देवउठनी एकादशी
पाठ
व्रत कथा
नारद-ब्रह्मा संवाद
पुराणों में वर्णित है कि देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का माहात्म्य पूछा। ब्रह्मा जी ने बताया कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
उन्होंने कहा कि इस व्रत के पुण्य की तुलना सहस्र अश्वमेध व सैकड़ों राजसूय यज्ञों से की जाती है; श्रद्धापूर्वक व्रत व रात्रि-जागरण करने वाले भक्त की अनेक पीढ़ियाँ तक विष्णुलोक को प्राप्त होती हैं।
देवों का जागरण
इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन से जागते हैं। भक्त प्रातः स्नान कर विष्णु का पूजन करते हैं, दीप जलाकर "उठो देव, बैठो देव" के भाव से भगवान को जगाते हैं, तुलसीदल अर्पित करते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं।
यही दिन शुभ कार्यों के पुनरारंभ का प्रतीक है, अतः इसे अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
लाभ
- सहस्र अश्वमेध यज्ञ के तुल्य पुण्य
- पापों का नाश व कुल का उद्धार
- चातुर्मास का पुण्यमय समापन व शुभ कार्यों का आरंभ
स्रोत
प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी माहात्म्य — नारद-ब्रह्मा संवाद · एकादशी माहात्म्य परंपरा (स्कंद/पद्म पुराण)
