गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र
gajendra mokṣa stotra
Gajendra Moksha Stotra
परिचय
भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।
स्रोत: श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 2–3 — गजेन्द्र की स्तुति; सम्पूर्ण 28 श्लोक
उद्भव / पृष्ठभूमि
गजेन्द्र मोक्ष श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध की प्रसिद्ध कथा है। गजेन्द्र नामक हाथी जब एक सरोवर में ग्राह (मगरमच्छ) द्वारा पकड़ लिया गया और वर्षों के संघर्ष के बाद असहाय हो गया, तब उसने अहंकार त्याग कर पूर्ण समर्पण के साथ भगवान की स्तुति की। भगवान विष्णु ने प्रकट होकर उसे मुक्त किया — यह कथा अनन्य शरणागति व मोक्ष का प्रतीक है।
संपूर्ण स्तोत्र
श्रीशुक उवाच — एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्रागजन्मन्यनुशिक्षितम्॥
श्री शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार बुद्धि से निश्चय कर, मन को हृदय में स्थिर कर गजेन्द्र ने उस परम जप का स्मरण किया, जिसे उसने पूर्व जन्म में सीखा था।
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥
उस भगवान को नमस्कार है, जिनसे यह सम्पूर्ण चेतन-जगत प्रकट हुआ है; उन आदि-कारण, परम पुरुष व परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं।
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्। यो ऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥
जिनमें यह जगत स्थित है, जिनसे उत्पन्न है, जिनसे व्याप्त है, जो स्वयं यह जगत हैं, जो इस सबसे परे और परात्पर हैं — उन स्वयंभू को मैं शरण जाता हूँ।
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद् विभातं क्व च तत् तिरोहितम्। अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥
जो अपनी माया से इस जगत को अपने आप में आरोपित करके कभी प्रकट और कभी तिरोहित करते हैं, जो अनिमेष-साक्षी हैं — वे परात्पर, आत्ममूल भगवान मेरी रक्षा करें।
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु। tāmasi त्रिलोकीष्वयमानसत् तदा ज्ञानमयः श्रेयसि नः परायणम्॥
जब काल-वश सम्पूर्ण लोक, उनके पालक और समस्त कारण पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं और तमस का अंधकार छा जाता है — तब ज्ञानमय परमेश्वर ही हमारा परम आश्रय हैं।
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नाम रूपे गुणदोष एव वा। तथापि लोकापन चेष्टते दयालुः स एव मे विष्णुः परः प्रसीदताम्॥
जिनका न जन्म है, न कर्म, न नाम, न रूप, न गुण-दोष — फिर भी जो दयालु होकर लोक-कल्याण में सदा प्रवृत्त रहते हैं — वे विष्णु (परम) मुझ पर प्रसन्न हों।
अयं च तस्याधिमखं प्रयोगमेकान्तिनो भागवतस्य पूजितुम्। मनो वचो दृक् क्रियाकारणानि च प्रणम्य तस्मै भगवान्मनोभव॥
एकान्त भक्त के इस परम अर्चन-प्रयोग में मन, वाक्, दृष्टि और क्रिया के कारण सहित — उन भगवान को प्रणाम करके उनका स्मरण करो।
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति। किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्॥
जिन्हें धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के इच्छुक भजकर इष्ट गति प्राप्त करते हैं — वे अपार-दयालु मुझे, माँगे बिना ही, अव्यय देह और मोक्ष प्रदान करें।
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः। अत्याद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥
