कथा का प्रसंग
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे केशव! अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है?"
भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! उस एकादशी का नाम पद्मिनी है। यही कथा एक बार देवर्षि नारद ने महर्षि पुलस्त्य से सुनी थी। यह व्रत अत्यंत दुर्लभ है और वह भी दे देता है जो कठोर तपस्या से भी न मिले। सुनो।"
माहिष्मती के राजा कृतवीर्य
हैहयवंश में कृतवीर्य नाम के एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए, जो माहिष्मती नगरी पर शासन करते थे। वे धर्मपरायण, दानशील व प्रजा-वत्सल थे। उनकी अनेक रानियाँ थीं, जिनमें प्रमुख थीं रानी प्रमदा — अत्यंत रूपवती, गुणवती व पतिव्रता।
राजा को समस्त वैभव प्राप्त था — राज्य, कोष, सेना, यश — किंतु एक अभाव उन्हें भीतर से खाए जा रहा था: उनके कोई संतान नहीं थी। राज्य का उत्तराधिकारी न होने की चिंता उन्हें रात-दिन सताती थी।
संतान-प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक यज्ञ कराए, ब्राह्मणों को दान दिया, देव-पूजन व तीर्थ-यात्राएँ कीं — किंतु कोई फल न मिला।
गंधमादन पर्वत की कठोर तपस्या
अंततः राजा कृतवीर्य ने निश्चय किया कि वे तपस्या द्वारा ही वरदान प्राप्त करेंगे। रानी प्रमदा ने कहा — "हे स्वामी! पत्नी सुख-दुःख दोनों में सहभागिनी होती है। मैं भी आपके साथ चलूँगी।"
दोनों राजपाट मंत्रियों को सौंपकर गंधमादन पर्वत पर चले गए और वहाँ घोर तपस्या में लीन हो गए। धूप, वर्षा, शीत — कुछ भी उन्हें डिगा न सका।
इस प्रकार दस हज़ार वर्ष बीत गए। राजा का शरीर तप से सूखकर कंकाल मात्र रह गया, किंतु फिर भी कोई देवता प्रसन्न होकर वरदान देने नहीं आया। रानी प्रमदा यह देखकर अत्यंत व्यथित हुईं।
देवी अनसूया का मार्गदर्शन
निराश रानी प्रमदा उसी पर्वत पर तपस्यारत महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी, परम सती देवी अनसूया के पास पहुँचीं। उन्होंने चरण-वंदना कर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई — "हे माता! दस हज़ार वर्ष की तपस्या भी निष्फल गई। कृपया कोई उपाय बताइए।"
देवी अनसूया ने करुणापूर्वक कहा — "हे पुत्री! तपस्या का मार्ग कठिन है, पर उससे भी सरल और श्रेष्ठ एक मार्ग है। अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी आती है। यह अत्यंत दुर्लभ व्रत है।"
"तू विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत कर और रात्रि भर जागरण कर। रात्रि के चारों प्रहर में भगवान को नैवेद्य अर्पित कर, दीप जला और उनका नाम-कीर्तन कर। इसके प्रभाव से भगवान विष्णु स्वयं प्रसन्न होकर तुझे मनोवांछित वर देंगे।"
भगवान का वरदान और कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म
रानी प्रमदा ने देवी अनसूया के बताए अनुसार पूर्ण श्रद्धा, नियम व संयम के साथ पद्मिनी एकादशी का व्रत किया। दिनभर निराहार रहकर उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और रात्रि के चारों प्रहर जागकर नैवेद्य, दीप व कीर्तन से भगवान की आराधना की।
द्वादशी के प्रातः भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले — "हे देवी! तुम्हारे इस व्रत से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो चाहो, वर माँगो।"
रानी ने अपने लिए कुछ न माँगकर हाथ जोड़कर कहा — "हे प्रभु! मेरे स्वामी दस हज़ार वर्ष से तप कर रहे हैं। वर मुझे नहीं, उन्हें दीजिए — उनकी इच्छा पूर्ण कीजिए।"
रानी के इस निःस्वार्थ भाव से भगवान और भी प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा कृतवीर्य को वरदान दिया कि उन्हें एक ऐसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा जो देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व व नाग — किसी से भी पराजित नहीं होगा; केवल स्वयं श्रीहरि ही उसे परास्त कर सकेंगे।
यथासमय रानी प्रमदा के गर्भ से कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का जन्म हुआ। वह इतना पराक्रमी हुआ कि उसने बलशाली रावण तक को युद्ध में बंदी बना लिया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! पद्मिनी एकादशी का व्रत ऐसा ही फलदायी है। जो इसे श्रद्धापूर्वक करता है, उसकी कठिनतम मनोकामना भी पूर्ण होती है और अंत में वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।"