राजा मान्धाता का राज्य व अकाल
सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल के धर्मनिष्ठ राजा मान्धाता अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। वे सत्यवादी, दानशील व प्रजा-वत्सल थे। उनके राज्य में धन-धान्य की कोई कमी न थी और प्रजा सुख-शांति से रहती थी।
किंतु एक बार ऐसा संकट आया जिसकी किसी ने कल्पना भी न की थी — लगातार तीन वर्ष तक एक बूँद वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, कुएँ-तालाब रीत गए, अन्न के भंडार खाली हो गए। भीषण अकाल पड़ा और प्रजा अन्न-जल के अभाव से व्याकुल हो उठी।
यज्ञ व अन्य धर्म-कार्य भी रुक गए, क्योंकि उनके लिए आवश्यक सामग्री ही उपलब्ध न थी। प्रजा राजा के द्वार पर आकर विलाप करने लगी।
राजा को यह समझ न आया कि उनके धर्मपूर्वक शासन के रहते ऐसा संकट क्यों आया। उन्होंने सोचा — "मैंने तो कभी अधर्म नहीं किया, फिर मेरी प्रजा को यह दंड क्यों?" समाधान की खोज में वे सेना व मंत्रियों सहित वन की ओर निकल पड़े।
महर्षि अंगिरा का मार्गदर्शन
वन-वन भटकते हुए राजा मान्धाता अंततः ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। ऋषि के तपोबल से समस्त आश्रम-क्षेत्र हरा-भरा था, मानो वहाँ अकाल का स्पर्श ही न हुआ हो।
राजा ने महर्षि को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर अपनी तथा अपनी प्रजा की सारी व्यथा कह सुनाई — "हे महात्मन्! मैंने अपने जीवन में कभी धर्म का उल्लंघन नहीं किया, फिर भी मेरे राज्य पर यह विपत्ति क्यों? कृपया मार्ग दिखाइए।"
महर्षि अंगिरा ने योग-दृष्टि से देखकर बताया कि राज्य में उस युग की मर्यादा के प्रतिकूल एक आचरण हो रहा है, और वही इस अनावृष्टि का कारण है। इसके निवारण हेतु एक कठोर सुझाव भी सामने आया — किंतु धर्मनिष्ठ राजा ने किसी निर्दोष को हानि पहुँचाना अस्वीकार कर दिया।
राजा ने विनम्रता से कहा — "हे मुनिवर! अपनी प्रजा को बचाने के लिए मैं किसी निर्दोष का अहित नहीं कर सकता। कोई और मार्ग बताइए।"
राजा की इस करुणा व धर्म-निष्ठा से महर्षि अंगिरा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा — "हे राजन्! तुम्हारा हृदय सचमुच धर्म से भरा है। तो सुनो — आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में पुनः वर्षा होगी और प्रजा सुखी होगी।"
व्रत और वर्षा का लौटना
राजा मान्धाता ने महर्षि के वचन को शिरोधार्य किया और अपने राज्य लौटकर घोषणा करवाई कि समस्त प्रजा देवशयनी एकादशी का व्रत करे।
नियत तिथि पर राजा, रानी, मंत्री व समस्त प्रजा ने पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया — सब निराहार रहे, भगवान विष्णु का पूजन किया और रात्रि भर जागकर हरि-नाम का कीर्तन करते रहे।
व्रत के प्रभाव से आकाश में मेघ घिर आए और मूसलधार वर्षा हुई। सूखी धरती फिर से हरी हो उठी, कुएँ-तालाब भर गए, खेत लहलहा उठे। तीन वर्ष का अकाल समाप्त हुआ और प्रजा में समृद्धि व प्रसन्नता लौट आई।
यह कथा दर्शाती है कि संकट का समाधान किसी को हानि पहुँचाने में नहीं, अपितु भक्ति व धर्मपूर्ण आचरण में निहित है। राजा मान्धाता ने सरल मार्ग के स्थान पर कठिन किंतु धर्मसंगत मार्ग चुना — और भगवान ने उन्हें निराश नहीं किया।
भगवान का शयन और चातुर्मास
इसी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार मास की योगनिद्रा में शयन करते हैं। वे कार्तिक शुक्ल की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी को जागते हैं।
इन चार मासों को "चातुर्मास" कहा जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में रहता है, इसीलिए श्रावण मास में शिव-आराधना का विशेष महत्व है।
चातुर्मास में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन आदि शुभ मांगलिक कार्य प्रायः स्थगित रहते हैं। किंतु यह काल आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है — जप, तप, दान, संयम, कथा-श्रवण व व्रत का फल इन चार मासों में कई गुना बढ़ जाता है।
परंपरा में साधक इसी दिन से चार मास के लिए कोई एक नियम अथवा त्याग-संकल्प धारण करते हैं — जैसे किसी प्रिय वस्तु का त्याग, भूमि पर शयन, मौन, अथवा नित्य पाठ का नियम।