्री, जिनका दूसरा नाम गायत्री है (9), और पुत्री सरस्वती (10)। चौपाई 7 बताती है कि चारों वेद इन्हीं ने प्रकट किए।

कमल-नाल की कथा (चौपाई 14–22). यही इस चालीसा का केंद्र है। ब्रह्मा को मोह हुआ कि संसार में और कोई है ही नहीं (15)। उन्होंने कमल की नाल पकड़कर उसका अंत खोजने का प्रण किया और करोड़ों वर्ष भ्रमण किया, पर अंत नहीं मिला (17–18)। लौटकर उन्होंने निश्चय कर लिया — "अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं, सब कुछ अहै निहित मो माहीं" (21) — और "निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये" (22)।

नभ-वाणी (चौपाई 23–29). तब आकाश से वाणी आई: सृष्टि का स्वामी वह अनादि, अलख ब्रह्म है; उसी ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों को रचा (24–25)। और जिस कमल पर तुम बैठे हो, वह विष्णु की नाभि से निकला है (27–28)।

विष्णु-दर्शन और त्रिदेव का विभाजन (चौपाई 30–45). ब्रह्मा नाल पकड़कर नीचे उतरते हैं और शेष-शय्या पर शयन करते विष्णु के दर्शन पाते हैं (31–37)। विष्णु जो कहते हैं, वही इस चालीसा का सार है — "ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना, ब्रह्मारुप हम दोउ समाना" (38), और फिर काम का बँटवारा: सृष्टि तुमसे, पालन हमसे, संहार शिव से (40–41)। अंत में वह पंक्ति जो पूरी बात खोल देती है — "हम साकार रुप त्रयदेवा, करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा" (43): तीनों देव भी उसी निराकार ब्रह्म के सेवक हैं।

पुष्कर (चौपाई 51–52). अंत में भारत में ब्रह्मा के एकमात्र प्रमुख मंदिर का उल्लेख — "पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई, तहँ तुम बसहु सदा सुरराई" — और वहाँ के कुण्ड में स्नान कर पूजन करने का फल।

संपूर्ण चालीसा

PDF डाउनलोड

जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल। करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल॥

हे ब्रह्मा, हे स्वयम्भू, आपकी जय हो; हे चतुरानन, आप सुख के मूल हैं। अपने दास पर कृपा कीजिए और सदा अनुकूल रहिए।

तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि घाता नाम। विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम॥

आप ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं; अज, विधि और धाता आपके नाम हैं। हे विश्वविधाता, इस जन पर सुंदर कृपा कीजिए।

जय जय कमलासान जगमूला। रहहु सदा जनपै अनुकूला॥

हे कमल के आसन पर विराजने वाले, हे जगत के मूल — आपकी जय हो, जय हो; सदा अपने जन पर अनुकूल रहिए।

रुप चतुर्भुज परम सुहावन। तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥

आपका चतुर्भुज रूप परम सुहावना है; आपके चारों दिशाओं में मुख हैं।

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा। मस्तक जटाजुट गंभीरा॥

आपका सुंदर शरीर रक्त-वर्ण का है; मस्तक पर गंभीर जटा-जूट है।

ताके ऊपर मुकुट बिराजै। दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥

उसके ऊपर मुकुट विराजता है; श्वेत दाढ़ी महान छवि देती है।

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर। है यज्ञोपवीत अति मनहर॥

आपने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं और अत्यंत मनोहर यज्ञोपवीत है।

कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं। गल मोतिन की माला राजहिं॥

कानों में सुंदर कुण्डल विराजते हैं; गले में मोतियों की माला सजती है।

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये। दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥

चारों वेद आपने ही प्रकट किए; तीनों भुवनों को दिव्य ज्ञान सिखाया।

ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा। अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥

