कथा का प्रसंग
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे केशव! भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है?"
भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! उस एकादशी का नाम अजा है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली है। प्राचीन काल में स्वयं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने इसी व्रत के प्रभाव से अपना खोया राज्य, पत्नी व पुत्र पुनः प्राप्त किए थे। वह कथा सुनो।"
अयोध्या के सत्यनिष्ठ सम्राट
प्राचीन काल में अयोध्या में चक्रवर्ती सम्राट हरिश्चंद्र राज्य करते थे। वे अत्यंत पराक्रमी, बलशाली व दानशील थे, किंतु उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी उनका सत्य-व्रत। उन्होंने प्रण किया था कि प्राण भले चले जाएँ, किंतु मुख से असत्य नहीं निकलेगा।
उनकी इसी सत्य-निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए दैव-योग से एक ऐसा प्रसंग बना कि उन्हें अपना समस्त राज्य एक ऋषि को दान में दे देना पड़ा। राजपाट, कोष, वैभव — सब कुछ हाथ से चला गया।
सत्य की भीषण परीक्षा
राज्य के साथ ही दक्षिणा का ऋण भी चुकाना था। उसे चुकाने के लिए हरिश्चंद्र को वह करना पड़ा जो किसी भी पति व पिता के लिए असह्य है — उन्होंने अपनी पत्नी रानी तारामती और पुत्र रोहिताश्व को बेच दिया, और अंततः स्वयं को भी एक चांडाल के हाथों बेच दिया।
अब वह चक्रवर्ती सम्राट श्मशान में सेवक था। उसका काम था — मृतकों के दाह-संस्कार का कर वसूलना। जो कभी सोने के सिंहासन पर बैठता था, वह अब चिताओं की राख के बीच खड़ा रहता।
विपत्ति यहीं नहीं रुकी। एक दिन उनका अपना पुत्र रोहिताश्व सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त हो गया और रानी तारामती उसका शव लेकर उसी श्मशान में आई। पत्नी के पास कर देने को कुछ न था, और हरिश्चंद्र अपने कर्तव्य से विचलित नहीं हो सकते थे। ऐसी हृदय-विदारक घड़ी में भी उन्होंने सत्य व कर्तव्य का साथ नहीं छोड़ा।
महर्षि गौतम का मार्गदर्शन
दुःख के इस चरम पर, जब राजा हरिश्चंद्र अपने भाग्य पर विचार करते हुए व्याकुल बैठे थे, तभी महर्षि गौतम वहाँ पधारे। राजा ने उनके चरणों में गिरकर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई।
महर्षि गौतम ने करुणापूर्वक कहा — "हे राजन्! तुम्हारा सत्य अटल है, केवल कर्म-फल का यह प्रवाह शेष है। सौभाग्य से कुछ ही दिनों में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आ रही है। तुम विधिपूर्वक इस व्रत को करो और रात्रि भर जागरण करो। इसके प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप व दोष नष्ट हो जाएँगे और तुम्हारा कल्याण होगा।"
यह उपदेश देकर महर्षि गौतम अंतर्धान हो गए। राजा हरिश्चंद्र ने उनके वचन को अपने जीवन का अंतिम सहारा मानकर हृदय से ग्रहण किया।
व्रत और दिव्य कृपा
नियत तिथि पर राजा हरिश्चंद्र ने पूर्ण श्रद्धा से अजा एकादशी का व्रत किया। श्मशान की उसी भूमि पर, अपार दुःख के बीच, वे दिनभर निराहार रहे और रात्रि भर जागकर भगवान का नाम-स्मरण करते रहे।
व्रत पूर्ण होते ही चमत्कार हुआ। उनके समस्त पाप व दोष भस्म हो गए और वह माया-जाल छिन्न-भिन्न हो गया जो उनकी परीक्षा हेतु रचा गया था।
आकाश में देवताओं के दुंदुभि बज उठे, पुष्पों की वर्षा होने लगी। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवराज इंद्र सहित समस्त देवगण उनके सम्मुख प्रकट हुए और उनकी सत्य-निष्ठा की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
उनका मृत पुत्र रोहिताश्व जीवित होकर उठ खड़ा हुआ। रानी तारामती दासी के वेश के स्थान पर पुनः राजसी वस्त्र व आभूषणों में सुशोभित हो गईं। राजा हरिश्चंद्र को उनका राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! राजा हरिश्चंद्र ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य किया और अंत में परिवार सहित स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अजा एकादशी का व्रत करता है अथवा इसकी कथा सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के तुल्य फल मिलता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।"