जिनके एकान्त-भक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रखते — उनके अत्याद्भुत और परम-मंगल चरित्र गाते हुए वे आनंद-सागर में डूब जाते हैं।
तमस्तुते ऽद्य च भवभाव्यतामेनमन्त्रमिदं संस्मरन्त्युत्पतन्ति। सत्त्वे निष्ठां कुत इव सत्त्वशीला विनापतन्ति कुत एव रागात्॥
जो इस मंत्र का स्मरण करते हैं वे तमस से मुक्त होकर ऊपर उठते हैं; सत्त्वशील जन सत्त्व में कैसे गिरेंगे, और राग से तो वे दूर ही रहते हैं।
नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये। आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः॥
जो अकिंचन-जनों के धन हैं, जो गुण-वृत्तियों से परे हैं, आत्माराम, शांत और कैवल्य के स्वामी हैं — उन्हें नमस्कार।
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे। निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥
शांत, घोर और मूढ़ — तीनों गुण-धर्मों में विद्यमान; निर्विशेष, सम और ज्ञान-घन — उन्हें नमस्कार।
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे। पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥
हे क्षेत्रज्ञ! आपको नमस्कार। हे सर्वाध्यक्ष, साक्षी! हे आत्ममूल पुरुष, मूलप्रकृति — आपको नमस्कार।
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्टे सर्वप्रत्ययहेतवे। असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः॥
सम्पूर्ण इंद्रियों और गुणों के द्रष्टा, सब ज्ञान के कारण, असत् में भी छाया की तरह भासमान और सदा-प्रकाशित — आपको नमस्कार।
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥
हे समस्त कारणों के कारण, निष्कारण और अद्भुत-कारण! सब आगमों और वेदों के महासागर! हे मोक्ष-दाता, परायण — आपको बार-बार नमस्कार।
नमस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे। सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रयोगाय नमो नमस्ते॥
हे अनंत, सहस्र-मूर्ति, सहस्र-पाद-नेत्र-शिर-जंघा-बाहु, सहस्रनाम, शाश्वत-पुरुष, सहस्र-योग — आपको बार-बार नमस्कार।
यं न विदन्ति तत्त्वेन नेतरे योगिनोऽपि च। त्वमेव भगवन् साक्षात् ज्ञानाज्ञान-प्रकाशकः॥
जिन्हें साधारण लोग तो क्या, योगी भी यथार्थ रूप से नहीं जान पाते — आप ही भगवान साक्षात् ज्ञान और अज्ञान दोनों को प्रकाशित करते हैं।
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता। नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥
जो ज्ञानियों द्वारा सत्त्व और नैष्कर्म्य से प्राप्त होते हैं; हे कैवल्य-नाथ, निर्वाण-सुख-संवित् — आपको नमस्कार।
यो माम् अनाथं जगदात्मनां पतिः स्वपाद-मूलेऽर्पितचेतसोऽधुना। पिबन् प्रियं तस्य रसं पतेर्मुखात् रक्षत्वमोघं करुणां चकार भोः॥
जो जगत के स्वामी हैं, वे मुझ अनाथ को, जिसने अपना चित्त उनके चरण-कमलों में समर्पित किया है — अपनी अमोघ करुणा से रक्षा करें।
नाहं विदामि तव पादयुगालयं वा किं वा ममास्ति भगवन् तव सत्यकोशात्। एकान्तिनस्तव पदाब्जमनुस्मरन्तः सर्वेषु सत्सु परिभ्राम्यत एते॥
हे भगवान! मैं न आपके चरणों का रहस्य जानता हूँ, न यह कि आपके सत्य-कोश से मेरे लिए क्या है। फिर भी आपके एकान्त-भक्त आपके चरण-कमलों का स्मरण करते हुए सब प्राणियों में विचरण करते हैं।
यत्र यत्र मनो देही धावयत्यनिवारितम्। प्रमाथि तत्र तत्रैव नारायणस्य चिन्तनम्॥
जहाँ-जहाँ देही का मन अनियंत्रित दौड़ता है, वहाँ-वहाँ नारायण का चिंतन ही उसे संयत करने वाला है।
स वाऽयं तस्य देवस्य कृपया प्रतिलब्धः। नाम्ना गजेन्द्रः स चिरात् ससंसारात् मुमुक्षया॥