ब्रह्मलोक आपका शुभ धाम है; समस्त भुवनों में आपका यश फैला है।

अर्द्धांगिनि तव है सावित्री। अपर नाम हिये गायत्री॥

आपकी अर्धांगिनी सावित्री हैं, जिनका दूसरा नाम हृदय में गायत्री है।

सरस्वती तब सुता मनोहर। वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥

सरस्वती आपकी मनोहर पुत्री हैं — वीणा बजाने वाली और हर तरह से सुंदर।

कमलासन पर रहे बिराजे। तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥

आप कमल के आसन पर विराजते हैं और हरि-भक्ति का सारा साज सजाए रहते हैं।

क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा। नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥

क्षीर-सागर में देवों के राजा (विष्णु) सो रहे थे; उनकी नाभि से वह अनुपम कमल प्रकट हुआ।

तेहि पर तुम आसीन कृपाला। सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥

हे कृपालु, उसी पर आप आसीन हैं; सदा संतों का पालन कीजिए।

एक बार की कथा प्रचारी। तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥

एक बार की कथा प्रचलित है — आपके मन पर भारी मोह छा गया था।

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा। और न कोउ अहै संसारा॥

कमल के आसन को देखकर आपने विचार किया कि संसार में और कोई है ही नहीं।

तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा। अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥

तब आपने कमल की नाल पकड़ी और उसका अंत देखने का प्रण किया।

कोटिक वर्ष गये यहि भांती। भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥

इसी प्रकार करोड़ों वर्ष बीत गए; भ्रमण करते-करते दिन-रात बीतते रहे।

पै तुम ताकर अन्त न पाये। ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥

पर आप उसका अंत न पा सके; निराश होकर अत्यंत दुखी हो गए।

पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा। महापघ यह अति प्राचीन॥

फिर मन में यह विचार किया — यह महापद्म अत्यंत प्राचीन है।

याको जन्म भयो को कारन। तबहीं मोहि करयो यह धारन॥

इसका जन्म किस कारण हुआ? तभी मुझे भी यही धारणा हुई —

अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं। सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥

समस्त भुवनों में कोई और है ही नहीं; सब कुछ मुझी में निहित है।

यह निश्चय करि गरब बढ़ायो। निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥

यह निश्चय करके गर्व बढ़ा लिया; स्वयं को ही ब्रह्म मानकर सुख पाने लगे।

गगन गिरा तब भई गंभीरा। ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥

तब आकाश से गंभीर वाणी हुई — "हे ब्रह्मा, धीरज धरकर यह वचन सुनो।"

सकल सृष्टि कर स्वामी जोई। ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥

"समस्त सृष्टि का जो स्वामी है, वह ब्रह्म अनादि और अलख है।"

निज इच्छा इन सब निरमाये। ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥

"उसी ने अपनी इच्छा से इन सबको रचा — ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनाए।"

सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा। सब जग इनकी करिहै सेवा॥

"सृष्टि के लिए ही तीनों देव प्रकट हुए; सारा जगत इनकी सेवा करेगा।"

महापघ जो तुम्हरो आसन। ता पै अहै विष्णु को शासन॥

"यह महापद्म जो तुम्हारा आसन है, उस पर विष्णु का शासन है।"

विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई। तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥

"यह विष्णु की नाभि से ही प्रकट होकर आया है" — यह सत्य आपको समझा दिया गया।

भैतहू जाई विष्णु हितमानी। यह कहि बन्द भई नभवानी॥

"जाकर विष्णु से भेंट करो, उनका हित मानकर" — यह कहकर नभ-वाणी बंद हो गई।

ताहि श्रवण कहि अचरज माना। पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥

उसे सुनकर आपने अचरज माना; फिर चतुरानन ने प्रस्थान किया।

कमल नाल धरि नीचे आवा। तहां विष्णु के दर्शन पावा॥

कमल की नाल पकड़कर नीचे आए और वहाँ विष्णु के दर्शन पाए।

शयन करत देखे सुरभूपा। श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥

देखा कि देवों के राजा शयन कर रहे हैं; उनका श्याम-वर्ण शरीर परम अनुपम है।

सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर। क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥

