कथा का प्रसंग
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे माधव! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है?"
भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! इस एकादशी का नाम वरूथिनी है। यह इस लोक में सौभाग्य तथा परलोक में मोक्ष देने वाली है। इसके व्रत से जीव के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इसका फल दस हज़ार वर्ष की तपस्या के समान तथा सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में किए गए स्वर्णदान के तुल्य है। अब इसी व्रत से जुड़ी एक प्राचीन कथा सुनो।"
राजा मान्धाता की तपस्या
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत दानशील, धर्मपरायण व तपस्वी थे। प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी और उनके राज्य में कोई दुखी नहीं था।
राजकाज से समय निकालकर वे प्रायः वन में जाकर तपस्या करते थे। एक बार वे वन में एकाग्रचित्त होकर ध्यानमग्न बैठे थे — बाहरी संसार की कोई सुध उन्हें न थी।
रीछ का आक्रमण
उसी समय एक जंगली रीछ (भालू) वहाँ आ पहुँचा। ध्यानमग्न राजा को निश्चल देखकर वह निर्भय होकर उनके निकट आया और उनका पैर चबाने लगा। पीड़ा असह्य थी, किंतु राजा ने न क्रोध किया, न प्रतिकार — उन्होंने सोचा कि यह मेरे ही किसी पूर्वकृत कर्म का फल है।
रीछ राजा को घसीटता हुआ ले जाने लगा। तब राजा ने अपने तप व धैर्य को न छोड़ते हुए आर्त होकर भगवान विष्णु को पुकारा — "हे मधुसूदन! हे जगत्पालक! मेरी रक्षा कीजिए।"
भक्त की सच्ची पुकार सुनकर भगवान विष्णु तत्क्षण प्रकट हुए और अपने सुदर्शन चक्र से उस रीछ का वध कर दिया। किंतु तब तक राजा का पैर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका था।
भगवान का आदेश और व्रत
राजा को व्यथित देखकर भगवान विष्णु ने करुणापूर्वक कहा — "हे राजन्! शोक मत करो। यह तुम्हारे पूर्वजन्म के किसी कर्म का शेष फल था, जो अब भोग लिया गया। अब तुम मथुरा जाओ और वहाँ श्रद्धापूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत करो तथा मेरे वराह अवतार की पूजा करो। उस व्रत के प्रभाव से तुम्हारा शरीर पुनः पूर्ण व निरोग हो जाएगा।"
राजा मान्धाता ने भगवान की आज्ञा शिरोधार्य की। वे मथुरा गए और वहाँ पूर्ण विधि-विधान से वरूथिनी एकादशी का व्रत किया — निराहार रहकर वराह भगवान का पूजन किया, रात्रि जागरण किया और द्वादशी को दान-पुण्य किया।
व्रत के प्रभाव से राजा शीघ्र ही पुनः सुंदर व संपूर्ण अंगों वाले हो गए, जैसे उन्हें कभी कोई क्षति हुई ही न हो। अंत में वे दिव्य गति को प्राप्त हुए।
व्रत का माहात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य भय, संकट अथवा रोग से पीड़ित हो, उसे यह वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। यह व्रत कवच के समान भक्त की रक्षा करता है — इसीलिए इसका नाम वरूथिनी है।"
शास्त्रों में इस व्रत का पुण्य कन्यादान व अन्नदान जैसे श्रेष्ठ दानों के तुल्य कहा गया है — इसीलिए इसे गृहस्थों के लिए विशेष कल्याणकारी माना जाता है। पुराणों में उल्लेख है कि राजा मान्धाता तथा राजा धुन्धुमार ने इसी व्रत के प्रभाव से दिव्य गति प्राप्त की।
कथा का मूल संदेश है — "धैर्य ही सौभाग्य की नींव है।" राजा मान्धाता ने पीड़ा में भी क्रोध नहीं किया, अपितु भगवान का स्मरण किया; उसी धैर्य ने उन्हें भगवत्-कृपा का पात्र बनाया। इसीलिए इस व्रत में दशमी से ही संयमपूर्ण आचरण, सात्त्विक आहार व हरि-स्मरण का विधान है।