परिवर्तिनी एकादशी

Parivartini Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे पार्श्व, वामन, पद्मा व जयंती एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि चातुर्मास की योगनिद्रा में भगवान विष्णु इसी दिन करवट बदलते हैं — इसीलिए इसे "परिवर्तिनी" कहा जाता है।

व्रत कथा

वामन अवतार व राजा बलि

दानवीर राजा बलि ने अपनी भक्ति व तप से इतनी शक्ति अर्जित कर ली कि देवताओं का अधिकार संकट में पड़ गया। तब भगवान विष्णु ने वामन (बटु ब्राह्मण) रूप में अवतार लेकर बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी।

बलि के वचन देते ही वामन ने विराट रूप धारण किया — एक पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग नाप लिया, और तीसरा पग बलि के मस्तक पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे सदा साथ रहने का वरदान दिया।

विष्णु का परिवर्तन

कहा जाता है कि इसी दिन क्षीरसागर में शयनरत भगवान विष्णु करवट बदलते हैं — "मेरा एक रूप राजा बलि के समीप रहता है और दूसरा शेषनाग पर क्षीरसागर में।"

इस दिन भगवान वामन का पूजन, रात्रि-जागरण तथा रजत, चावल व दही का दान शुभ माना जाता है। व्रत का पुण्य अश्वमेध यज्ञ के तुल्य बताया गया है।

लाभ

  • समस्त पापों का नाश
  • अश्वमेध यज्ञ तुल्य पुण्य
  • भगवान वामन की कृपा; अंत में स्वर्ग

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी)
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपराएकादशी माहात्म्य (कृष्ण-अर्जुन संवाद)
स्रोतपरिवर्तिनी (वामन) एकादशी माहात्म्य — वामन अवतार व राजा बलि प्रसंग · एकादशी माहात्म्य परंपरा
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि व तिथि हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।