देवउठनी एकादशी

Devuthani Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे प्रबोधिनी एकादशी व देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल (देवशयनी) से चार मास की योगनिद्रा के पश्चात भगवान विष्णु इसी दिन जागृत होते हैं।

इसी के साथ चातुर्मास का समापन होता है और विवाह, गृह-प्रवेश आदि शुभ मांगलिक कार्यों की ऋतु पुनः आरंभ होती है। परंपरा में इसी दिन के आसपास तुलसी-विवाह (तुलसी व शालिग्राम का विवाह) किया जाता है।

व्रत कथा

नारद-ब्रह्मा संवाद

पुराणों में वर्णित है कि देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का माहात्म्य पूछा। ब्रह्मा जी ने बताया कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।

उन्होंने कहा कि इस व्रत के पुण्य की तुलना सहस्र अश्वमेध व सैकड़ों राजसूय यज्ञों से की जाती है; श्रद्धापूर्वक व्रत व रात्रि-जागरण करने वाले भक्त की अनेक पीढ़ियाँ तक विष्णुलोक को प्राप्त होती हैं।

देवों का जागरण

इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन से जागते हैं। भक्त प्रातः स्नान कर विष्णु का पूजन करते हैं, दीप जलाकर "उठो देव, बैठो देव" के भाव से भगवान को जगाते हैं, तुलसीदल अर्पित करते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं।

यही दिन शुभ कार्यों के पुनरारंभ का प्रतीक है, अतः इसे अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।

लाभ

  • सहस्र अश्वमेध यज्ञ के तुल्य पुण्य
  • पापों का नाश व कुल का उद्धार
  • चातुर्मास का पुण्यमय समापन व शुभ कार्यों का आरंभ

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी)
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपराप्रबोधिनी एकादशी माहात्म्य (नारद-ब्रह्मा संवाद)
स्रोतप्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी माहात्म्य — नारद-ब्रह्मा संवाद · एकादशी माहात्म्य परंपरा (स्कंद/पद्म पुराण)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि, तिथि व तुलसी-विवाह मुहूर्त हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।