अत्यंत सुंदर चतुर्भुजाएँ शोभित हैं; मस्तक पर किरीट-मुकुट राजता है।

गल बैजन्ती माल बिराजै। कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥

गले में वैजयंती माला विराजती है; करोड़ों सूर्यों की शोभा भी उसके आगे लजाती है।

शंख चक्र अरु गदा मनोहर। शेष नाग शय्या अति मनहर॥

शंख, चक्र और मनोहर गदा हैं; शेषनाग की शय्या अत्यंत मनहर है।

दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू। हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥

यह दिव्य रूप देखकर आपने प्रणाम किया; सुख के धाम श्रीपति हर्षित हुए।

बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन। तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥

चतुरानन ने बहुत प्रकार से विनय की; तब लक्ष्मीपति ने प्रसन्न मन से कहा —

ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना। ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥

"हे ब्रह्मा, अभिमान दूर कीजिए; ब्रह्म-रूप में हम दोनों समान हैं।"

तीजे श्री शिवशंकर आहीं। ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥

"तीसरे श्री शिवशंकर हैं; तीनों भुवनों में ब्रह्म-रूप यही हैं।"

तुम सों होई सृष्टि विस्तारा। हम पालन करिहैं संसारा॥

"तुमसे सृष्टि का विस्तार होगा; हम संसार का पालन करेंगे।"

शिव संहार करहिं सब केरा। हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥

"शिव सबका संहार करेंगे; हम तीनों के लिए बहुत काम है।"

अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु। निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥

"निर्गुण रूप को ही श्री ब्रह्म कहो; उसे तुम निराकार जानो।"

हम साकार रुप त्रयदेवा। करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥

"हम तीनों देव साकार रूप हैं और सदा उसी ब्रह्म की सेवा करेंगे।"

यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये। परब्रह्म के यश अति गाये॥

यह सुनकर ब्रह्मा परम प्रसन्न हुए और परब्रह्म का यश खूब गाया।

सो सब विदित वेद के नामा। मुक्ति रुप सो परम ललामा॥

वह सब वेदों के नाम से विदित है; वही मुक्ति-रूप और परम सुंदर है।

यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा। पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥

हे प्रभु, इसी विधि से आपका जन्म हुआ; फिर आपने संसार को प्रकट किया।

नाम पितामह सुन्दर पायेउ। जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥

आपको "पितामह" का सुंदर नाम मिला; जड़ और चेतन — सबको आपने रचा।

लीन्ह अनेक बार अवतारा। सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥

आपने अनेक बार अवतार लिए और जगत में सुंदर सुयश फैलाया।

देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं। मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥

देवता और दानव सब आपका ध्यान करते हैं; और आपसे मनचाहा पा लेते हैं।

जो कोउ ध्यान धरै नर नारी। ताकी आस पुजावहु सारी॥

जो कोई नर-नारी आपका ध्यान धरता है, आप उसकी सारी आशा पूरी कर देते हैं।

पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई। तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥

