पद्मिनी एकादशी

Padmini Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी) — अधिक मास

⚠ अंश

परिचय व महत्व

पद्मिनी एकादशी अधिक मास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। अधिक मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है, अतः यह एकादशी प्रत्येक वर्ष नहीं आती और इसीलिए इसे अत्यंत दुर्लभ व फलदायी माना जाता है।

यह व्रत विशेष रूप से संतान-प्राप्ति तथा उन मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है जो अन्य उपायों से पूर्ण न हो रही हों। कथा में स्वयं रानी को दस हज़ार वर्ष की तपस्या से जो न मिला, वह इस एक व्रत से प्राप्त हुआ।

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेसभी स्त्री-पुरुष — विशेषकर संतान-सुख के इच्छुक दंपती तथा वे जिनकी मनोकामना अन्य उपायों से पूर्ण न हो रही हो।
कब रखेंअधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी को; अगले दिन द्वादशी को पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
आहार नियम:
  • अन्न, चावल व दाल का त्याग — फलाहार अथवा निराहार (सामर्थ्यानुसार)
  • प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन वर्जित
  • दशमी की संध्या से ही सात्त्विक आहार व ब्रह्मचर्य का पालन
अनुशंसित अभ्यास:
  • रात्रि जागरण — कथा में देवी अनसूया ने इसे विशेष रूप से आवश्यक बताया है
  • भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप का पूजन तथा कमल-पुष्प अर्पण
  • रात्रि के चारों प्रहर में अलग-अलग नैवेद्य व दीपदान
  • ब्राह्मण-भोजन तथा यथाशक्ति अन्न, वस्त्र व स्वर्ण का दान

पूजन सामग्री

विष्णु (पुरुषोत्तम स्वरूप) प्रतिमा/चित्रतुलसीदलकमल अथवा पीले पुष्पपीत वस्त्र, चंदन, अक्षतधूप, दीप, कर्पूरपंचामृत व ऋतुफलजल-कलशदान हेतु अन्न, वस्त्र व दक्षिणा

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. दशमी की संध्या से सात्त्विक आहार लें और एकादशी प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा-स्थल शुद्ध कर भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की प्रतिमा स्थापित करें।
  3. पंचामृत से अभिषेक कर पीत वस्त्र, चंदन, अक्षत, कमल/पीले पुष्प व तुलसीदल अर्पित करें।
  4. धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित कर आरती करें और पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा सुनें।
  5. दिनभर निराहार अथवा फलाहार रहकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें।
  6. रात्रि भर जागरण करें और चारों प्रहर में भगवान को अलग-अलग नैवेद्य अर्पित कर दीप जलाएँ — इस व्रत में जागरण अनिवार्य कहा गया है।
  7. द्वादशी को स्नानोपरांत ब्राह्मण-भोजन कराकर अन्न, वस्त्र व दक्षिणा का दान करें।
  8. तत्पश्चात पारण-मुहूर्त में स्वयं व्रत खोलें।

व्रत कथा

कथा का प्रसंग

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे केशव! अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है?"

भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! उस एकादशी का नाम पद्मिनी है। यही कथा एक बार देवर्षि नारद ने महर्षि पुलस्त्य से सुनी थी। यह व्रत अत्यंत दुर्लभ है और वह भी दे देता है जो कठोर तपस्या से भी न मिले। सुनो।"

माहिष्मती के राजा कृतवीर्य

हैहयवंश में कृतवीर्य नाम के एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए, जो माहिष्मती नगरी पर शासन करते थे। वे धर्मपरायण, दानशील व प्रजा-वत्सल थे। उनकी अनेक रानियाँ थीं, जिनमें प्रमुख थीं रानी प्रमदा — अत्यंत रूपवती, गुणवती व पतिव्रता।

राजा को समस्त वैभव प्राप्त था — राज्य, कोष, सेना, यश — किंतु एक अभाव उन्हें भीतर से खाए जा रहा था: उनके कोई संतान नहीं थी। राज्य का उत्तराधिकारी न होने की चिंता उन्हें रात-दिन सताती थी।

संतान-प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक यज्ञ कराए, ब्राह्मणों को दान दिया, देव-पूजन व तीर्थ-यात्राएँ कीं — किंतु कोई फल न मिला।

