देवशयनी एकादशी

Devshayani Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी व हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार मास के लिए योगनिद्रा में शयन करते हैं और देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी को जागते हैं।

यही दिन चातुर्मास व्रत का आरंभ है। इस अवधि में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन आदि शुभ मांगलिक कार्य प्रायः स्थगित रहते हैं, जबकि जप, तप, दान, संयम व भक्ति को विशेष फलदायी माना जाता है। साधक इसी दिन से चार मास का कोई नियम अथवा त्याग-संकल्प लेते हैं।

कथा वीडियो

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेसभी स्त्री-पुरुष — विशेषकर वे जो चातुर्मास का नियम-संकल्प लेना चाहते हैं अथवा संकटों के निवारण की कामना रखते हैं।
कब रखेंआषाढ़ शुक्ल एकादशी को; अगले दिन द्वादशी को पारण-मुहूर्त में व्रत खोलें।
आहार नियम:
  • अन्न, चावल व दाल का त्याग — फलाहार अथवा निराहार (सामर्थ्यानुसार)
  • प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन वर्जित
  • दशमी की संध्या से ही सात्त्विक आहार व ब्रह्मचर्य का पालन
  • चातुर्मास के आरंभ से परंपरानुसार कोई एक वस्तु (जैसे शाक, दही अथवा मिष्ठान्न) का चार मास हेतु त्याग
अनुशंसित अभ्यास:
  • चातुर्मास का संकल्प — चार मास के लिए कोई एक नियम अथवा त्याग धारण करना
  • भगवान विष्णु को शयन कराने का भाव — पूजन के अंत में शय्या व पुष्प अर्पित करना
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप व विष्णु सहस्रनाम पाठ
  • वर्षा ऋतु का आरंभ होने से अन्न, वस्त्र, छाता व जल-पात्र का दान

पूजन सामग्री

विष्णु (शेषशायी स्वरूप) प्रतिमा या चित्रतुलसीदलपीत वस्त्र, चंदन, अक्षतकमल अथवा पीले पुष्पधूप, दीप, कर्पूरपंचामृत व ऋतुफलजल-कलशदान हेतु अन्न, वस्त्र व छाता

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. दशमी की संध्या से सात्त्विक आहार लें और एकादशी प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. संकल्प के साथ चातुर्मास का नियम अथवा त्याग-संकल्प भी धारण करें।
  3. पूजा-स्थल शुद्ध कर भगवान विष्णु के शेषशायी स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  4. पंचामृत से अभिषेक कर पीत वस्त्र, चंदन, अक्षत, कमल/पीले पुष्प व तुलसीदल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित कर आरती करें और देवशयनी एकादशी की व्रत कथा सुनें।
  6. पूजन के अंत में भगवान को शय्या व पुष्प अर्पित कर "शयन" कराने का भाव रखें और चार मास की सेवा का संकल्प लें।
  7. दिनभर निराहार अथवा फलाहार रहकर हरि-नाम जप करें और रात्रि जागरण कर कीर्तन करें।
  8. द्वादशी को स्नानोपरांत ब्राह्मण/निर्धन को अन्न, वस्त्र व छाता का दान कर पारण-मुहूर्त में स्वयं व्रत खोलें।

व्रत कथा

राजा मान्धाता का राज्य व अकाल

सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल के धर्मनिष्ठ राजा मान्धाता अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। वे सत्यवादी, दानशील व प्रजा-वत्सल थे। उनके राज्य में धन-धान्य की कोई कमी न थी और प्रजा सुख-शांति से रहती थी।

किंतु एक बार ऐसा संकट आया जिसकी किसी ने कल्पना भी न की थी — लगातार तीन वर्ष तक एक बूँद वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, कुएँ-तालाब रीत गए, अन्न के भंडार खाली हो गए। भीषण अकाल पड़ा और प्रजा अन्न-जल के अभाव से व्याकुल हो उठी।

यज्ञ व अन्य धर्म-कार्य भी रुक गए, क्योंकि उनके लिए आवश्यक सामग्री ही उपलब्ध न थी। प्रजा राजा के द्वार पर आकर विलाप करने लगी।

राजा को यह समझ न आया कि उनके धर्मपूर्वक शासन के रहते ऐसा संकट क्यों आया। उन्होंने सोचा — "मैंने तो कभी अधर्म नहीं किया, फिर मेरी प्रजा को यह दंड क्यों?" समाधान की खोज में वे सेना व मंत्रियों सहित वन की ओर निकल पड़े।