वह गजेन्द्र भगवान की कृपा से संसार से मुक्त होने की इच्छा से चिरकाल से प्रयत्नशील था — और अंततः उसने मुक्ति प्राप्त की।
श्रीशुक उवाच — एवं गजेन्द्रं उपवर्णयतो भीतं विभुः। आकर्ण्य स तु वेदाद्यैः स्तोत्रं पुपोष हर्षभाक्॥
शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार भयभीत गजेन्द्र की स्तुति सुनकर, विभु (विष्णु) ने वेदमय स्तोत्र का पोषण करते हुए प्रसन्नता प्राप्त की।
तमापतन्तं स विलोक्य पीडितः स्तोत्रं निगद्याखिलसत्त्ववन्दितम्। क्षिप्त्वा गदां तस्य च गाढदंशनं विचक्रमे चक्रमुपेत्य पद्मजः॥
पीड़ित गजेन्द्र ने आते हुए भगवान को देखा; तब भगवान ने समस्त सत्त्वों द्वारा वंदित स्तोत्र सुनकर गदा और सुदर्शन-चक्र से मगर का बलिष्ठ जबड़ा काट दिया।
ततो विनिष्क्रम्य जलाशयाद् गजो विमुक्तो भगवत्प्रसादतः। स पूजितोऽष्टादश दिव्यभूषणैर् हरेः कृताञ्जलिर् नमो नमः॥
तब भगवान की कृपा से मुक्त गजेन्द्र जल से बाहर निकला; श्री हरि ने उसे दिव्य आभूषणों से सुशोभित किया और गजेन्द्र ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया।
स एव नागेन्द्र इतीरितो हरेर् विहाय देहं तमसः परां गतिम्। प्राप्तः सरूपः परम: प्रियो हरेः स एव लोकात् त्रयात् परं जगाम॥
वह नागेन्द्र (गजेन्द्र) हरि की कृपा से देह त्याग कर तमस से परे परम गति को प्राप्त हुआ; श्री हरि का सरूप-प्रिय बनकर तीनों लोकों से परे चला गया।
गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते। सर्वसंकटनाशाय मुक्त्यर्थं च परायणम्॥
इस पवित्र गजेन्द्र-मोक्षण को सुनने से पापों से मुक्ति मिलती है; यह समस्त संकटों के नाश और मोक्ष-प्राप्ति के लिए परायण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे अष्टमस्कन्धे गजेन्द्रमोक्षस्तोत्रम् सम्पूर्णम्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में गजेन्द्र-मोक्ष-स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।
अर्थ (हिन्दी)
- श्री शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार बुद्धि से निश्चय कर, मन को हृदय में स्थिर कर गजेन्द्र ने उस परम जप का स्मरण किया, जिसे उसने पूर्व जन्म में सीखा था।
- उस भगवान को नमस्कार है, जिनसे यह सम्पूर्ण चेतन-जगत प्रकट हुआ है; उन आदि-कारण, परम पुरुष व परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं।
- जिनमें यह जगत स्थित है, जिनसे उत्पन्न है, जिनसे व्याप्त है, जो स्वयं यह जगत हैं, जो इस सबसे परे और परात्पर हैं — उन स्वयंभू को मैं शरण जाता हूँ।
- जो अपनी माया से इस जगत को अपने आप में आरोपित करके कभी प्रकट और कभी तिरोहित करते हैं, जो अनिमेष-साक्षी हैं — वे परात्पर, आत्ममूल भगवान मेरी रक्षा करें।
- जब काल-वश सम्पूर्ण लोक, उनके पालक और समस्त कारण पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं और तमस का अंधकार छा जाता है — तब ज्ञानमय परमेश्वर ही हमारा परम आश्रय हैं।
- जिनका न जन्म है, न कर्म, न नाम, न रूप, न गुण-दोष — फिर भी जो दयालु होकर लोक-कल्याण में सदा प्रवृत्त रहते हैं — वे विष्णु (परम) मुझ पर प्रसन्न हों।
- एकान्त भक्त के इस परम अर्चन-प्रयोग में मन, वाक्, दृष्टि और क्रिया के कारण सहित — उन भगवान को प्रणाम करके उनका स्मरण करो।
- जिन्हें धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के इच्छुक भजकर इष्ट गति प्राप्त करते हैं — वे अपार-दयालु मुझे, माँगे बिना ही, अव्यय देह और मोक्ष प्रदान करें।
- जिनके एकान्त-भक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रखते — उनके अत्याद्भुत और परम-मंगल चरित्र गाते हुए वे आनंद-सागर में डूब जाते हैं।
