निर्जला एकादशी

Nirjala Ekadashi

तिथि व्रत (एकादशी) — निर्जल

⚠ अंश

परिचय व महत्व

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो वृषभ व मिथुन संक्रांति के बीच (प्रायः जून) आती है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता — इसीलिए इसे "निर्जला" कहते हैं।

इसे भीमसेनी एकादशी तथा पांडव एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि पांचों पांडवों में भीम ने वर्ष भर की एकादशियों के बदले यही एक कठिन व्रत रखा था। मान्यता है कि वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों का पुण्य अकेले इस एक व्रत के पालन से प्राप्त हो जाता है।

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेसभी स्त्री-पुरुष — विशेषकर वे जो वर्ष भर की सभी एकादशी नहीं रख पाते; स्वास्थ्यानुसार।
कब रखेंज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को; अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय पश्चात पारण।
आहार नियम:
  • निर्जल व्रत — अन्न तथा जल दोनों का त्याग (एकादशी सूर्योदय से द्वादशी पारण तक)
  • आचमन व स्नान हेतु केवल अत्यल्प जल की छूट (परंपरा में लगभग छह माशा)
  • चावल एवं तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन वर्जित
अनुशंसित अभ्यास:
  • भगवान विष्णु का पूजन व विष्णु सहस्रनाम पाठ
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप
  • ग्रीष्म ऋतु होने से जल, शरबत, पंखा, छाता, वस्त्र व अन्न का दान

पूजन सामग्री

विष्णु प्रतिमा/चित्रतुलसीदलपीले पुष्प व वस्त्रजल-कलशपंखा/छाता व अन्न (दान हेतु)फल

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. एकादशी प्रातः स्नान कर निर्जल व्रत का संकल्प लें।
  2. भगवान विष्णु को पीत वस्त्र, तुलसीदल व पुष्प अर्पित कर दीप-धूप से पूजन करें।
  3. दिनभर जल रहित रहकर हरि-नाम स्मरण व विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  4. ग्रीष्म को ध्यान में रखते हुए जल, शरबत, पंखा, छाता, वस्त्र व अन्न का दान करें।
  5. द्वादशी को स्नानोपरांत ब्राह्मण/निर्धन को अन्न-जल दान कराकर स्वयं पारण करें।

व्रत कथा

पांडव परिवार का एकादशी-नियम

महाभारत काल में पांडव परिवार में एकादशी व्रत का कठोर पालन होता था। माता कुंती, धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदी — सभी प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों का उपवास नियमपूर्वक रखते थे।

व्रत के दिन घर में अन्न नहीं पकता था; सब हरि-नाम स्मरण, कथा-श्रवण व पूजन में दिन बिताते और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करते।

परिवार के सदस्य भीम से भी बार-बार आग्रह करते कि वे भी इस पुण्य में सम्मिलित हों। किंतु भीम के लिए यह असंभव था।

भीम की व्यथा

भीम अत्यंत बलशाली थे और उतने ही भोजन-प्रिय भी। कहा जाता है कि उनके उदर में "वृक" नामक एक तीव्र जठराग्नि थी, जो निरंतर भोजन से ही शांत होती थी। इसी कारण वे एक समय भी बिना भोजन के नहीं रह पाते थे।

यह बात भीम को भीतर ही भीतर सालती रहती थी — परिवार के सभी सदस्य एकादशी का पुण्य अर्जित करते हैं और वे अकेले वंचित रह जाते हैं। वे भगवान विष्णु के भक्त थे, व्रत रखना भी चाहते थे, किंतु शरीर की यह विवशता उन्हें रोक देती थी।

अंततः एक दिन वे अपने पितामह महर्षि वेदव्यास के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले — "हे पितामह! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी का व्रत करते हैं और मुझसे भी करने को कहते हैं। किंतु मेरे उदर की अग्नि मुझे भूखा नहीं रहने देती। मैं दान कर सकता हूँ, पूजा कर सकता हूँ, भगवान का ध्यान कर सकता हूँ — पर भोजन के बिना नहीं रह सकता।"

"कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए — कोई एक ऐसा व्रत, जिसे वर्ष में केवल एक बार करके मुझे वर्ष भर की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए।"

महर्षि व्यास का उपदेश

महर्षि वेदव्यास भीम की सरलता व भक्ति-भाव पर मुस्कराए। उन्होंने कहा — "हे भीम! तुम्हारी विवशता मैं समझता हूँ। तुम्हारे लिए एक मार्ग है, किंतु वह सरल नहीं, अत्यंत कठिन है।"

"ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, वृषभ व मिथुन संक्रांति के बीच, एक एकादशी आती है — निर्जला एकादशी। इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के पारण तक अन्न ही नहीं, जल का भी पूर्ण त्याग करना होता है। केवल आचमन व स्नान हेतु अत्यल्प जल की छूट है — परंपरा में लगभग छह माशा।"

व्यास जी ने आगे कहा — "यद्यपि शास्त्रों में प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों का व्रत विहित है, तथापि जो व्यक्ति वर्ष भर की सभी एकादशी नहीं रख सकता, वह केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत करके समस्त एकादशियों के तुल्य पुण्य प्राप्त कर सकता है।"

उन्होंने व्रत के नियम भी बताए — "दिनभर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करो। द्वादशी को स्नान कर ब्राह्मणों को भोजन कराओ, और जल से भरा कलश वस्त्र व स्वर्ण सहित दान करो — तत्पश्चात स्वयं पारण करो।"

व्रत का फल

महर्षि व्यास ने वचन दिया — "हे भीम! इस व्रत का पुण्य समस्त तीर्थ-यात्राओं व दानों के तुल्य है। एक दिन निर्जल रहकर श्रद्धापूर्वक व्रत करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।"

"अंत समय में यमराज के भयंकर दूत उसके निकट नहीं आते; अपितु भगवान विष्णु के पार्षद दिव्य विमान लेकर आते हैं और उसे विष्णुलोक ले जाते हैं। बड़े से बड़ा पापी भी इस व्रत के प्रभाव से मुक्ति पा जाता है।"

भीम ने पितामह के वचन को शिरोधार्य किया और यह अत्यंत कठिन व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ धारण किया। ग्रीष्म की तपती ज्येष्ठ मास की दोपहरी में भी उन्होंने जल की एक बूँद नहीं ली और दिनभर हरि-नाम का स्मरण करते रहे।

भीम द्वारा धारण किए जाने के कारण ही इस व्रत को "भीमसेनी एकादशी" तथा "पांडव एकादशी" भी कहा जाता है। तभी से निर्जला एकादशी को वर्ष की सर्वाधिक फलदायी एकादशी माना जाता है — और उनके लिए विशेष रूप से जो वर्ष भर की सभी एकादशी नहीं रख पाते।

लाभ

  • वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों के तुल्य पुण्य
  • समस्त पापों का नाश व आत्मशुद्धि
  • अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति (मोक्ष)

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (एकादशी) — निर्जल
संबंधित पर्वएकादशी
तिथिएकादशी
आराध्यश्री विष्णु
आज का पंचांग एकादशी विवरण

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपराब्रह्मवैवर्त पुराण / एकादशी माहात्म्य
स्रोतब्रह्मवैवर्त पुराण — भीम व महर्षि व्यास संवाद · एकादशी माहात्म्य (पद्म पुराण परंपरा), सूत जी द्वारा शौनकादि ऋषियों को वर्णित
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि, तिथि व पारण-मुहूर्त हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें। निर्जल व्रत कठिन है — स्वास्थ्य की स्थिति में चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

निर्जला एकादशी — सामान्य प्रश्न