गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

gajendra mokṣa stotra

Gajendra Moksha Stotra

समय
8–10 मिनट
श्लोक
33
कठिनाई
कठिन (Advanced)
शुभ दिन
गुरुवार व एकादशी
उद्देश्य:मोक्ष (Liberation)संकट मुक्ति (Relief)शरणागति (Surrender)
✓ संपूर्ण (33/33 श्लोक)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध, तीसरे अध्याय की वह स्तुति है जो ग्राह (मगर) के पकड़े हाथी गजेन्द्र ने भगवान से की। यहाँ भागवत 8.3 के 33 श्लोक हैं — 2 से 29 तक गजेन्द्र की प्रार्थना, और 30 से 33 तक श्रीहरि का गरुड़ पर आना और चक्र से ग्राह को चीरकर गजेन्द्र को छुड़ाना।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 3, श्लोक 1–33 — गजेन्द्र की स्तुति और उद्धार

एक नज़र में

मंत्र / पाठगजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र
IASTgajendra mokṣa stotra
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोतश्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 3, श्लोक 1–33 — गजेन्द्र की स्तुति और उद्धार
शुभ दिनगुरुवार व एकादशी
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईकठिन (Advanced)

उद्भव / पृष्ठभूमि

गजेन्द्र की कथा एक बहुत सीधी बात कहती है — जब सारा बल हार जाए, तब पुकार ही बचती है।

पुकार (श्लोक 1–2). ग्राह से लड़ते-लड़ते थका गजेन्द्र मन को हृदय में स्थिर करता है और पूर्व जन्म में सीखी प्रार्थना याद करता है — "ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्"।

नाम लिए बिना स्तुति (श्लोक 3–29). यह स्तुति किसी एक देवता का नाम नहीं लेती; वह उस परमेश्वर से बात करती है जिसमें यह संसार है, जिससे यह निकला है — "यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्"। गजेन्द्र कहता है कि वह जीने के लिए नहीं, अज्ञान से छूटने के लिए पुकार रहा है — "जिजीविषे नाहमिहामुया" (श्लोक 25)।

कौन आया (श्लोक 30). क्योंकि गजेन्द्र ने किसी विशेष रूप का नाम नहीं लिया, ब्रह्मा आदि देवता नहीं आए; तब सर्वदेवमय श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए।

उद्धार (श्लोक 31–33). गरुड़ पर चक्र लिए हरि आते हैं; गजेन्द्र कमल उठाकर कहता है — "नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते" — और हरि ग्राह सहित उसे बाहर खींचकर चक्र से ग्राह का मुँह चीर देते हैं।

संपूर्ण स्तोत्र

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एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥

श्री शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार बुद्धि से निश्चय कर, मन को हृदय में स्थिर कर गजेन्द्र ने उस परम जप का स्मरण किया, जिसे उसने पूर्व जन्म में सीखा था।

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥

उस भगवान को नमस्कार है, जिनसे यह सम्पूर्ण चेतन-जगत प्रकट हुआ है; उन आदि-कारण, परम पुरुष व परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं।

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्। योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥

जिनमें यह जगत स्थित है, जिनसे उत्पन्न है, जिनसे व्याप्त है, जो स्वयं यह जगत हैं, जो इस सबसे परे और परात्पर हैं — उन स्वयंभू को मैं शरण जाता हूँ।

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्। अविद्धदृक्साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥

जो अपनी माया से इस जगत को अपने आप में आरोपित करके कभी प्रकट और कभी तिरोहित करते हैं, जो अनिमेष-साक्षी हैं — वे परात्पर, आत्ममूल भगवान मेरी रक्षा करें।

कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु। तमस्तदासीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः॥

जब काल-वश सम्पूर्ण लोक, उनके पालक और समस्त कारण पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं और तमस का अंधकार छा जाता है — तब ज्ञानमय परमेश्वर ही हमारा परम आश्रय हैं।

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥

जिनके स्वरूप को देवता और ऋषि भी नहीं जानते, तो दूसरा कोई जीव उसे कैसे जाने या कहे? जैसे नाटक में अनेक रूप धरने वाले नट को दर्शक नहीं पहचानते, वैसे ही जिनकी लीला को समझना कठिन है — वे भगवान मेरी रक्षा करें।

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः। चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः॥

जिनके मंगलमय स्वरूप के दर्शन की इच्छा से आसक्ति छोड़ चुके साधु-मुनि वन में अलौकिक व्रत का पालन करते हैं, सब प्राणियों को अपने समान देखते हैं और सबके मित्र होते हैं — वे भगवान मेरी गति हैं।

