नारद-ब्रह्मा संवाद
पुराणों में वर्णित है कि एक बार देवर्षि नारद ने अपने पिता ब्रह्मा जी से पूछा — "हे पितामह! कार्तिक शुक्ल की प्रबोधिनी एकादशी का क्या माहात्म्य है? इस व्रत को करने वाले को क्या फल प्राप्त होता है?"
ब्रह्मा जी ने कहा — "हे नारद! यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस दिन भगवान चार मास की योगनिद्रा से जागते हैं, अतः इसका पुण्य असीम है।"
उन्होंने आगे कहा कि इस व्रत के पुण्य की तुलना सहस्र अश्वमेध व सैकड़ों राजसूय यज्ञों से की जाती है; श्रद्धापूर्वक व्रत व रात्रि-जागरण करने वाले भक्त की अनेक पीढ़ियाँ तक विष्णुलोक को प्राप्त होती हैं।
राजा का राज्य और एकादशी का नियम
ब्रह्मा जी ने नारद जी को एक कथा सुनाई। प्राचीन काल में एक धर्मनिष्ठ राजा था, जिसके राज्य में एकादशी के दिन कोई भी अन्न ग्रहण नहीं करता था — न प्रजा, न सेवक, और न ही पशु। राजा का यह नियम पूरे राज्य में कठोरता से पालन किया जाता था।
एक दिन दूसरे राज्य से आया एक व्यक्ति राजा के पास नौकरी माँगने आया। राजा ने उसे रख लिया, किंतु शर्त रखी — "भोजन-वस्त्र सब मिलेगा, परंतु एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा।" उस समय तो उसने स्वीकार कर लिया, पर जब पहली एकादशी आई और उसे केवल फलाहार मिला, तो वह भूख से व्याकुल हो उठा।
वह राजा के पास जाकर गिड़गिड़ाया — "महाराज! फल खाने से मेरा पेट नहीं भरता, मैं भूख से मर जाऊँगा। मुझे अन्न दीजिए।" राजा ने उसकी दशा देखकर दया की और उसे आटा, दाल व चावल दे दिए।
भगवान का साथ भोजन करना
वह व्यक्ति सामग्री लेकर नदी-तट पर पहुँचा, स्नान किया और भोजन पकाया। भोजन तैयार होने पर उसने भाव-विभोर होकर पुकारा — "हे भगवान! आइए, भोजन तैयार है, मेरे साथ भोजन कीजिए।" उसकी सरल पुकार पर भगवान प्रकट हो गए और उसके साथ बैठकर प्रेम से भोजन किया। भोजन कर भगवान अंतर्धान हो गए और वह व्यक्ति अपने कार्य पर लौट आया।
अगली एकादशी को उसने राजा से दुगुनी सामग्री माँगी। राजा ने आश्चर्य से पूछा — "पहले तो इतने में ही काम चल जाता था, अब दुगुना क्यों?" उसने सरलता से उत्तर दिया — "महाराज, अब भोजन में हमारे भगवान भी मेरे साथ बैठकर खाते हैं, इसलिए दुगुना चाहिए।"
राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा — "मैं स्वयं छिपकर देखूँगा।" उस दिन राजा नदी-तट पर वृक्ष की ओट में छिपकर बैठ गया।
राजा की परीक्षा और भगवान का प्रकट होना
सेवक ने प्रतिदिन की भाँति भोजन पकाकर भगवान को पुकारा — किंतु उस दिन भगवान नहीं आए। उसने बार-बार पुकारा, आँसू बहाए, पर कोई उत्तर नहीं मिला। अंत में वह टूट गया और बोला — "हे प्रभु! यदि आज आप नहीं आए तो मैं इस जीवन को त्याग दूँगा; आपके बिना यह अन्न मेरे किस काम का!" यह कहकर वह नदी में कूदकर प्राण त्यागने को उद्यत हो गया।
तत्क्षण भगवान प्रकट हुए, उसे रोका और उसके साथ प्रेमपूर्वक भोजन किया। फिर उसे अपने साथ विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए।
छिपकर देख रहा राजा यह सब देखकर स्तब्ध रह गया। उसे बोध हुआ कि वह वर्षों से केवल नियम-पालन कर रहा था, किंतु उसका मन उस सेवक जैसा निर्मल व भावपूर्ण नहीं था। ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा — "हे नारद! व्रत-उपवास तभी फलदायी होते हैं जब मन शुद्ध हो और भाव सच्चा हो। केवल नियम का बाहरी पालन पर्याप्त नहीं है।"
देवों का जागरण
इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन से जागते हैं। भक्त प्रातः स्नान कर विष्णु का पूजन करते हैं, संध्या को दीप जलाकर शंख-घंटा बजाते हुए "उठो देव, बैठो देव" के भाव से भगवान को जगाते हैं, तुलसीदल अर्पित करते हैं और रात्रि भर भजन-कीर्तन करते हैं।
यही दिन चातुर्मास की समाप्ति तथा विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के पुनरारंभ का प्रतीक है, अतः इसे अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। इसी उपलक्ष्य में तुलसी-विवाह की परंपरा भी निभाई जाती है।