- जो इस मंत्र का स्मरण करते हैं वे तमस से मुक्त होकर ऊपर उठते हैं; सत्त्वशील जन सत्त्व में कैसे गिरेंगे, और राग से तो वे दूर ही रहते हैं।
- जो अकिंचन-जनों के धन हैं, जो गुण-वृत्तियों से परे हैं, आत्माराम, शांत और कैवल्य के स्वामी हैं — उन्हें नमस्कार।
- शांत, घोर और मूढ़ — तीनों गुण-धर्मों में विद्यमान; निर्विशेष, सम और ज्ञान-घन — उन्हें नमस्कार।
- हे क्षेत्रज्ञ! आपको नमस्कार। हे सर्वाध्यक्ष, साक्षी! हे आत्ममूल पुरुष, मूलप्रकृति — आपको नमस्कार।
- सम्पूर्ण इंद्रियों और गुणों के द्रष्टा, सब ज्ञान के कारण, असत् में भी छाया की तरह भासमान और सदा-प्रकाशित — आपको नमस्कार।
- हे समस्त कारणों के कारण, निष्कारण और अद्भुत-कारण! सब आगमों और वेदों के महासागर! हे मोक्ष-दाता, परायण — आपको बार-बार नमस्कार।
- हे अनंत, सहस्र-मूर्ति, सहस्र-पाद-नेत्र-शिर-जंघा-बाहु, सहस्रनाम, शाश्वत-पुरुष, सहस्र-योग — आपको बार-बार नमस्कार।
- जिन्हें साधारण लोग तो क्या, योगी भी यथार्थ रूप से नहीं जान पाते — आप ही भगवान साक्षात् ज्ञान और अज्ञान दोनों को प्रकाशित करते हैं।
- जो ज्ञानियों द्वारा सत्त्व और नैष्कर्म्य से प्राप्त होते हैं; हे कैवल्य-नाथ, निर्वाण-सुख-संवित् — आपको नमस्कार।
- जो जगत के स्वामी हैं, वे मुझ अनाथ को, जिसने अपना चित्त उनके चरण-कमलों में समर्पित किया है — अपनी अमोघ करुणा से रक्षा करें।
- हे भगवान! मैं न आपके चरणों का रहस्य जानता हूँ, न यह कि आपके सत्य-कोश से मेरे लिए क्या है। फिर भी आपके एकान्त-भक्त आपके चरण-कमलों का स्मरण करते हुए सब प्राणियों में विचरण करते हैं।
- जहाँ-जहाँ देही का मन अनियंत्रित दौड़ता है, वहाँ-वहाँ नारायण का चिंतन ही उसे संयत करने वाला है।
- वह गजेन्द्र भगवान की कृपा से संसार से मुक्त होने की इच्छा से चिरकाल से प्रयत्नशील था — और अंततः उसने मुक्ति प्राप्त की।
- शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार भयभीत गजेन्द्र की स्तुति सुनकर, विभु (विष्णु) ने वेदमय स्तोत्र का पोषण करते हुए प्रसन्नता प्राप्त की।
- पीड़ित गजेन्द्र ने आते हुए भगवान को देखा; तब भगवान ने समस्त सत्त्वों द्वारा वंदित स्तोत्र सुनकर गदा और सुदर्शन-चक्र से मगर का बलिष्ठ जबड़ा काट दिया।
- तब भगवान की कृपा से मुक्त गजेन्द्र जल से बाहर निकला; श्री हरि ने उसे दिव्य आभूषणों से सुशोभित किया और गजेन्द्र ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया।
- वह नागेन्द्र (गजेन्द्र) हरि की कृपा से देह त्याग कर तमस से परे परम गति को प्राप्त हुआ; श्री हरि का सरूप-प्रिय बनकर तीनों लोकों से परे चला गया।
- इस पवित्र गजेन्द्र-मोक्षण को सुनने से पापों से मुक्ति मिलती है; यह समस्त संकटों के नाश और मोक्ष-प्राप्ति के लिए परायण है।
- इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में गजेन्द्र-मोक्ष-स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
लाभ
- संकट व विपत्ति से मुक्ति का भाव मिलता है।
- अहंकार का नाश होकर शरणागति व भक्ति बढ़ती है।
- मन को परम शांति व मोक्ष की ओर प्रेरणा मिलती है।
- पाप-मोचन और संकट-निवारण होता है।
कब करें पाठ
पाठ विधि
भगवान विष्णु के समक्ष तुलसीदल अर्पित कर पूर्ण समर्पण के भाव से स्तोत्र का पाठ करें। संकट के समय इसका पाठ विशेष रूप से शांति व बल देता है।
प्रामाणिकता व स्रोत
देव परिचय
श्री विष्णु
Lord Vishnu
भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।