महर्षि अंगिरा का मार्गदर्शन

वन-वन भटकते हुए राजा मान्धाता अंततः ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। ऋषि के तपोबल से समस्त आश्रम-क्षेत्र हरा-भरा था, मानो वहाँ अकाल का स्पर्श ही न हुआ हो।

राजा ने महर्षि को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर अपनी तथा अपनी प्रजा की सारी व्यथा कह सुनाई — "हे महात्मन्! मैंने अपने जीवन में कभी धर्म का उल्लंघन नहीं किया, फिर भी मेरे राज्य पर यह विपत्ति क्यों? कृपया मार्ग दिखाइए।"

महर्षि अंगिरा ने योग-दृष्टि से देखकर बताया कि राज्य में उस युग की मर्यादा के प्रतिकूल एक आचरण हो रहा है, और वही इस अनावृष्टि का कारण है। इसके निवारण हेतु एक कठोर सुझाव भी सामने आया — किंतु धर्मनिष्ठ राजा ने किसी निर्दोष को हानि पहुँचाना अस्वीकार कर दिया।

राजा ने विनम्रता से कहा — "हे मुनिवर! अपनी प्रजा को बचाने के लिए मैं किसी निर्दोष का अहित नहीं कर सकता। कोई और मार्ग बताइए।"

राजा की इस करुणा व धर्म-निष्ठा से महर्षि अंगिरा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा — "हे राजन्! तुम्हारा हृदय सचमुच धर्म से भरा है। तो सुनो — आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में पुनः वर्षा होगी और प्रजा सुखी होगी।"

व्रत और वर्षा का लौटना

राजा मान्धाता ने महर्षि के वचन को शिरोधार्य किया और अपने राज्य लौटकर घोषणा करवाई कि समस्त प्रजा देवशयनी एकादशी का व्रत करे।

नियत तिथि पर राजा, रानी, मंत्री व समस्त प्रजा ने पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया — सब निराहार रहे, भगवान विष्णु का पूजन किया और रात्रि भर जागकर हरि-नाम का कीर्तन करते रहे।

व्रत के प्रभाव से आकाश में मेघ घिर आए और मूसलधार वर्षा हुई। सूखी धरती फिर से हरी हो उठी, कुएँ-तालाब भर गए, खेत लहलहा उठे। तीन वर्ष का अकाल समाप्त हुआ और प्रजा में समृद्धि व प्रसन्नता लौट आई।

यह कथा दर्शाती है कि संकट का समाधान किसी को हानि पहुँचाने में नहीं, अपितु भक्ति व धर्मपूर्ण आचरण में निहित है। राजा मान्धाता ने सरल मार्ग के स्थान पर कठिन किंतु धर्मसंगत मार्ग चुना — और भगवान ने उन्हें निराश नहीं किया।

भगवान का शयन और चातुर्मास

इसी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार मास की योगनिद्रा में शयन करते हैं। वे कार्तिक शुक्ल की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी को जागते हैं।

इन चार मासों को "चातुर्मास" कहा जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में रहता है, इसीलिए श्रावण मास में शिव-आराधना का विशेष महत्व है।

चातुर्मास में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन आदि शुभ मांगलिक कार्य प्रायः स्थगित रहते हैं। किंतु यह काल आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है — जप, तप, दान, संयम, कथा-श्रवण व व्रत का फल इन चार मासों में कई गुना बढ़ जाता है।

परंपरा में साधक इसी दिन से चार मास के लिए कोई एक नियम अथवा त्याग-संकल्प धारण करते हैं — जैसे किसी प्रिय वस्तु का त्याग, भूमि पर शयन, मौन, अथवा नित्य पाठ का नियम।

लाभ

  • पापों का नाश व मनोकामना-पूर्ति
  • अकाल, संकट व प्राकृतिक विपत्तियों से रक्षा
  • चातुर्मास साधना का पुण्यमय आरंभ
  • संयम व नियम-पालन का बल
  • भगवान विष्णु की कृपा व अंत में मोक्ष

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी)
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपरापद्म पुराण / एकादशी माहात्म्य
स्रोतपद्म पुराण / भविष्योत्तर — देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी माहात्म्य · राजा मान्धाता व महर्षि अंगिरा संवाद (एकादशी माहात्म्य परंपरा)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि, तिथि व पारण-मुहूर्त हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।

देवशयनी एकादशी — सामान्य प्रश्न