जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू,
चतुरानन सुखमूल।
करहु कृपा निज दास पै,
रहहु सदा अनुकूल॥
हे ब्रह्मा, हे स्वयम्भू, आपकी जय हो; हे चतुरानन, आप सुख के मूल हैं। अपने दास पर कृपा कीजिए और सदा अनुकूल रहिए।
तुम सृजक ब्रह्माण्ड के,
अज विधि घाता नाम।
विश्वविधाता कीजिये,
जन पै कृपा ललाम॥
आप ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं; अज, विधि और धाता आपके नाम हैं। हे विश्वविधाता, इस जन पर सुंदर कृपा कीजिए।
1जय जय कमलासान जगमूला।
रहहु सदा जनपै अनुकूला॥
हे कमल के आसन पर विराजने वाले, हे जगत के मूल — आपकी जय हो, जय हो; सदा अपने जन पर अनुकूल रहिए।
2रुप चतुर्भुज परम सुहावन।
तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥
आपका चतुर्भुज रूप परम सुहावना है; आपके चारों दिशाओं में मुख हैं।
3रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा।
मस्तक जटाजुट गंभीरा॥
आपका सुंदर शरीर रक्त-वर्ण का है; मस्तक पर गंभीर जटा-जूट है।
4ताके ऊपर मुकुट बिराजै।
दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥
उसके ऊपर मुकुट विराजता है; श्वेत दाढ़ी महान छवि देती है।
5श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर।
है यज्ञोपवीत अति मनहर॥
आपने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं और अत्यंत मनोहर यज्ञोपवीत है।
6कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं।
गल मोतिन की माला राजहिं॥
कानों में सुंदर कुण्डल विराजते हैं; गले में मोतियों की माला सजती है।
7चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये।
दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥
चारों वेद आपने ही प्रकट किए; तीनों भुवनों को दिव्य ज्ञान सिखाया।
8ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा।
अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥
ब्रह्मलोक आपका शुभ धाम है; समस्त भुवनों में आपका यश फैला है।
9अर्द्धांगिनि तव है सावित्री।
अपर नाम हिये गायत्री॥
आपकी अर्धांगिनी सावित्री हैं, जिनका दूसरा नाम हृदय में गायत्री है।
10सरस्वती तब सुता मनोहर।
वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥
सरस्वती आपकी मनोहर पुत्री हैं — वीणा बजाने वाली और हर तरह से सुंदर।
11कमलासन पर रहे बिराजे।
तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥
आप कमल के आसन पर विराजते हैं और हरि-भक्ति का सारा साज सजाए रहते हैं।
12क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा।
नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥
क्षीर-सागर में देवों के राजा (विष्णु) सो रहे थे; उनकी नाभि से वह अनुपम कमल प्रकट हुआ।
13तेहि पर तुम आसीन कृपाला।
सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥
हे कृपालु, उसी पर आप आसीन हैं; सदा संतों का पालन कीजिए।
14एक बार की कथा प्रचारी।
तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥
एक बार की कथा प्रचलित है — आपके मन पर भारी मोह छा गया था।
15कमलासन लखि कीन्ह बिचारा।
और न कोउ अहै संसारा॥
कमल के आसन को देखकर आपने विचार किया कि संसार में और कोई है ही नहीं।
16तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा।
अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥
तब आपने कमल की नाल पकड़ी और उसका अंत देखने का प्रण किया।
17कोटिक वर्ष गये यहि भांती।
भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥
इसी प्रकार करोड़ों वर्ष बीत गए; भ्रमण करते-करते दिन-रात बीतते रहे।
18पै तुम ताकर अन्त न पाये।
ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥
पर आप उसका अंत न पा सके; निराश होकर अत्यंत दुखी हो गए।
19पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा।
महापघ यह अति प्राचीन॥
फिर मन में यह विचार किया — यह महापद्म अत्यंत प्राचीन है।
20याको जन्म भयो को कारन।
तबहीं मोहि करयो यह धारन॥
इसका जन्म किस कारण हुआ? तभी मुझे भी यही धारणा हुई —
21अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं।
सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥
समस्त भुवनों में कोई और है ही नहीं; सब कुछ मुझी में निहित है।
22यह निश्चय करि गरब बढ़ायो।
निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥
यह निश्चय करके गर्व बढ़ा लिया; स्वयं को ही ब्रह्म मानकर सुख पाने लगे।
23गगन गिरा तब भई गंभीरा।
ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥
तब आकाश से गंभीर वाणी हुई — "हे ब्रह्मा, धीरज धरकर यह वचन सुनो।"
24सकल सृष्टि कर स्वामी जोई।
ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥
"समस्त सृष्टि का जो स्वामी है, वह ब्रह्म अनादि और अलख है।"
25निज इच्छा इन सब निरमाये।
ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥