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा। तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति॥

जिनका न जन्म है, न कर्म, न नाम-रूप, न गुण-दोष; फिर भी जो संसार की सृष्टि और प्रलय के लिए समय-समय पर अपनी माया से इन्हें स्वीकार करते हैं —

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये। अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे॥

उन अनंत शक्ति वाले परमेश्वर, परब्रह्म को नमस्कार; जो रूप-रहित होकर भी अनेक रूपों वाले हैं और जिनके कर्म आश्चर्यमय हैं, उन्हें नमस्कार।

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने। नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥

स्वयं-प्रकाश, सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार; जो वाणी, मन और चित्त की पहुँच से भी दूर हैं, उन्हें नमस्कार।

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता। नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥

जो ज्ञानियों द्वारा सत्त्व और नैष्कर्म्य से प्राप्त होते हैं; हे कैवल्य-नाथ, निर्वाण-सुख-संवित् — आपको नमस्कार।

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे। निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥

शांत, घोर और मूढ़ — तीनों गुण-धर्मों में विद्यमान; निर्विशेष, सम और ज्ञान-घन — उन्हें नमस्कार।

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे। पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥

हे क्षेत्रज्ञ! आपको नमस्कार। हे सर्वाध्यक्ष, साक्षी! हे आत्ममूल पुरुष, मूलप्रकृति — आपको नमस्कार।

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे। असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः॥

सम्पूर्ण इंद्रियों और गुणों के द्रष्टा, सब ज्ञान के कारण, असत् में भी छाया की तरह भासमान और सदा-प्रकाशित — आपको नमस्कार।

नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥

हे समस्त कारणों के कारण, निष्कारण और अद्भुत-कारण! सब आगमों और वेदों के महासागर! हे मोक्ष-दाता, परायण — आपको बार-बार नमस्कार।

गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥

जो गुणों रूपी अरणि (लकड़ी) में छिपी आग की तरह ज्ञान-रूप से ढके रहते हैं, जिनका मन गुणों के क्षोभ से अलग रहता है, जो नैष्कर्म्य से शुद्ध हुए आत्मज्ञानी मुनियों के हृदय में स्वयं प्रकाशित होते हैं — उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय। स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥

मुझ जैसे शरणागत पशु के बंधन काटने वाले, स्वयं सदा मुक्त, अत्यंत दयालु और कभी आलस्य न करने वाले आपको नमस्कार; अपने अंश से सब देहधारियों के हृदय में अंतर्यामी-रूप से दिखने वाले अनंत भगवान को नमस्कार।

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय। मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥

शरीर, संतान, संबंधी, घर, धन और लोगों में आसक्त जीवों के लिए जिन्हें पाना कठिन है, पर जो मुक्त पुरुषों के हृदय में अपने ही आत्म-रूप में सदा ध्यान किए जाते हैं — उन ज्ञान-स्वरूप भगवान ईश्वर को नमस्कार।

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति। किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्॥

जिन्हें धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के इच्छुक भजकर इष्ट गति प्राप्त करते हैं — वे अपार-दयालु मुझे, माँगे बिना ही, अव्यय देह और मोक्ष प्रदान करें।

एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥

जिनके एकान्त-भक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रखते — उनके अत्याद्भुत और परम-मंगल चरित्र गाते हुए वे आनंद-सागर में डूब जाते हैं।

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश- मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम्। अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर- मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥

उस अक्षर ब्रह्म, परम ईश्वर, अव्यक्त, जो आध्यात्मिक योग से ही मिलते हैं, जो इंद्रियों से परे और अत्यंत सूक्ष्म जान पड़ते हैं — उन अनंत, आदि और परिपूर्ण भगवान की मैं स्तुति करता हूँ।

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः। नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥

जिनकी बहुत छोटी-सी कला से ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चर-अचर सब लोक अलग-अलग नाम-रूपों में रचे गए हैं —

यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः। तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥

जैसे आग से लपटें और सूर्य से किरणें बार-बार निकलती और फिर उसी में समा जाती हैं, वैसे ही जिनसे यह बुद्धि, मन, इंद्रियाँ और शरीरों का प्रवाह निकलता और उन्हीं में लीन हो जाता है —

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्डो न पुमान् न जन्तुः। नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः॥