पुष्कर तीर्थ परम सुख देने वाला है; हे सुरराज, वहाँ आप सदा बसते हैं।

कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन। ता कर दूर होई सब दूषण॥

जो वहाँ कुण्ड में स्नान करके पूजन करता है, उसके सारे दोष दूर हो जाते हैं।

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे ब्रह्मा, हे स्वयम्भू, आपकी जय हो; हे चतुरानन, आप सुख के मूल हैं। अपने दास पर कृपा कीजिए और सदा अनुकूल रहिए।
  2. आप ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं; अज, विधि और धाता आपके नाम हैं। हे विश्वविधाता, इस जन पर सुंदर कृपा कीजिए।
  3. हे कमल के आसन पर विराजने वाले, हे जगत के मूल — आपकी जय हो, जय हो; सदा अपने जन पर अनुकूल रहिए।
  4. आपका चतुर्भुज रूप परम सुहावना है; आपके चारों दिशाओं में मुख हैं।
  5. आपका सुंदर शरीर रक्त-वर्ण का है; मस्तक पर गंभीर जटा-जूट है।
  6. उसके ऊपर मुकुट विराजता है; श्वेत दाढ़ी महान छवि देती है।
  7. आपने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं और अत्यंत मनोहर यज्ञोपवीत है।
  8. कानों में सुंदर कुण्डल विराजते हैं; गले में मोतियों की माला सजती है।
  9. चारों वेद आपने ही प्रकट किए; तीनों भुवनों को दिव्य ज्ञान सिखाया।
  10. ब्रह्मलोक आपका शुभ धाम है; समस्त भुवनों में आपका यश फैला है।
  11. आपकी अर्धांगिनी सावित्री हैं, जिनका दूसरा नाम हृदय में गायत्री है।
  12. सरस्वती आपकी मनोहर पुत्री हैं — वीणा बजाने वाली और हर तरह से सुंदर।
  13. आप कमल के आसन पर विराजते हैं और हरि-भक्ति का सारा साज सजाए रहते हैं।
  14. क्षीर-सागर में देवों के राजा (विष्णु) सो रहे थे; उनकी नाभि से वह अनुपम कमल प्रकट हुआ।
  15. हे कृपालु, उसी पर आप आसीन हैं; सदा संतों का पालन कीजिए।
  16. एक बार की कथा प्रचलित है — आपके मन पर भारी मोह छा गया था।
  17. कमल के आसन को देखकर आपने विचार किया कि संसार में और कोई है ही नहीं।
  18. तब आपने कमल की नाल पकड़ी और उसका अंत देखने का प्रण किया।
  19. इसी प्रकार करोड़ों वर्ष बीत गए; भ्रमण करते-करते दिन-रात बीतते रहे।
  20. पर आप उसका अंत न पा सके; निराश होकर अत्यंत दुखी हो गए।
  21. फिर मन में यह विचार किया — यह महापद्म अत्यंत प्राचीन है।
  22. इसका जन्म किस कारण हुआ? तभी मुझे भी यही धारणा हुई —
  23. समस्त भुवनों में कोई और है ही नहीं; सब कुछ मुझी में निहित है।
  24. यह निश्चय करके गर्व बढ़ा लिया; स्वयं को ही ब्रह्म मानकर सुख पाने लगे।
  25. तब आकाश से गंभीर वाणी हुई — "हे ब्रह्मा, धीरज धरकर यह वचन सुनो।"
  26. "समस्त सृष्टि का जो स्वामी है, वह ब्रह्म अनादि और अलख है।"
  27. "उसी ने अपनी इच्छा से इन सबको रचा — ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनाए।"
  28. "सृष्टि के लिए ही तीनों देव प्रकट हुए; सारा जगत इनकी सेवा करेगा।"
  29. "यह महापद्म जो तुम्हारा आसन है, उस पर विष्णु का शासन है।"
  30. "यह विष्णु की नाभि से ही प्रकट होकर आया है" — यह सत्य आपको समझा दिया गया।
  31. "जाकर विष्णु से भेंट करो, उनका हित मानकर" — यह कहकर नभ-वाणी बंद हो गई।
  32. उसे सुनकर आपने अचरज माना; फिर चतुरानन ने प्रस्थान किया।
  33. कमल की नाल पकड़कर नीचे आए और वहाँ विष्णु के दर्शन पाए।
  34. देखा कि देवों के राजा शयन कर रहे हैं; उनका श्याम-वर्ण शरीर परम अनुपम है।
  35. अत्यंत सुंदर चतुर्भुजाएँ शोभित हैं; मस्तक पर किरीट-मुकुट राजता है।
  36. गले में वैजयंती माला विराजती है; करोड़ों सूर्यों की शोभा भी उसके आगे लजाती है।
  37. शंख, चक्र और मनोहर गदा हैं; शेषनाग की शय्या अत्यंत मनहर है।
  38. यह दिव्य रूप देखकर आपने प्रणाम किया; सुख के धाम श्रीपति हर्षित हुए।
  39. चतुरानन ने बहुत प्रकार से विनय की; तब लक्ष्मीपति ने प्रसन्न मन से कहा —
  40. "हे ब्रह्मा, अभिमान दूर कीजिए; ब्रह्म-रूप में हम दोनों समान हैं।"
  41. "तीसरे श्री शिवशंकर हैं; तीनों भुवनों में ब्रह्म-रूप यही हैं।"
  42. "तुमसे सृष्टि का विस्तार होगा; हम संसार का पालन करेंगे।"
  43. "शिव सबका संहार करेंगे; हम तीनों के लिए बहुत काम है।"
  44. "निर्गुण रूप को ही श्री ब्रह्म कहो; उसे तुम निराकार जानो।"
  45. "हम तीनों देव साकार रूप हैं और सदा उसी ब्रह्म की सेवा करेंगे।"
  46. यह सुनकर ब्रह्मा परम प्रसन्न हुए और परब्रह्म का यश खूब गाया।
  47. वह सब वेदों के नाम से विदित है; वही मुक्ति-रूप और परम सुंदर है।
  48. हे प्रभु, इसी विधि से आपका जन्म हुआ; फिर आपने संसार को प्रकट किया।
  49. आपको "पितामह" का सुंदर नाम मिला; जड़ और चेतन — सबको आपने रचा।
  50. आपने अनेक बार अवतार लिए और जगत में सुंदर सुयश फैलाया।
  51. देवता और दानव सब आपका ध्यान करते हैं; और आपसे मनचाहा पा लेते हैं।
  52. जो कोई नर-नारी आपका ध्यान धरता है, आप उसकी सारी आशा पूरी कर देते हैं।
  53. पुष्कर तीर्थ परम सुख देने वाला है; हे सुरराज, वहाँ आप सदा बसते हैं।
  54. जो वहाँ कुण्ड में स्नान करके पूजन करता है, उसके सारे दोष दूर हो जाते हैं।

