निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो वृषभ व मिथुन संक्रांति के बीच (प्रायः जून) आती है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता — इसीलिए इसे "निर्जला" कहते हैं।
इसे भीमसेनी एकादशी तथा पांडव एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि पांचों पांडवों में भीम ने वर्ष भर की एकादशियों के बदले यही एक कठिन व्रत रखा था। मान्यता है कि वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों का पुण्य अकेले इस एक व्रत के पालन से प्राप्त हो जाता है।
व्रत नियम (Fasting Guide)
कौन रखेसभी स्त्री-पुरुष — विशेषकर वे जो वर्ष भर की सभी एकादशी नहीं रख पाते; स्वास्थ्यानुसार।
कब रखेंज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को; अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय पश्चात पारण।
आहार नियम:
निर्जल व्रत — अन्न तथा जल दोनों का त्याग (एकादशी सूर्योदय से द्वादशी पारण तक)
आचमन व स्नान हेतु केवल अत्यल्प जल की छूट (परंपरा में लगभग छह माशा)
चावल एवं तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन वर्जित
अनुशंसित अभ्यास:
भगवान विष्णु का पूजन व विष्णु सहस्रनाम पाठ
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप
ग्रीष्म ऋतु होने से जल, शरबत, पंखा, छाता, वस्त्र व अन्न का दान
पूजन सामग्री
विष्णु प्रतिमा/चित्रतुलसीदलपीले पुष्प व वस्त्रजल-कलशपंखा/छाता व अन्न (दान हेतु)फल
पूजन विधि (चरण-दर-चरण)
एकादशी प्रातः स्नान कर निर्जल व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु को पीत वस्त्र, तुलसीदल व पुष्प अर्पित कर दीप-धूप से पूजन करें।
दिनभर जल रहित रहकर हरि-नाम स्मरण व विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
ग्रीष्म को ध्यान में रखते हुए जल, शरबत, पंखा, छाता, वस्त्र व अन्न का दान करें।
द्वादशी को स्नानोपरांत ब्राह्मण/निर्धन को अन्न-जल दान कराकर स्वयं पारण करें।
व्रत कथा
भीम की व्यथा
महाभारत काल में पांडवों की माता कुंती तथा युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल व सहदेव — सभी नियमपूर्वक प्रत्येक एकादशी का उपवास रखते थे। किंतु भीम अत्यंत भोजन-प्रिय थे; कहा जाता है कि उनके उदर में "वृक" नामक अग्नि थी, जो अधिक भोजन से ही शांत होती। अतः वे एक समय भी बिना भोजन के नहीं रह पाते थे और एकादशी का व्रत रखने में असमर्थ थे।
इस बात से भीम दुखी रहते थे कि परिवार के सभी सदस्य एकादशी का पुण्य अर्जित करते हैं और वे वंचित रह जाते हैं। एक दिन उन्होंने अपने पितामह महर्षि वेदव्यास के पास जाकर प्रार्थना की — "मैं एक समय भी भूखा नहीं रह सकता; क्या कोई ऐसा एक व्रत है जिससे मुझे वर्ष भर की एकादशियों का फल मिल जाए?"
महर्षि व्यास का उपदेश
महर्षि व्यास ने भीम को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी — निर्जला एकादशी — का व्रत करने को कहा। उन्होंने बताया कि इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन पारण तक अन्न व जल दोनों का पूर्ण त्याग करना होता है; केवल आचमन व स्नान हेतु अत्यल्प जल की छूट है।
व्यास जी ने कहा कि यद्यपि शास्त्रों में प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों का व्रत विहित है, तथापि जो व्यक्ति सभी एकादशी नहीं रख सकता, वह केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत करके समस्त एकादशियों के तुल्य पुण्य प्राप्त कर सकता है।
व्रत का फल
महर्षि व्यास ने वचन दिया कि इस व्रत का पुण्य समस्त तीर्थ-यात्राओं व दानों के समान है; एक दिन निर्जल रहकर व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अंत समय में यमदूत उसके निकट नहीं आते, और वह दिव्य विमान द्वारा विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
भीम ने यह कठिन व्रत श्रद्धापूर्वक धारण किया, इसीलिए इसे "भीमसेनी एकादशी" भी कहा जाता है। तभी से निर्जला एकादशी को वर्ष की सर्वाधिक फलदायी एकादशी माना जाता है।
स्रोतब्रह्मवैवर्त पुराण — भीम व महर्षि व्यास संवाद · एकादशी माहात्म्य (पद्म पुराण परंपरा), सूत जी द्वारा शौनकादि ऋषियों को वर्णित
अंतिम अद्यतनजून 2026
संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि, तिथि व पारण-मुहूर्त हेतु पंचांग तथा किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें। निर्जल व्रत कठिन है — स्वास्थ्य की स्थिति में चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।