वे भगवान न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य, न पशु-पक्षी; न स्त्री, न पुरुष, न नपुंसक; न गुण, न कर्म, न सत्, न असत्। सबका निषेध करने पर जो शेष रहते हैं, और जो सब कुछ हैं — उनकी जय हो।

जिजीविषे नाहमिहामुया कि- मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्॥

मैं यहाँ (ग्राह से छूटकर) जीना नहीं चाहता; भीतर-बाहर अज्ञान से ढके इस हाथी के शरीर से मुझे क्या करना है? मैं तो उस आत्म-प्रकाश को ढकने वाले (अज्ञान) से मोक्ष चाहता हूँ, जो काल से अपने-आप नष्ट नहीं होता।

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्। विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥

ऐसा मैं, मोक्ष चाहने वाला, विश्व के रचयिता, विश्व-रूप, विश्व से परे, विश्व को जानने वाले, विश्व के आत्मा, अजन्मे, परम पद ब्रह्म को प्रणाम करता हूँ।

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते। योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥

योग से जिनके कर्म जल गए हैं, ऐसे योगी योग से शुद्ध हुए हृदय में जिन्हें देखते हैं — उन योगेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥

जिनकी त्रिगुणमयी शक्ति का वेग असहनीय है, जो सब इंद्रिय-विषयों के रूप में भासते हैं, शरणागतों के रक्षक और अपार शक्ति वाले हैं — जिनका मार्ग बुरी इंद्रियों वाले नहीं पा सकते, उन्हें बार-बार नमस्कार।

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्। तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम्॥

जिनकी माया से ढकी अहंकार-बुद्धि के कारण यह जीव अपने आत्मा को नहीं जानता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण में आया हूँ।

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः। नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत्॥

(शुकदेव जी कहते हैं —) गजेंद्र ने इस प्रकार बिना किसी विशेष रूप का नाम लिए जब परमेश्वर की स्तुति की, तो भिन्न-भिन्न रूपों का अभिमान रखने वाले ब्रह्मा आदि देवता उसके पास नहीं आए; तब सर्वदेवमय श्रीहरि स्वयं वहाँ प्रकट हुए।

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः। छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान- श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥

जगत के निवास श्रीहरि ने गजेंद्र को इस तरह दुखी देखा और उसकी स्तुति सुनी; वे स्तुति करते देवताओं के साथ, वेदमय गरुड़ पर सवार होकर, हाथ में चक्र लिए तुरंत वहाँ पहुँचे जहाँ गजेंद्र था।

सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा- न्नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥

सरोवर के भीतर बलवान ग्राह से पकड़े, पीड़ा से व्याकुल गजेंद्र ने आकाश में गरुड़ पर चक्र लिए श्रीहरि को देखा, तो कमल सहित सूँड उठाकर बड़ी कठिनाई से कहा — हे नारायण, हे जगद्गुरु, हे भगवन्, आपको नमस्कार।

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं संपश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम्॥

