वरूथिनी एकादशी

Varuthini Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

वरूथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत गणना में चैत्र कृष्ण)। "वरूथिनी" अर्थात कवच के समान रक्षा करने वाली। मान्यता है कि यह व्रत इस लोक में सुख तथा अंत में मोक्ष प्रदान करता है।

व्रत कथा

व्रत का माहात्म्य

शास्त्रों में वर्णित है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश कर सौभाग्य प्रदान करता है। इसका पुण्य दस हज़ार वर्ष की तपस्या के तुल्य तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्वर्णदान के समान बताया गया है।

इस व्रत का फल कन्यादान व अन्नदान जैसे श्रेष्ठ दानों के समान माना गया है — इसलिए इसे गृहस्थों के लिए विशेष कल्याणकारी कहा जाता है।

राजाओं के उदाहरण

पुराणों में उल्लेख है कि राजा मान्धाता तथा राजा धुन्धुमार ने इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग व दिव्य गति प्राप्त की।

कथा का मूल संदेश है — "धैर्य ही सौभाग्य की नींव है; संयम व सजगता से मनुष्य का सुख व भाग्य बढ़ता है।" इसीलिए इस व्रत में दशमी से ही संयमपूर्ण आचरण, सात्विक आहार व हरि-स्मरण का विधान है।

लाभ

  • समस्त पापों का नाश व सौभाग्य
  • कन्यादान व अन्नदान तुल्य पुण्य
  • इस लोक में सुख, अंत में मोक्ष

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी)
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपराएकादशी माहात्म्य (कृष्ण-अर्जुन संवाद)
स्रोतवरूथिनी एकादशी माहात्म्य (एकादशी माहात्म्य परंपरा) · राजा मान्धाता व धुन्धुमार के प्रसंग
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि व तिथि हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।