गंधमादन पर्वत की कठोर तपस्या

अंततः राजा कृतवीर्य ने निश्चय किया कि वे तपस्या द्वारा ही वरदान प्राप्त करेंगे। रानी प्रमदा ने कहा — "हे स्वामी! पत्नी सुख-दुःख दोनों में सहभागिनी होती है। मैं भी आपके साथ चलूँगी।"

दोनों राजपाट मंत्रियों को सौंपकर गंधमादन पर्वत पर चले गए और वहाँ घोर तपस्या में लीन हो गए। धूप, वर्षा, शीत — कुछ भी उन्हें डिगा न सका।

इस प्रकार दस हज़ार वर्ष बीत गए। राजा का शरीर तप से सूखकर कंकाल मात्र रह गया, किंतु फिर भी कोई देवता प्रसन्न होकर वरदान देने नहीं आया। रानी प्रमदा यह देखकर अत्यंत व्यथित हुईं।

देवी अनसूया का मार्गदर्शन

निराश रानी प्रमदा उसी पर्वत पर तपस्यारत महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी, परम सती देवी अनसूया के पास पहुँचीं। उन्होंने चरण-वंदना कर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई — "हे माता! दस हज़ार वर्ष की तपस्या भी निष्फल गई। कृपया कोई उपाय बताइए।"

देवी अनसूया ने करुणापूर्वक कहा — "हे पुत्री! तपस्या का मार्ग कठिन है, पर उससे भी सरल और श्रेष्ठ एक मार्ग है। अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी आती है। यह अत्यंत दुर्लभ व्रत है।"

"तू विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत कर और रात्रि भर जागरण कर। रात्रि के चारों प्रहर में भगवान को नैवेद्य अर्पित कर, दीप जला और उनका नाम-कीर्तन कर। इसके प्रभाव से भगवान विष्णु स्वयं प्रसन्न होकर तुझे मनोवांछित वर देंगे।"

भगवान का वरदान और कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म

रानी प्रमदा ने देवी अनसूया के बताए अनुसार पूर्ण श्रद्धा, नियम व संयम के साथ पद्मिनी एकादशी का व्रत किया। दिनभर निराहार रहकर उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और रात्रि के चारों प्रहर जागकर नैवेद्य, दीप व कीर्तन से भगवान की आराधना की।

द्वादशी के प्रातः भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले — "हे देवी! तुम्हारे इस व्रत से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो चाहो, वर माँगो।"

रानी ने अपने लिए कुछ न माँगकर हाथ जोड़कर कहा — "हे प्रभु! मेरे स्वामी दस हज़ार वर्ष से तप कर रहे हैं। वर मुझे नहीं, उन्हें दीजिए — उनकी इच्छा पूर्ण कीजिए।"

रानी के इस निःस्वार्थ भाव से भगवान और भी प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा कृतवीर्य को वरदान दिया कि उन्हें एक ऐसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा जो देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व व नाग — किसी से भी पराजित नहीं होगा; केवल स्वयं श्रीहरि ही उसे परास्त कर सकेंगे।

यथासमय रानी प्रमदा के गर्भ से कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का जन्म हुआ। वह इतना पराक्रमी हुआ कि उसने बलशाली रावण तक को युद्ध में बंदी बना लिया था।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! पद्मिनी एकादशी का व्रत ऐसा ही फलदायी है। जो इसे श्रद्धापूर्वक करता है, उसकी कठिनतम मनोकामना भी पूर्ण होती है और अंत में वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।"

लाभ

  • दुर्लभ अधिक-मास व्रत का अपार पुण्य
  • संतान-सुख की प्राप्ति
  • कठिनतम मनोकामनाओं की पूर्ति
  • सहस्र वर्ष की तपस्या से भी श्रेष्ठ फल
  • अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी) — अधिक मास
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपरापद्म पुराण / एकादशी माहात्म्य (पुलस्त्य द्वारा नारद को वर्णित)
स्रोतपद्मिनी एकादशी माहात्म्य — महर्षि पुलस्त्य द्वारा देवर्षि नारद को वर्णित (पद्म पुराण / एकादशी माहात्म्य परंपरा) · माहिष्मती के राजा कृतवीर्य, रानी प्रमदा, देवी अनसूया व कार्तवीर्य अर्जुन प्रसंग
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि व तिथि हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।

पद्मिनी एकादशी — सामान्य प्रश्न