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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री दत्तात्रेय आरती

आरती

पाठ

1

जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता। त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति, तू ही जग-कर्ता॥

2

अत्रि-अनसूया नंदन, तीन शीश धारी। छह भुज शोभा पाते, गौ-श्वान संग प्यारी॥

3

चौबीस गुरु किए धारण, ज्ञान अपरम्पारा। गुरु-परम्परा के स्वामी, करते भव-तारा॥

4

जो जन तुमको ध्याता, संकट सब टारे। रोग-शोक भय हरते, भक्तन के प्यारे॥

5

दत्तात्रेय की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ज्ञान-भक्ति वह पावे, गुरु-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे श्री गुरुदत्त, आपकी जय हो! आप त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ति (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) हैं और आप ही जगत के कर्ता हैं।
  2. अत्रि व अनसूया के पुत्र, तीन सिर धारण किए; छह भुजाओं से सुशोभित, गौ व चार श्वान (वेद) के संग प्यारी छवि वाले।
  3. आपने चौबीस गुरु धारण किए और अपरम्पार ज्ञान दिया; आप गुरु-परम्परा के स्वामी हैं और भवसागर से तारते हैं।
  4. जो भक्त आपका ध्यान करता है, उसके सब संकट दूर हो जाते हैं; हे भक्तों के प्यारे, आप रोग-शोक व भय हर लेते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से दत्तात्रेय की यह आरती गाता है, वह ज्ञान-भक्ति तथा गुरु-कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • गुरु-कृपा, ज्ञान व आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
  • भय, संकट व नकारात्मकता दूर होती है।
  • मन को शांति, भक्ति व विवेक की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर · गुरुवार को · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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