"उसी ने अपनी इच्छा से इन सबको रचा — ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनाए।"
26सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा।
सब जग इनकी करिहै सेवा॥
"सृष्टि के लिए ही तीनों देव प्रकट हुए; सारा जगत इनकी सेवा करेगा।"
27महापघ जो तुम्हरो आसन।
ता पै अहै विष्णु को शासन॥
"यह महापद्म जो तुम्हारा आसन है, उस पर विष्णु का शासन है।"
28विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई।
तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥
"यह विष्णु की नाभि से ही प्रकट होकर आया है" — यह सत्य आपको समझा दिया गया।
29भैतहू जाई विष्णु हितमानी।
यह कहि बन्द भई नभवानी॥
"जाकर विष्णु से भेंट करो, उनका हित मानकर" — यह कहकर नभ-वाणी बंद हो गई।
30ताहि श्रवण कहि अचरज माना।
पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥
उसे सुनकर आपने अचरज माना; फिर चतुरानन ने प्रस्थान किया।
31कमल नाल धरि नीचे आवा।
तहां विष्णु के दर्शन पावा॥
कमल की नाल पकड़कर नीचे आए और वहाँ विष्णु के दर्शन पाए।
32शयन करत देखे सुरभूपा।
श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥
देखा कि देवों के राजा शयन कर रहे हैं; उनका श्याम-वर्ण शरीर परम अनुपम है।
33सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर।
क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥
अत्यंत सुंदर चतुर्भुजाएँ शोभित हैं; मस्तक पर किरीट-मुकुट राजता है।
34गल बैजन्ती माल बिराजै।
कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥
गले में वैजयंती माला विराजती है; करोड़ों सूर्यों की शोभा भी उसके आगे लजाती है।
35शंख चक्र अरु गदा मनोहर।
शेष नाग शय्या अति मनहर॥
शंख, चक्र और मनोहर गदा हैं; शेषनाग की शय्या अत्यंत मनहर है।
36दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू।
हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥
यह दिव्य रूप देखकर आपने प्रणाम किया; सुख के धाम श्रीपति हर्षित हुए।
37बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन।
तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥
चतुरानन ने बहुत प्रकार से विनय की; तब लक्ष्मीपति ने प्रसन्न मन से कहा —
38ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना।
ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥
"हे ब्रह्मा, अभिमान दूर कीजिए; ब्रह्म-रूप में हम दोनों समान हैं।"
39तीजे श्री शिवशंकर आहीं।
ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥
"तीसरे श्री शिवशंकर हैं; तीनों भुवनों में ब्रह्म-रूप यही हैं।"
40तुम सों होई सृष्टि विस्तारा।
हम पालन करिहैं संसारा॥
"तुमसे सृष्टि का विस्तार होगा; हम संसार का पालन करेंगे।"
41शिव संहार करहिं सब केरा।
हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥
"शिव सबका संहार करेंगे; हम तीनों के लिए बहुत काम है।"
42अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु।
निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥
"निर्गुण रूप को ही श्री ब्रह्म कहो; उसे तुम निराकार जानो।"
43हम साकार रुप त्रयदेवा।
करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥
"हम तीनों देव साकार रूप हैं और सदा उसी ब्रह्म की सेवा करेंगे।"
44यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये।
परब्रह्म के यश अति गाये॥
यह सुनकर ब्रह्मा परम प्रसन्न हुए और परब्रह्म का यश खूब गाया।
45सो सब विदित वेद के नामा।
मुक्ति रुप सो परम ललामा॥
वह सब वेदों के नाम से विदित है; वही मुक्ति-रूप और परम सुंदर है।
46यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा।
पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥
हे प्रभु, इसी विधि से आपका जन्म हुआ; फिर आपने संसार को प्रकट किया।
47नाम पितामह सुन्दर पायेउ।
जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥
आपको "पितामह" का सुंदर नाम मिला; जड़ और चेतन — सबको आपने रचा।
48लीन्ह अनेक बार अवतारा।
सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥
आपने अनेक बार अवतार लिए और जगत में सुंदर सुयश फैलाया।
49देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं।
मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥
देवता और दानव सब आपका ध्यान करते हैं; और आपसे मनचाहा पा लेते हैं।
50जो कोउ ध्यान धरै नर नारी।
ताकी आस पुजावहु सारी॥
जो कोई नर-नारी आपका ध्यान धरता है, आप उसकी सारी आशा पूरी कर देते हैं।
51पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई।
तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥
पुष्कर तीर्थ परम सुख देने वाला है; हे सुरराज, वहाँ आप सदा बसते हैं।
52कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन।
ता कर दूर होई सब दूषण॥
जो वहाँ कुण्ड में स्नान करके पूजन करता है, उसके सारे दोष दूर हो जाते हैं।