कथा का प्रसंग
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — "हे केशव! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है?"
भगवान श्रीकृष्ण बोले — "हे राजन्! उस एकादशी का नाम पापमोचिनी है। यह ब्रह्महत्या, स्वर्ण-चोरी, सुरापान व गुरु-द्रोह जैसे महापापों तक का नाश करने वाली है। इसके विषय में एक कथा है, जो कभी लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को सुनाई थी — सुनो।"
चैत्ररथ वन में ऋषि मेधावी
चैत्ररथ नाम का एक अत्यंत रमणीय दिव्य वन था, जहाँ देवगण, गंधर्व, किन्नर व अप्सराएँ विहार किया करती थीं। वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते और वातावरण मधुर सुगंध से भरा रहता।
उसी वन के एक शांत भाग में मेधावी नाम के एक युवा ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे। वे च्यवन ऋषि के पुत्र थे, अत्यंत तेजस्वी व ब्रह्मचारी थे, और भगवान शिव की आराधना में लीन रहते थे। उनका तप इतना प्रबल था कि उसका तेज देवलोक तक पहुँचने लगा।
मंजुघोषा और भंग हुई तपस्या
ऋषि मेधावी के तप से कामदेव विचलित हो उठे — उन्हें भय हुआ कि कहीं यह तपस्वी उनकी सत्ता को ही चुनौती न दे दे। तपस्या भंग करने के लिए उन्होंने मंजुघोषा नाम की अत्यंत रूपवती अप्सरा को भेजा।
मंजुघोषा ने ऋषि के आश्रम से कुछ दूरी पर आसन जमाया और वीणा पर ऐसा मधुर गान आरंभ किया कि वन का कण-कण मुग्ध हो उठा। उसका संगीत, उसका सौंदर्य और कामदेव की सहायक शक्ति — तीनों ने मिलकर ऋषि का चित्त डिगा दिया।
तपस्या टूट गई। ऋषि मेधावी अपना संयम, अपना संकल्प और अपना समय-बोध — सब भूलकर मंजुघोषा के साथ भोग-विलास में लीन हो गए। दिन बीते, ऋतुएँ बदलीं, वर्ष पर वर्ष चढ़ते गए — पर उन्हें कुछ भान न रहा।
सत्तावन वर्ष का बोध और श्राप
एक दिन मंजुघोषा ने ऋषि से विदा माँगी — "हे स्वामी! अब मुझे देवलोक लौटने की आज्ञा दीजिए।" यह सुनकर ऋषि मानो नींद से जागे। उन्होंने गणना की तो स्तब्ध रह गए — इस भोग-विलास में सत्तावन वर्ष, सात मास और तीन दिन बीत चुके थे!
जिस तप के लिए उन्होंने जीवन समर्पित किया था, वह पूर्णतः नष्ट हो चुका था। क्षोभ, लज्जा व क्रोध से भरकर उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया — "तूने मेरी तपस्या भंग की है। जा, तू पिशाचिनी हो जा!"
श्राप सुनते ही मंजुघोषा काँप उठी और ऋषि के चरणों में गिरकर विनती करने लगी — "हे मुनिवर! मुझ पर दया कीजिए। मैंने जो किया, वह अपनी इच्छा से नहीं, कामदेव की आज्ञा से किया। मुझे इस श्राप से मुक्ति का कोई उपाय बताइए। कहा गया है कि साधुओं की संगति कभी निष्फल नहीं जाती।"
पापमोचिनी व्रत का विधान
उसकी करुण प्रार्थना सुनकर ऋषि मेधावी का क्रोध शांत हुआ। उन्हें यह भी बोध हुआ कि दोष केवल उसका नहीं — उनका अपना असंयम भी उतना ही उत्तरदायी था।
उन्होंने कहा — "हे मंजुघोषा! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक कर। इसके प्रभाव से तू इस पिशाच-योनि से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य रूप को प्राप्त करेगी।"
इसके पश्चात ऋषि मेधावी अपने पिता महर्षि च्यवन के आश्रम गए और लज्जित होकर सारी बात कह सुनाई। महर्षि च्यवन ने कहा — "हे पुत्र! तूने अपने तप को नष्ट किया है, यह बड़ा दोष है। तू भी इसी पापमोचिनी एकादशी का व्रत कर; इससे तेरे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे।"
दोनों की मुक्ति
मंजुघोषा ने श्रद्धापूर्वक पापमोचिनी एकादशी का व्रत किया — निराहार रहकर भगवान विष्णु का पूजन किया और रात्रि जागरण कर हरि-नाम का कीर्तन किया। व्रत के प्रभाव से उसका पिशाचिनी-रूप जाता रहा और वह पुनः अपने दिव्य अप्सरा-रूप में आकर देवलोक लौट गई।
ऋषि मेधावी ने भी पिता के परामर्श से यही व्रत किया। इसके प्रभाव से उनकी नष्ट हुई तपस्या का दोष धुल गया, उनका तेज पुनः लौट आया और वे पहले से भी अधिक दृढ़ संयम के साथ तप में प्रवृत्त हुए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — "हे युधिष्ठिर! पापमोचिनी एकादशी का व्रत ऐसा ही प्रभावशाली है। जो इसे श्रद्धापूर्वक करता है, उसके जाने-अनजाने किए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जो केवल इसकी कथा सुनता या पढ़ता है, उसे सहस्र गोदान के तुल्य पुण्य प्राप्त होता है।"