देवशयनी एकादशी

Devshayani Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे पद्मा एकादशी व हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में शयन करते हैं और देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी को जागते हैं।

यही दिन चातुर्मास व्रत का आरंभ है। इस अवधि में विवाह, गृह-प्रवेश आदि शुभ मांगलिक कार्य प्रायः स्थगित रहते हैं, जबकि जप, तप, दान व भक्ति को विशेष फलदायी माना जाता है।

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व्रत कथा

राजा मान्धाता का राज्य व अकाल

सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल के धर्मनिष्ठ राजा मान्धाता अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उनके राज्य में सुख-शांति थी। किंतु एक बार लगातार तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई, जिससे भीषण अकाल पड़ा और प्रजा अन्न-जल के अभाव से व्याकुल हो उठी।

राजा को यह समझ न आया कि उनके धर्मपूर्वक शासन के रहते ऐसा संकट क्यों आया। समाधान की खोज में वे ब्रह्मा के मानस-पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे।

महर्षि अंगिरा का मार्गदर्शन

महर्षि अंगिरा ने बताया कि राज्य में उस युग की मर्यादा के प्रतिकूल एक आचरण हो रहा है, जो इस अनावृष्टि का कारण है। इसके निवारण हेतु एक कठोर सुझाव भी आया, किंतु धर्मनिष्ठ राजा ने किसी निर्दोष को हानि पहुँचाना अस्वीकार कर दिया।

तब ऋषि ने राजा को आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने की प्रेरणा दी और कहा — "इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में पुनः वर्षा होगी और प्रजा सुखी होगी।"

व्रत का फल

राजा मान्धाता ने प्रजा सहित श्रद्धापूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से राज्य में पुनः वर्षा हुई, अकाल समाप्त हुआ और प्रजा में समृद्धि व प्रसन्नता लौट आई।

यह कथा दर्शाती है कि संकट का समाधान किसी को हानि पहुँचाने में नहीं, अपितु भक्ति व धर्मपूर्ण आचरण में निहित है।

लाभ

  • पापों का नाश व मनोकामना-पूर्ति
  • चातुर्मास साधना का पुण्यमय आरंभ
  • भगवान विष्णु की कृपा व अंत में मोक्ष

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी)
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आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपरापद्म पुराण / एकादशी माहात्म्य
स्रोतपद्म पुराण / भविष्योत्तर — देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी माहात्म्य · राजा मान्धाता व महर्षि अंगिरा संवाद (एकादशी माहात्म्य परंपरा)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि, तिथि व पारण-मुहूर्त हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।