पापमोचिनी एकादशी
पाठ
व्रत कथा
ऋषि मेधावी की तपस्या
चैत्ररथ नामक रमणीय वन में मेधावी नामक तपस्वी ऋषि तप कर रहे थे। कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने हेतु मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। मंजुघोषा के मधुर गान व सौंदर्य में मुग्ध होकर ऋषि अपना तप व समय-बोध भूल गए।
बहुत समय पश्चात जब मंजुघोषा ने विदा माँगी, तब ऋषि को ज्ञात हुआ कि इस बीच अनेक वर्ष बीत चुके हैं। अपनी तपस्या नष्ट होने पर क्रुद्ध होकर ऋषि ने मंजुघोषा को पिशाचिनी बन जाने का श्राप दे दिया।
व्रत से श्राप-मुक्ति
पश्चात्ताप में डूबी मंजुघोषा ने ऋषि से मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने उसे चैत्र कृष्ण की पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने को कहा।
मंजुघोषा ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया और श्राप से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य अप्सरा-रूप में लौट आई। स्वयं ऋषि मेधावी ने भी अपने पिता के परामर्श से यह व्रत कर अपनी तप-हानि के दोष का शमन किया।
लाभ
- जाने-अनजाने किए पापों का नाश
- ब्रह्महत्या, स्वर्ण-चोरी आदि महापापों का शमन
- कथा-श्रवण से सहस्र गोदान तुल्य पुण्य
स्रोत
पापमोचिनी एकादशी माहात्म्य — ऋषि मेधावी व मंजुघोषा प्रसंग · एकादशी माहात्म्य परंपरा
