कथा का प्रसंग
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे जनार्दन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या फल है?"
भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! उस एकादशी का नाम मोक्षदा है। यह चिंतामणि के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा पितरों को नरक से मुक्ति दिलाने वाली है। इसके विषय में एक प्राचीन कथा है, वह सुनो।"
राजा वैखानस का दुःस्वप्न
प्राचीन काल में चंपक नगर में वैखानस नाम के धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे वेदज्ञ ब्राह्मणों का सम्मान करते और प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उनके राज्य में सब सुखी थे।
एक रात राजा ने एक भयानक स्वप्न देखा — उनके दिवंगत पिता नरक में घोर यातना भोग रहे हैं और उनसे कह रहे हैं — "हे पुत्र! मैं नरक में पड़ा हूँ। तुम मुझे यहाँ से मुक्त कराओ।" यह कहते-कहते वे विलाप करने लगे।
स्वप्न टूटने पर राजा अत्यंत व्याकुल हो उठे। रातभर उन्हें नींद नहीं आई। प्रातः होते ही उन्होंने अपने राजसभा के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर सारा स्वप्न कह सुनाया और पूछा — "हे विप्रगण! मेरे पिता की मुक्ति का कोई उपाय बताइए। उनके इस कष्ट को देखकर मेरा राज्य, धन व वैभव — सब निरर्थक लगता है।"
पर्वत मुनि का मार्गदर्शन
ब्राह्मणों ने कहा — "हे राजन्! इस विषय का समाधान हमारी सामर्थ्य से परे है। यहाँ से कुछ दूर पर्वत मुनि का आश्रम है। वे चारों वेदों के ज्ञाता तथा योगबल से भूत, वर्तमान व भविष्य — तीनों काल देखने में समर्थ हैं। आप उन्हीं की शरण जाइए।"
राजा तत्काल पर्वत मुनि के आश्रम पहुँचे और उन्हें प्रणाम कर अपनी व्यथा सुनाई। मुनि ने कुछ क्षण नेत्र बंद कर योग-दृष्टि से देखा और फिर कहा — "हे राजन्! तुम्हारे पिता अपने पूर्वजन्म के कर्म-दोष के कारण इस गति को प्राप्त हुए हैं।"
राजा ने विनम्रता से पूछा — "हे मुनिवर! क्या इसका कोई निवारण है?" मुनि बोले — "है। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का व्रत करो और उसका समस्त पुण्य संकल्पपूर्वक अपने पिता को अर्पित कर दो। इसके प्रभाव से वे नरक से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करेंगे।"
व्रत और पिता की मुक्ति
राजा वैखानस आश्रम से लौटे और नियत तिथि पर परिवार तथा प्रजा सहित विधिपूर्वक मोक्षदा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने भगवान दामोदर (विष्णु) का धूप, दीप, नैवेद्य व तुलसीदल से पूजन किया, दिनभर निराहार रहे और रात्रि भर जागरण कर हरि-कीर्तन किया।
द्वादशी को उन्होंने ब्राह्मणों को भोजन कराया, यथाशक्ति दान दिया और फिर हाथ में जल लेकर संकल्प किया — "इस व्रत का जो भी पुण्य मुझे प्राप्त हुआ है, वह मैं अपने पिता की मुक्ति हेतु अर्पित करता हूँ।"
उसी क्षण आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई। राजा के पिता नरक की यातना से मुक्त होकर दिव्य रूप में प्रकट हुए और बोले — "हे पुत्र! तेरा कल्याण हो। तूने मुझे इस असह्य कष्ट से उबार लिया।" यह आशीर्वाद देकर वे दिव्य विमान द्वारा स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! इसीलिए इस एकादशी का नाम मोक्षदा है। जो इसे श्रद्धापूर्वक करता है, वह स्वयं तो पापों से मुक्त होता ही है, अपने पितरों को भी सद्गति प्रदान करता है।"
गीता जयंती
परंपरा में इसी मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी तिथि पर कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने विषाद में डूबे अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देकर कर्तव्य-पथ पर प्रवृत्त किया था।
इसीलिए इस दिन गीता का पाठ, गीता-दान तथा गीता-श्रवण अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। भाव यह है कि जैसे गीता ने अर्जुन को मोह से मुक्त किया, वैसे ही यह एकादशी जीव को संसार-बंधन से मुक्त करती है।