उसे पीड़ित देखकर अजन्मे श्रीहरि तुरंत (गरुड़ से) उतरे और कृपा करके ग्राह सहित गजेंद्र को सरोवर से बाहर खींच लिया; फिर देखते हुए देवताओं के सामने चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर गजेंद्र को छुड़ा दिया।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री शुकदेव कहते हैं — इस प्रकार बुद्धि से निश्चय कर, मन को हृदय में स्थिर कर गजेन्द्र ने उस परम जप का स्मरण किया, जिसे उसने पूर्व जन्म में सीखा था।
  2. उस भगवान को नमस्कार है, जिनसे यह सम्पूर्ण चेतन-जगत प्रकट हुआ है; उन आदि-कारण, परम पुरुष व परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं।
  3. जिनमें यह जगत स्थित है, जिनसे उत्पन्न है, जिनसे व्याप्त है, जो स्वयं यह जगत हैं, जो इस सबसे परे और परात्पर हैं — उन स्वयंभू को मैं शरण जाता हूँ।
  4. जो अपनी माया से इस जगत को अपने आप में आरोपित करके कभी प्रकट और कभी तिरोहित करते हैं, जो अनिमेष-साक्षी हैं — वे परात्पर, आत्ममूल भगवान मेरी रक्षा करें।
  5. जब काल-वश सम्पूर्ण लोक, उनके पालक और समस्त कारण पंचत्व को प्राप्त हो जाते हैं और तमस का अंधकार छा जाता है — तब ज्ञानमय परमेश्वर ही हमारा परम आश्रय हैं।
  6. जिनके स्वरूप को देवता और ऋषि भी नहीं जानते, तो दूसरा कोई जीव उसे कैसे जाने या कहे? जैसे नाटक में अनेक रूप धरने वाले नट को दर्शक नहीं पहचानते, वैसे ही जिनकी लीला को समझना कठिन है — वे भगवान मेरी रक्षा करें।
  7. जिनके मंगलमय स्वरूप के दर्शन की इच्छा से आसक्ति छोड़ चुके साधु-मुनि वन में अलौकिक व्रत का पालन करते हैं, सब प्राणियों को अपने समान देखते हैं और सबके मित्र होते हैं — वे भगवान मेरी गति हैं।
  8. जिनका न जन्म है, न कर्म, न नाम-रूप, न गुण-दोष; फिर भी जो संसार की सृष्टि और प्रलय के लिए समय-समय पर अपनी माया से इन्हें स्वीकार करते हैं —
  9. उन अनंत शक्ति वाले परमेश्वर, परब्रह्म को नमस्कार; जो रूप-रहित होकर भी अनेक रूपों वाले हैं और जिनके कर्म आश्चर्यमय हैं, उन्हें नमस्कार।
  10. स्वयं-प्रकाश, सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार; जो वाणी, मन और चित्त की पहुँच से भी दूर हैं, उन्हें नमस्कार।
  11. जो ज्ञानियों द्वारा सत्त्व और नैष्कर्म्य से प्राप्त होते हैं; हे कैवल्य-नाथ, निर्वाण-सुख-संवित् — आपको नमस्कार।
  12. शांत, घोर और मूढ़ — तीनों गुण-धर्मों में विद्यमान; निर्विशेष, सम और ज्ञान-घन — उन्हें नमस्कार।
  13. हे क्षेत्रज्ञ! आपको नमस्कार। हे सर्वाध्यक्ष, साक्षी! हे आत्ममूल पुरुष, मूलप्रकृति — आपको नमस्कार।
  14. सम्पूर्ण इंद्रियों और गुणों के द्रष्टा, सब ज्ञान के कारण, असत् में भी छाया की तरह भासमान और सदा-प्रकाशित — आपको नमस्कार।
  15. हे समस्त कारणों के कारण, निष्कारण और अद्भुत-कारण! सब आगमों और वेदों के महासागर! हे मोक्ष-दाता, परायण — आपको बार-बार नमस्कार।
  16. जो गुणों रूपी अरणि (लकड़ी) में छिपी आग की तरह ज्ञान-रूप से ढके रहते हैं, जिनका मन गुणों के क्षोभ से अलग रहता है, जो नैष्कर्म्य से शुद्ध हुए आत्मज्ञानी मुनियों के हृदय में स्वयं प्रकाशित होते हैं — उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
  17. मुझ जैसे शरणागत पशु के बंधन काटने वाले, स्वयं सदा मुक्त, अत्यंत दयालु और कभी आलस्य न करने वाले आपको नमस्कार; अपने अंश से सब देहधारियों के हृदय में अंतर्यामी-रूप से दिखने वाले अनंत भगवान को नमस्कार।
  18. शरीर, संतान, संबंधी, घर, धन और लोगों में आसक्त जीवों के लिए जिन्हें पाना कठिन है, पर जो मुक्त पुरुषों के हृदय में अपने ही आत्म-रूप में सदा ध्यान किए जाते हैं — उन ज्ञान-स्वरूप भगवान ईश्वर को नमस्कार।
  19. जिन्हें धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के इच्छुक भजकर इष्ट गति प्राप्त करते हैं — वे अपार-दयालु मुझे, माँगे बिना ही, अव्यय देह और मोक्ष प्रदान करें।
  20. जिनके एकान्त-भक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रखते — उनके अत्याद्भुत और परम-मंगल चरित्र गाते हुए वे आनंद-सागर में डूब जाते हैं।
  21. उस अक्षर ब्रह्म, परम ईश्वर, अव्यक्त, जो आध्यात्मिक योग से ही मिलते हैं, जो इंद्रियों से परे और अत्यंत सूक्ष्म जान पड़ते हैं — उन अनंत, आदि और परिपूर्ण भगवान की मैं स्तुति करता हूँ।
  22. जिनकी बहुत छोटी-सी कला से ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चर-अचर सब लोक अलग-अलग नाम-रूपों में रचे गए हैं —
  23. जैसे आग से लपटें और सूर्य से किरणें बार-बार निकलती और फिर उसी में समा जाती हैं, वैसे ही जिनसे यह बुद्धि, मन, इंद्रियाँ और शरीरों का प्रवाह निकलता और उन्हीं में लीन हो जाता है —
  24. वे भगवान न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य, न पशु-पक्षी; न स्त्री, न पुरुष, न नपुंसक; न गुण, न कर्म, न सत्, न असत्। सबका निषेध करने पर जो शेष रहते हैं, और जो सब कुछ हैं — उनकी जय हो।
  25. मैं यहाँ (ग्राह से छूटकर) जीना नहीं चाहता; भीतर-बाहर अज्ञान से ढके इस हाथी के शरीर से मुझे क्या करना है? मैं तो उस आत्म-प्रकाश को ढकने वाले (अज्ञान) से मोक्ष चाहता हूँ, जो काल से अपने-आप नष्ट नहीं होता।
  26. ऐसा मैं, मोक्ष चाहने वाला, विश्व के रचयिता, विश्व-रूप, विश्व से परे, विश्व को जानने वाले, विश्व के आत्मा, अजन्मे, परम पद ब्रह्म को प्रणाम करता हूँ।
  27. योग से जिनके कर्म जल गए हैं, ऐसे योगी योग से शुद्ध हुए हृदय में जिन्हें देखते हैं — उन योगेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
  28. जिनकी त्रिगुणमयी शक्ति का वेग असहनीय है, जो सब इंद्रिय-विषयों के रूप में भासते हैं, शरणागतों के रक्षक और अपार शक्ति वाले हैं — जिनका मार्ग बुरी इंद्रियों वाले नहीं पा सकते, उन्हें बार-बार नमस्कार।
  29. जिनकी माया से ढकी अहंकार-बुद्धि के कारण यह जीव अपने आत्मा को नहीं जानता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण में आया हूँ।
  30. (शुकदेव जी कहते हैं —) गजेंद्र ने इस प्रकार बिना किसी विशेष रूप का नाम लिए जब परमेश्वर की स्तुति की, तो भिन्न-भिन्न रूपों का अभिमान रखने वाले ब्रह्मा आदि देवता उसके पास नहीं आए; तब सर्वदेवमय श्रीहरि स्वयं वहाँ प्रकट हुए।
  31. जगत के निवास श्रीहरि ने गजेंद्र को इस तरह दुखी देखा और उसकी स्तुति सुनी; वे स्तुति करते देवताओं के साथ, वेदमय गरुड़ पर सवार होकर, हाथ में चक्र लिए तुरंत वहाँ पहुँचे जहाँ गजेंद्र था।
  32. सरोवर के भीतर बलवान ग्राह से पकड़े, पीड़ा से व्याकुल गजेंद्र ने आकाश में गरुड़ पर चक्र लिए श्रीहरि को देखा, तो कमल सहित सूँड उठाकर बड़ी कठिनाई से कहा — हे नारायण, हे जगद्गुरु, हे भगवन्, आपको नमस्कार।
  33. उसे पीड़ित देखकर अजन्मे श्रीहरि तुरंत (गरुड़ से) उतरे और कृपा करके ग्राह सहित गजेंद्र को सरोवर से बाहर खींच लिया; फिर देखते हुए देवताओं के सामने चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर गजेंद्र को छुड़ा दिया।