लाभ

  • ब्रह्मा के अभिमान और उसके टूटने की पूरी कथा — चालीसा इसे छिपाती नहीं (चौपाई 14–45)।
  • त्रिदेव का काम-विभाजन एक जगह — सृष्टि, पालन और संहार (चौपाई 40–41)।
  • सावित्री-गायत्री और सरस्वती का सम्बन्ध चालीसा में ही स्पष्ट (चौपाई 9–10)।
  • पुष्कर तीर्थ और उसके कुण्ड-स्नान का फल (चौपाई 51–52)।

कब करें पाठ

कार्तिक पूर्णिमा (पुष्कर मेला) परनित्य प्रातः पूजा मेंपुष्कर यात्रा से पहले या लौटकरकिसी नए कार्य या रचना के आरंभ पर

पाठ विधि

ब्रह्मा जी के चित्र के समक्ष प्रातः-काल दीप जलाएँ; श्वेत पुष्प और अक्षत अर्पित करें — चालीसा स्वयं उनके श्वेत वस्त्र और श्वेत दाढ़ी का वर्णन करती है (चौपाई 4–5)। परंपरा में ब्रह्मा की पूजा सावित्री-गायत्री के साथ की जाती है, इसलिए पाठ से पहले गायत्री मंत्र का स्मरण उचित है। पहले दोनों दोहे, फिर बावन चौपाइयाँ पढ़ें — समापन दोहा इस चालीसा में है ही नहीं।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (52/52 श्लोक)
स्रोत परंपराpavitragranth.com — ब्रह्मा चालीसा (आधार-पाठ) · bhaktibharat.com — श्री ब्रह्मा चालीसा · dharmsaar.com — श्री ब्रह्म चालीसा · aartichalisa.com — ब्रह्मा चालीसा · blocksinfotech.com — श्री ब्रह्मा चालीसा
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री ब्रह्मा चालीसा — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत