राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा
अयोध्या के सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र अपने सत्य-व्रत के लिए विख्यात थे। एक प्रण के कारण उन्हें अपना समस्त राज्य दान करना पड़ा; कठिनाई ऐसी बढ़ी कि उन्हें पत्नी व पुत्र को बेचना पड़ा और स्वयं चांडाल के यहाँ सेवक बनना पड़ा। इतनी विपत्ति में भी उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा।
दुख से व्याकुल राजा को महर्षि गौतम मिले। ऋषि ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण की अजा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने तथा रात्रि-जागरण करने की प्रेरणा दी।
व्रत का फल
राजा ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया, जिसके प्रभाव से उनके समस्त पाप व दोष नष्ट हो गए। आकाश से पुष्प-वर्षा हुई, देवताओं के दुंदुभि बजे, उनका मृत पुत्र जीवित हो उठा, पत्नी राजसी वेश में लौट आई और राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
यह कथा दर्शाती है कि विपत्ति में भी ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा व सत्य पर अडिग रहना अंततः मुक्ति व कृपा दिलाता है।