लाभ

  • संकट में शरणागति का भाव — "सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्" … "प्रणतोऽस्मि परं पदम्" (श्लोक 26)।
  • निष्काम भक्ति की सीख — एकांत भक्त कुछ नहीं माँगते, केवल भगवान के चरित्र गाते हैं (श्लोक 20)।
  • भरोसा कि सच्ची पुकार सुनी जाती है — गजेन्द्र के पुकारते ही श्रीहरि स्वयं आए (श्लोक 30–33)।

कब करें पाठ

गुरुवार व एकादशी कोसंकट या विपत्ति के समयप्रातः व संध्या

पाठ विधि

भगवान विष्णु के समक्ष तुलसीदल अर्पित कर पूर्ण समर्पण के भाव से स्तोत्र का पाठ करें। संकट के समय इसका पाठ विशेष रूप से शांति व बल देता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (33/33 श्लोक)
स्रोत परंपराश्रीमद्भागवत 8.3.1–33 · vishnusahasranamam.org — गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र (आधार, श्लोक 1–29) · vedabase.io — श्रीमद्भागवतम् 8.3.30–33 (आधार, श्लोक 30–33) · hinduismfaq.com — गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र
रचयिताश्रीमद्भागवत (शुकदेव कथित)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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मुख्य मंत्रॐ नमो भगवते वासुदेवाय
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